नई दिल्ली, जेएनएन। Locust Warning Organization भारत पर एक बार फिर टिड्डियों के दल ने हमला कर दिया है। देश के अलग-अलग इलाकों में टिड्डियों के हमले से लोग परेशान हैं। हालांकि भारत में टिड्डियो से बचाव की कोशिशें सालों पहले शुरू हो चुकी थी और भारत में दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम है। 1926 और 1931 के मध्य टिड्डियो के हमले से परेशान ब्रिटिश सरकार ने 1939 में कराची में टिड्डी चेतावनी संगठन (एलडब्ल्यूओ) की स्थापना की थी।

आजादी से पहले और बाद में देश पर कई बार हुआ है टिड्डियों का हमला: 1939 और 1946 के मध्य तक एलडब्ल्यूओ का कार्य टिड्डियों की निगरानी करना और तत्कालीन भारतीय राज्यों को रेगिस्तानी टिड्डियों के झुंड, उनकी गतिविधियों और प्रजनन की संभावनाओं के बारे में चेतावनी जारी करना था। 1946 में एलडब्ल्यूओ कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के पादप संरक्षण, संगरोध और भंडारण निदेशालय के पास दिल्ली चला गया। भारत में 1812, 1821, 1843-44, 1863-67, 1869-73, 1876-81, 1889-98, 1900-1907, 1912-1920, 1926-1931, 1940-1946, 1949-1955, 1959-1962, 1978, 1993, 1997, 2005 और 2010 में टिड्डियों के विभिन्न हमले हुए।

एलडब्ल्यूओ ऐसे करता है काम : एलडब्ल्यूओ में 250 कर्मचारी हैं। ये टिड्डियों की आबादी का सर्वेक्षण करते हैं और दो सप्ताह में एक बार बुलेटिन जारी करते हैं। एलडब्ल्यूओ कृषि और सहयोगी विभागों के लिए सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार और प्रस्तुत करता है। साथ ही टिड्डियों के नियंत्रण के लिए कार्य की निगरानी करता है। राज्य सरकारों और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के साथ टिड्डियों के नियंत्रण के लिए समन्वय स्थापित करता है। एलडब्ल्यूओ के मुताबिक, टिड्डियों के सीजन (जून से नवंबर) के मध्य यह भारत-पाकिस्तान के अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित करता है, जिसमें दोनों देश एक दूसरे से जानकारी साझा करते हैं। संभावित प्रकोप से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के साथ समन्वय किया जाता है।

फसलों को हुआ था नुकसान : संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के वरिष्ठ मरुस्थलीय अधिकारी कीथ सेरेसमैन ने पिछले दिनों कहा था कि भारत में सबसे पुराना राष्ट्रीय टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम है। एफएओ कमीशन के अनुसार, 1926 से 1931 तक पांच साल चले टिड्डियों के हमले में करीब 2 करोड़ रुपए की फसलों को नुकसान हुआ। चारे और चरागाहों के नष्ट होने से बड़ी संख्या में मवेशियों की मृत्यु हो गई।

भारत में ऐसे होता है फसलों का बचाव : एलडब्ल्यूओ की 50 सदस्यीय टीम टिड्डियों के झुंड की मॉनिटरिंग और इसे ट्रैक करती हैं। ड्रोन के माध्यम से बिना फसलों वाले स्थान पर मैलाथियन 96 रसायन का छिड़काव किया जाता है। वहीं फसलों पर ड्रोन, फायरब्रिगेड और ट्रैक्टर के जरिए क्लोरफिरिफोस का छिड़काव किया जाता है।

टिड्डियों के बारे में जानिए सब कुछ अफ्रीका से भारत पहुंची हैं टिड्डियां: यह टिड्डियां अफ्रीका में पैदा हुई, जहां अत्यधिक बारिश ने इनके प्रजनन को बढ़ाने का काम किया। भारतीय विशेषज्ञों के अनुसार, टिड्डियों के झुंड में बलूचिस्तान, ईरान और पाकिस्तान में प्रजनन के कारण बढोतरी हुई है।

खाद्य पदार्थो को कर जाती हैं चट: पूर्वी अफ्रीका में इनकी बढ़ती संख्या खतरे की घंटी है। यहां पर ढाई करोड़ से अधिक लोग 2020 के आखिरी छह महीनों में खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगे। यमन में जहां पर टिड्डियां प्रजनन करती हैं, 1.7 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं। टिड्डियों का एक वर्ग किमी लंबा झुंड एक दिन में 35 हजार लोगों के बराबर खाना खा सकता है।

टिड्डियां लोगों को नहीं करती बीमार: टिड्डियां लोगों और जानवरों पर हमला नहीं करती हैं। इस बात का भी कोई तथ्य नहीं है कि वह बीमारियों को लाकर मनुष्यों को बीमार करती हैं।

संभव है नियंत्रित करना: टिड्डियों का दल एक दिन में 150 किमी तक जा सकता है। यह झुंड विशाल क्षेत्र में होता है और इसी कारण से उनका पीछा करना भी मुश्किल होता है। परंपरागत रसायनों के प्रयोग से इनकी संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। अब प्राकृतिक कीटनाशकों की मदद से भी इसके प्रकोप को कम किया जा सकता है।

... तो तैयार हो जाएगी नई पीढ़ी: यदि हम इन्हें नियंत्रित करने में सफल नही होते हैं तो वयस्क होने वाली टिड्डियों का दल ग्रीष्मकालीन प्रजनन क्षेत्र पाकिस्तान के रेगिस्तानी बॉर्डर के पास वापस आ जाएगा। यदि अच्छी बारिश होती है तो रेगिस्तानी टिड्डियों की एक नई पीढ़ी तैयार हो जाएगी, जो फिर से हमारी चिंता को बढ़ा देगी।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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