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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 03, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

भारत के प्रतिस्पर्धी देशों पर ट्रंप ने लगाया ज्यादा टैरिफ, विदेशी निवेशकों के लिए और आकर्षक हो सकता है भारत

Published: Thu, 03 Apr 2025 05:06 PM (IST)Updated: Fri, 04 Apr 2025 01:24 PM (IST)

व्हाइट हाउस की तरफ से जारी सूचना के मुताबिक चीन से आयात पर 34% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया है। उस ...और पढ़ें

भारत पर कम टैरिफ से निवेश में मिल सकती है मदद
भारत पर कम टैरिफ से निवेश में मिल सकती है मदद

एस.के. सिंह, नई दिल्ली

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप के एक्जीक्यूटिव आदेश के मुताबिक 5 अप्रैल को सभी देशों से आयात पर 10% बेसलाइन शुल्क लागू होगा। उसके बाद 9 अप्रैल को हर देश के हिसाब से बाकी टैरिफ लागू किया जाएगा। राहत की बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने भारत के पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों पर जो टैरिफ लगाए हैं, वे भारत की तुलना में काफी ज्यादा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात प्रतिस्पर्धा में भारत को इसका फायदा मिल सकता है। वैसे तो दूसरे कार्यकाल में ट्रंप अपने फैसले कई बार बदल चुके हैं, फिर भी अगर वे टैरिफ के इस निर्णय पर कायम रहे तो भारत में विदेशी निवेश बढ़ सकता है।

व्हाइट हाउस की तरफ से जारी सूचना के मुताबिक चीन से आयात पर 34% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया है। उस पर फरवरी में भी 20% टैरिफ लगाया गया था। इस तरह चीन से आयात पर 54% टैरिफ लागू होगा। राष्ट्रपति चुनाव के समय ट्रंप ने चीन पर 60% टैरिफ लगाने की बात कही थी। भारत के अन्य प्रतिस्पर्धी और पड़ोसी देशों को देखें तो बांग्लादेश पर 37%, इंडोनेशिया पर 32%, पाकिस्तान पर 29%, दक्षिण कोरिया पर 25%, ताइवान पर 32%, थाइलैंड पर 36% और वियतनाम पर 46% टैरिफ लगाया गया है।

ग्लोबल ट्रेड एंड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने जागरण प्राइम से कहा, “अमेरिका ने अनेक देशों से आयात पर भारी-भरकम टैरिफ लगाया है। चीन पर कुल टैरिफ 54% हो गया है, तो वियतनाम से आयात पर 46% शुल्क लगाने की घोषणा की गई है। ये दोनों देश मैन्युफैक्चरिंग में भारत के सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो भारत के खिलाफ 27% का टैरिफ प्रतिस्पर्धी देशों से कम है। इससे भारत को एडवांटेज मिल सकती है।”

“टैरिफ में इस अंतर के कारण कंपनियां भारत में निवेश के लिए आकर्षित हो सकती हैं, क्योंकि वे ऊंचे टैरिफ वाले देशों से अपना प्रोडक्शन कम टैरिफ वाले देशों में ले जाना चाहेंगी। लेकिन यहां एक समस्या है। ज्यादातर निवेशक इंतजार करना चाहेंगे। राष्ट्रपति ट्रंप का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद अस्थिरता वाला रहा है। वे किसी भी देश के खिलाफ किसी भी क्षण टैरिफ बढ़ा सकते हैं, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।”

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ओआरएफ में स्ट्रैटजिक स्टडीज प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर और ओआरएफ अमेरिका के पूर्व विजिटिंग फेलो विवेक मिश्रा कहते हैं, “वियतनाम, कंबोडिया तथा इस क्षेत्र के अन्य देश जूते, रोज पहने जाने वाले कपड़े समेत कई वस्तुओं के बड़े निर्माता हैं। इनके प्रोडक्ट अमेरिका में काफी महंगे हो जाएंगे। इन देशों के निर्माता नया बाजार तलाशेंगे। कपड़ों के मामले में बांग्लादेश भी महत्वपूर्ण है। इस लिहाज से देखा जाए तो ट्रंप के टैरिफ सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कुछ सप्लाई चेन भारत आ सकती है। भारत इन वस्तुओं के मामले में अमेरिका पर ज्यादा निर्भर नहीं है। यह भारत के लिए अवसर होगा,, हालांकि इसमें थोड़ा समय भी लग सकता है।”

