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'मानवाधिकार राजनीतिक दबाव का जरिया नहीं', UN द्वारा प्रदर्शनों से निपटने की आलोचना पर भारत ने जताई आपत्ति

Published: Wed, 21 Oct 2026 12:11 PM (IST)

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकारों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

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डिजिटल डेस्क, जिनेवा। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति की बैठक में भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

भारत ने बिना पुष्टि वाले और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि धूमिल करने के प्रयासों का पुरजोर विरोध किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में बोलते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने कहा कि मानवाधिकारों के मुद्दे पर निष्पक्षता और पारदर्शिता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों से जुड़ने को तैयार है, लेकिन यह बातचीत, आपसी समझ और सहयोग के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी पूर्वाग्रह के तहत। उन्होंने यह भी अपील की कि रिपोर्टों को सही संदर्भ में पेश किया जाए और किसी सामान्य संवाद को अंतिम फैसला न माना जाए।

दिल्ली में प्रदर्शनों पर यूएन की टिप्पणी के बाद जताया विरोध

भारत का यह बयान संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों द्वारा नई दिल्ली में युवाओं और छात्रों के हालिया विरोध प्रदर्शनों पर चिंता जताए जाने के बाद आया है। जिनेवा में मौजूद 20 से अधिक यूएन विशेषज्ञों ने दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित सख्त कार्रवाई पर चिंता जताई थी।

विशेषज्ञों का आरोप था कि सुरक्षा बलों ने निहत्थे छात्रों पर बल प्रयोग किया, लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया और सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदियां लगाईं। उन्होंने भारतीय प्रशासन से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करने का आग्रह किया था।

यूएन विशेषज्ञों ने प्रदर्शनकारियों के गिरफ्तारी और बुरे बर्ताव के आरोपों पर जताई थी चिंता

यूएन विशेषज्ञों के अनुसार, देशभर में छात्र और युवा शिक्षा व्यवस्था से जुड़े फैसलों और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। विशेषज्ञों ने उन खबरों का हवाला दिया जिनमें कहा गया था कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर मुस्लिम, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के कई लोगों पर पड़ा है।

बयान में यह भी दावा किया गया कि नई दिल्ली में 7000 से अधिक युवाओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को हिरासत में लेकर दूर के केंद्रों में ले जाया गया था।

आरोप लगाया गया कि उनके फोन जब्त किए गए और प्रदर्शन से जुड़ी सामग्री हटाई गई, हालांकि ज्यादातर लोगों को 24 घंटे बाद छोड़ दिया गया। इसके अलावा, विशेषज्ञों ने प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार और चोटों की रिपोर्टों पर भी चिंता व्यक्त की थी।

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