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वायुसेना की बढ़ेगी ताकत: भारत में बनेंगे 1000 किलो के गोला-बारूद; रूसी एयरक्राफ्ट में होंगे फिट

Published: Sat, 04 Apr 2026 07:34 PM (IST)

भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम उठा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए ...और पढ़ें

वायुसेना की बढ़ेगी ताकत (फोटो-IAF)

वायुसेना की बढ़ेगी ताकत (फोटो-IAF)

HighLights

  1. भारतीय वायुसेना के लिए 1000 किलो के स्वदेशी बम बनेंगे।

  2. ये बम रूसी और पश्चिमी दोनों विमानों में फिट होंगे।

  3. रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' की दिशा में भारत ने एक और बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 1,000 किलोग्राम वजन वाले स्वदेशी हवाई बमों के डिजाइन और विकास की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ये बम 'एमके-84' श्रेणी के बमों के समान होंगे, जो अपनी विनाशकारी क्षमता के लिए जाने जाते हैं।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य विदेशी निर्भरता को खत्म करना और देश में ही उच्च क्षमता वाले गोला-बारूद का निर्माण करना है। वर्तमान में, वायुसेना इस श्रेणी के बमों को विदेशी निर्माताओं से खरीदती है।

रूस और पश्चिमी देशों के विमानों पर होंगे फिट

इन बमों की सबसे बड़ी खासियत इनकी बहुमुखी क्षमता होगी। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ये 1,000 किलो के बम वायुसेना द्वारा संचालित रूसी और पश्चिमी दोनों मूल के लड़ाकू विमानों में फिट किए जा सकेंगे। यह तकनीक वायुसेना को युद्ध की स्थिति में जबरदस्त लचीलापन प्रदान करेगी।

यह परियोजना 'मेक-टू' (उद्योग-वित्त पोषित) श्रेणी के तहत संचालित की जाएगी, जिसके बाद 'बाय (इंडियन आइडीडीएम)' श्रेणी के तहत इसकी खरीद होगी। आइडीडीएम का मतलब है स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित।

योजना के मुताबिक, कुल 600 हवाई बमों की खरीद की जानी है। ये बम 'हाई-कैलिबर म्यूनिशन' होंगे, जो दुश्मन के ठिकानों पर भीषण विस्फोट कर उन्हें नेस्तनाबूद करने में सक्षम होंगे।

ढाई साल में पूरा होगा स्वदेशी प्रोटोटाइप का लक्ष्य

परियोजना को दो मुख्य चरणों में बांटा गया है। पहले चरण में छह प्रोटोटाइप विकसित किए जाएंगे। विकास प्रक्रिया में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का होना अनिवार्य है।

अधिकारियों का अनुमान है कि रक्षा मंत्रालय द्वारा एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट (ईओआइ) जारी किए जाने से लेकर अनुबंध पर हस्ताक्षर होने तक लगभग ढाई वर्ष का समय लगेगा। इसमें प्रोटोटाइप का परीक्षण, उपयोगकर्ता परीक्षण और मूल्यांकन प्रक्रिया शामिल होगी।

वायुसेना खुद इस विकास प्रक्रिया की निगरानी और सहायता करेगी ताकि इसे भविष्य में बड़े स्तर पर परिचालन में लाया जा सके।

यह परियोजना निजी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों के लिए भी खुली है, जो विदेशी सहयोग के साथ भी इसमें हिस्सा ले सकती हैं, बशर्ते डिजाइन और निर्माण की मुख्य शर्तें स्वदेशी हों।

यह कदम न केवल रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत को एक सैन्य विनिर्माण केंद्र के रूप में भी स्थापित करेगा।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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