भारत के लिए एक और राहत की बात है कि इस रेसिप्रोकल टैरिफ में फार्मास्यूटिकल और सोना-चांदी शामिल नहीं हैं। व्हाइट हाउस की तरफ से जारी फैक्ट शीट में कहा गया है कि कुछ वस्तुओं पर रेसिप्रोकल टैरिफ लागू नहीं होगा। इनमें स्टील, एल्युमिनियम के समान, ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट्स शामिल नहीं है क्योंकि इन पर पहले ही सेक्शन 232 के तहत टैरिफ लगाया जा चुका है। इनके अलावा कॉपर, फार्मास्यूटिकल, सेमीकंडक्टर, लकड़ी के समान, बुलियन (सोना-चांदी), ऊर्जा तथा अमेरिका में नहीं पाए जाने वाले खनिज शामिल हैं।

क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर अनुज सेठी के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने अमेरिका को लगभग 8 अरब डॉलर के फार्मा उत्पादों का निर्यात किया। भारत का सबसे अधिक फार्मा निर्यात अमेरिका को ही है। भारत अमेरिका में इस्तेमाल की जाने वाली लगभग 40% जेनरिक दवाइयों की आपूर्ति करता है। इन्हें रेसिप्रोकल टैरिफ से बाहर रखने का अमेरिकी प्रशासन का निर्णय भारत के निर्यात को बनाए रखने में मदद करेगा। भारत में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (USFDA) द्वारा अनुमोदित 650 से अधिक इकाइयां हैं, जो अमेरिका के बाहर दूसरी सबसे अधिक संख्या है।

हालांकि सेठी यह भी कहते हैं कि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन द्वारा फार्मास्यूटिकल्स पर शुल्क लगाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस पर कोई निर्णय लेने से पहले अमेरिका में जारी दवा की कमी, घरेलू उत्पादन की अधिक लागत और अमेरिकी फार्मा कंपनियों की घटती लाभप्रदता जैसे पहलुओं पर भी विचार किए जाने की संभावना है।

टेलीकॉम उपकरण बनाने वाली भारतीय कंपनी जीएक्स ग्रुप के सीईओ परितोष प्रजापति के अनुसार, “ट्रंप प्रशासन के नए टैरिफ से भारतीय हार्डवेयर निर्यातकों के लिए लागत में वृद्धि होगी। लेकिन दूसरे एशियाई मैन्युफैक्चरिंग देशों की तुलना में भारत पर लगाया गया टैरिफ कम है। इसलिए भारतीय मैन्युफैक्चरिंग अब भी प्रतिस्पर्धी है। यहां स्केल और क्वालिटी पर फोकस के साथ मेक इन इंडिया इंसेंटिव भी है।”

निर्यात पोर्टल पर दी जानकारी के मुताबिक वर्ष 2024-25 में अप्रैल से फरवरी तक भारत ने कुल 392 अरब डॉलर का निर्यात किया। इसमें से 76.38 अरब डॉलर यानी लगभग 19.5% निर्यात अमेरिका को किया गया। वित्त वर्ष 2023-24 में 433 अरब डॉलर के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 77.52 अरब डॉलर, यानी 17.9% था।

इंडिया सेलुलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) के मुताबिक इस टैरिफ के बावजूद भारत प्रतिस्पर्धी देशों चीन, वियतनाम, थाइलैंड और इंडोनेशिया से बेहतर स्थिति में है। चीन पर टैरिफ 54% से 154% तक हो गया है। ब्राजील या मिस्र के 10% की तुलना में भारत पर टैरिफ ज्यादा है, फिर भी भारत के लिए अवसर हैं।

ICEA के चेयरमैन पंकज मोहिंद्रू ने कहा, रेसिप्रोकल टैरिफ के पहले राउंड में भारत को रणनीतिक स्थान मिलना हमारे नेतृत्व और वार्ताकारों के अथक परिश्रम का नतीजा है। इलेक्ट्रॉनिक्स के अन्य प्रमुख निर्यातक देशों- चीन और वियतनाम की तुलना में हम बेहतर स्थिति में हैं और हमें तत्काल इसका फायदा उठाना चाहिए। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड का वास्तविक लाभ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के नतीजों पर निर्भर करेगा।

वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने अमेरिका को 10 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का निर्यात किया था। पंकज मोहिंद्रू के अनुसार ‘मिशन 500’ के तहत वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना से अधिक बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है। इसके लिए बाजार पहुंच में स्थिरता, पूर्वानुमान योग्य टैरिफ और सप्लाई चेन में ज्यादा इंटीग्रेशन महत्वपूर्ण है। यह समझौता सफलतापूर्वक संपन्न होने पर 100 अरब डॉलर का द्विपक्षीय इलेक्ट्रॉनिक व्यापार संभव है। तब वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड में भारत की बड़ी भूमिका होगी।

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के आकलन के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का मर्केंडाइज निर्यात जीडीपी का 12.4% था और इसमें सिर्फ 2% निर्यात (77.5 अरब डॉलर) अमेरिका को हुआ, बाकी 10% दूसरे देशों को।

क्रिसिल रेटिंग्स के डायरेक्टर गौतम शाही का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन ने भारत से घरेलू वस्त्र और रेडीमेड गारमेंट्स पर 27% प्रतिशोधी शुल्क लगाया है। यह अन्य प्रमुख वस्त्र निर्यातक देशों की तुलना में कम है। चीन पर 54%, वियतनाम पर 46%, बांग्लादेश पर 37% और पाकिस्तान पर 30% शुल्क है। इससे भारत की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ सकती है और अमेरिका को वस्त्र निर्यात में हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर अनुज सेठी के मुताबिक, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवा पर ट्रंप प्रशासन ने कोई शुल्क नहीं लगाया गया है, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों पर लगाए गए शुल्कों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी आ सकती है। इससे वहां मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है और क्लाइंट के बजट में कटौती हो सकती है। यह भारतीय आईटी सेवा प्रदाताओं के बिजनेस को प्रभावित कर सकता है।

वित्त वर्ष 2023-24 में भारतीय आईटी सेवा कंपनियों की कुल 193 अरब डॉलर की आय में से लगभग 57% अमेरिका से आई थी। क्रिसिल रेटिंग्स को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2026 में भारतीय आईटी सेवा क्षेत्र की राजस्व वृद्धि 6-8% तक सीमित रहेगी।

वियतनाम को सबसे अधिक नुकसान!

ट्रंप के पहले कार्यकाल में चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर के दौरान बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ‘चाइना प्लस वन’ की नीति अपनाई थी। उसका सबसे अधिक फायदा वियतनाम को मिला था। लेकिन नए टैरिफ का सबसे अधिक नुकसान भी वियतनाम को होने वाला है। वैश्विक रिसर्च फर्म नेटिक्सिस की सीनियर इकोनॉमिस्ट ट्रिन्ह गुयेन के अनुसार, “अगर टैरिफ इसी स्तर पर रहते हैं तो दक्षिण पूर्व एशिया पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा और सबसे अधिक नुकसान वियतनाम को होगा। नुकसान सिर्फ निर्यात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश में भी कमी आएगी।”

गुयेन कहती हैं, “चाइना प्लस वन स्ट्रैटजी का पोस्टर चाइल्ड वियतनाम अपनी ही सफलता का शिकार हो गया है। दुनिया के सबसे बड़े आयातक अमेरिका का विकल्प बहुत मुश्किल है। चीन की खपत टारगेटेड है और वहां सरप्लस सप्लाई खप नहीं सकती है। अमेरिका का ट्रेड बैरियर बढ़ने पर चीन की सरप्लस सप्लाई एशियाई देशों में डंप होगी।”

ओआरएफ के विवेक मिश्रा बताते हैं, “इन देशों के खिलाफ ज्यादा टैरिफ का एक कारण यह भी है कि चीन ने इन देशों को अपना माल अमेरिका में डंप करने का रास्ता बना लिया था। इन मध्यवर्ती देशों पर टैरिफ का प्रभाव आखिरकार चीन पर पड़ेगा। यह चीन पर लगाए गए टैरिफ से अलग होगा।”

भारत-अमेरिका कृषि व्यापार

भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार बड़े पैमाने पर होता है। अमेरिकी कृषि मंत्रालय (USDA) के अनुसार, वर्ष 2024 में अमेरिका के कृषि निर्यात में भारत 12वें स्थान पर था। अमेरिका ने भारत को कुल 2.27 अरब डॉलर का कृषि निर्यात किया। तीन साल का औसत 2.15 अरब डॉलर है और 2015-24 के दौरान सालाना औसत वृद्धि 6.1% रही। भारत को अमेरिका कृषि वस्तुओं का भी निर्यात बढ़ाना चाहता है।

USDA के मुताबिक अमेरिका के खाद्य एवं कृषि निर्यात से वहां लगभग 10 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। यह हर साल अर्थव्यवस्था में 200 अरब डॉलर का योगदान करता है। भारत ने 2023 में अमेरिका से ड्राइ फ्रूट पेकन पर आयात शुल्क 100% से घटाकर 30% किया था। उसी साल अखरोट और बादाम पर भारत ने जवाबी (रिटैलिएटरी) टैरिफ हटा लिया था।

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ट्रंप टैरिफ का अमेरिका पर असर

व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट के मुताबिक वर्ष 2024 में अमेरिका का वस्तु व्यापार घाटा रिकॉर्ड 1.2 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गया था। वर्ष 2023 में ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में अमेरिका की मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 17.4% रह गया जो 2001 में 28.4% था। व्हाइट हाउस में व्यापार मामलों के सीनियर काउंसलर पीटर नवारो ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन के नए टैरिफ से हर साल करीब 600 अरब डॉलर और 10 वर्षों में 6 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर मिलने की उम्मीद है। ऑटोमोबाइल आयात पर टैरिफ से अमेरिका को हर साल करीब 100 अरब डॉलर का शुल्क मिलेगा।

फैक्ट शीट में दावा किया गया है कि पेट्रोल-डीजल कारों पर अमेरिका 2.5% टैरिफ लगाता है, जबकि यूरोपियन यूनियन में यह 10% और भारत में 70% है। नेटवर्किंग स्विच और राउटर पर अमेरिका में जीरो ड्यूटी है जबकि भारत इन पर 10% से 20% शुल्क लगाता है। इथेनॉल पर अमेरिका के 2.5% की तुलना में ब्राजील का टैरिफ 18% और इंडोनेशिया का 30% है। अमेरिका में सेब आयात पर कोई शुल्क नहीं है जबकि तुर्की इन पर 60.3% और भारत 50% शुल्क लगाता है। मोस्ट फेवर्ड नेशन के साथ अमेरिका का औसत टैरिफ दुनिया में सबसे कम 3.3% है, जबकि ब्राजील में यह 11.2%, चीन में 7.5%, यूरोपियन यूनियन में 5%, भारत में 17% और वियतनाम में 9.4% है।

टैरिफ के साथ महंगाई बढ़ने की आशंका में अमेरिकी नागरिकों ने खर्च करना कम कर दिया है। अमेरिका के ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक एनालिसिस के मुताबिक जनवरी और फरवरी में अमेरिकी नागरिकों ने खपत पर खर्च से ज्यादा बचत की। फरवरी में वास्तविक व्यक्तिगत खपत व्यय 16.6 अरब डॉलर था, जबकि बचत 73.3 अरब डॉलर पर पहुंच गई।

द इकोनॉमिस्ट के लिए यू-गॉव (YouGov) के एक सर्वेक्षण में 61% अमेरिकी नागरिकों ने कहा कि टैरिफ बढ़ने पर आम लोगों को नुकसान होगा। सिर्फ 14% को लगता है कि इससे उन्हें लाभ होगा। बाकी लोगों में 7% ने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा और 18% ने कहा कि वे इसके नतीजों को लेकर निश्चित नहीं हैं।

बैंक ऑफ जापान के गवर्नर काजुओ उएदा ने बुधवार को कहा कि अमेरिका के टैरिफ वैश्विक विकास को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा, अमेरिका की टैरिफ नीति का विश्व अर्थव्यवस्था पर असर बेहद अनिश्चित है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि ये हर देश की व्यापारिक गतिविधियों पर बड़ा प्रभाव डालेंगे। बड़ा सवाल है कि ये टैरिफ हाउसहोल्ड और कंपनियों के सेंटीमेंट तथा खर्च को किस तरह प्रभावित करते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अतिरिक्त टैरिफ से मिलने वाली रकम से टैक्स में छूट की भरपाई करना चाहते हैं। ट्रंप ने पहले कार्यकाल में 2017 में टैक्स में जो कटौती की थी उसकी अवधि 2025 के अंत में खत्म हो जाएगी। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक द टैक्स फाउंडेशन का आकलन है कि टैक्स में इस कटौती को जारी रखने पर 2025 से 2034 के दौरान सरकार को 4.5 लाख करोड़ डॉलर कम राजस्व मिलेगा। एक अन्य थिंक टैंक टैक्स पॉलिसी सेंटर के अनुसार टैक्स कटौती को जारी रखने पर हर आय वर्ग के अमेरिकी नागरिकों को लाभ होगा, लेकिन जिन परिवारों की आय अधिक है उन्हें ज्यादा फायदा मिलेगा।

व्हाइट हाउस फैक्ट शीट में दावा किया गया है कि भारत केमिकल, टेलीकॉम प्रोडक्ट और चिकित्सा उपकरणों पर अतिरिक्त टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की शर्त लगाता है। इससे अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में अपने उत्पाद बेचना महंगा या मुश्किल हो जाता है। अगर इन बाधाओं को खत्म किया जाए तो भारत को अमेरिका का निर्यात सालाना 5.3 अरब डॉलर बढ़ सकता है।

क्या करे भारत

ओआरएफ के विवेक मिश्रा के अनुसार, सवाल है कि एशियाई देशों से निकलने वाले निवेश को भारत कितना आकर्षित कर पाता है। यह भारत के लिए अवसर है। भारत ने रियायत बरतने के संकेत दिए हैं और आगे भी कुछ वस्तुओं पर टैरिफ घटा सकता है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत भी चल रही है। सितंबर तक इसका कोई ढांचा तय हो सकता है। इस बातचीत में टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी और कृषि उत्पाद भारत के लिए अहम होंगे। ट्रंप हमेशा कहते आए हैं कि भारत के प्रधानमंत्री के साथ उनके अच्छे रिश्ते हैं। शायद यही कारण है कि भारत के खिलाफ ट्रंप का रवैया चीन तथा अन्य देशों जैसा नहीं है।

GTRI के श्रीवास्तव के अनुसार, इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने के लिए भारत को बड़े सुधार करने की जरूरत पड़ेगी, ताकि वैल्यू एडेड और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत किया जा सके। भारत को अमेरिका से सभी वस्तुओं के आयात पर शुल्क घटाना जरूरी नहीं और यह ठीक भी नहीं होगा। उदाहरण के लिए भारत में ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा आधार है। अमेरिका से कार आयात पर टैरिफ कम करने से भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को नुकसान होगा। इसलिए भारत को चुनिंदा रूप से उन प्रोडक्ट पर ड्यूटी कम करनी चाहिए जिनमें निर्यात की संभावना है और उससे स्थानीय उद्योगों को कोई नुकसान नहीं होगा। भारत के लिए अवसर सभी वस्तुओं पर टैरिफ घटाने में नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से सुधार करने और रणनीतिक विकल्प चुनने में है।

ICEA के मुताबिक रेसिप्रोकल टैरिफ का मुख्य आधार टैरिफ-नॉन टैरिफ बाधाओं के बजाय द्विपक्षीय व्यापार घाटा लग रहा है। टैरिफ गणना का तरीका स्पष्ट नहीं होने के कारण आगे बातचीत में अनिश्चितता रहेगी। ब्राजील, तुर्की, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (प्रत्येक पर 10%) और फिलिपींस पर 17% टैरिफ भारत की तुलना में कम है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात एसईजेड और प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग वातावरण के कारण निकट भविष्य में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को चुनौती दे सकते हैं। ट्रेड बाधाओं के बावजूद ब्राजील के खिलाफ कम टैरिफ का कारण अस्पष्ट है और इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

एसोसिएशन ने इंडस्ट्री और सरकार के हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका के साथ सघन बातचीत जारी रखने की सिफारिश की है। राष्ट्रपति ट्रंप के एक्जीक्यूटिव आदेश में स्पष्ट है कि रेसिप्रोकल टैरिफ के जवाब में कोई देश टैरिफ बढ़ाता है, तो राष्ट्रपति उस पर और टैरिफ लगा सकते हैं। इसलिए एसोसिएशन ने जवाबी टैरिफ न लगाकर बातचीत की सिफारिश की है।