नई दिल्ली, (उमानाथ सिंह)। साल 2019 राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल से भरा रहा। इन बदलावों का असर देश के लगभग सभी हिस्सों और लोगों पर दिखा। ऐसे में अब सबकी निगाहें 2019 के इन बदलावों से उपजी 2020 की चुनौतियों पर है। साफ तौर पर साल 2020 की इन चुनौतियों को अगर हम अवसर में बदलने में कामयाब रहते हैं तो यह साल उपलब्धियों से भरा हो सकता है, हालांकि यह इतना आसान नहीं है। ऐसे में इन चुनौतियों को जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है- 

सबसे पहले हम 2020 की राजनीतिक चुनौतियों की बात करते हैं। 2019 के अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा को भले ही 303 सीटें मिली हों और राज्यसभा से भी उसने कई अहम बिल पास करवा लिए हों, लेकिन 2019 में हुए विधानसभा चुनावों में उसे कई राज्यों में या तो हार का सामना करना पड़ा, या फिर राजनीतिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। साल के आखिरी महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उसकी चुनौतियां और बढ़ा दीं।

2020 के शुरुआती महीनों- जनवरी-फरवरी में दिल्ली और फिर सितंबर-अक्टूबर में बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य के विधानसभा चुनाव होने हैं। दिल्ली और बिहार के बाद 2021 के अप्रैल-मई में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पांडिचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव होंगे। इन राज्यों में भाजपा के लिए जीत हासिल करना न सिर्फ राजनीतिक और चुनावी कारणों से जरूरी है, बल्कि संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

लोकसभा में भले ही भाजपा के पास बहुमत है, लेकिन किसी अहम बिल को पारित कराने के लिए अभी राज्यसभा में उसे अन्य दलों के साथ मोलभाव करना पड़ता है। जबकि चार चरणों में 2020 के फरवरी, जून, जुलाई और नवंबर में राज्यसभा की 73 सीटों के लिए चुनाव होने हैं। लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों में जीत के बिना ये सीटें जीतना उसके लिए मुश्किल होगा। इस तरह 2020 में उसके लिए चुनावी चुनौतियां बनी रहेंगी।

2019 के आखिरी महीनों में सीएए (सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट), प्रस्तावित एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) और एनपीआर (नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर) पर देशभर में प्रदर्शन हुए। धारा 370 और राम मंदिर पर अभी भी कुछ हलकों में बहस जारी है। रोजगार और अन्य आर्थिक मानकों के उत्साहवर्धक नहीं रहने से लोगों का गुस्सा और भड़क गया। इन राजनीतिक मुद्दों पर विपक्षी दलों का विरोध अभी भी शांत नहीं हुआ है। साफ तौर पर ये राजनीतिक आंदोलन 2020 में भी सरकार के लिए चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।

जिस तरह से पहले महाराष्ट्र और फिर झारखंड में विपक्षी एकता के कारण भाजपा सरकार नहीं बन पाई, उससे विपक्षी खेमा इस रणनीति पर गंभीरता से विमर्श करने लगा है। वे चाहते हैं कि मोदी-शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को हराने के लिए वे देशभर में इसी तरह की रणनीति पर काम करें। उससे पहले 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश और लालू यादव के हाथ मिलाने और फिर 2017 के यूपी उपचुनावों में मायावती और अखिलेश यादव के हाथ मिलाने से भाजपा को शिकस्त खानी पड़ी थी। ऐसे में 2020 में भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती है।

राजनीतिक और चुनावी चुनौतियों के साथ ही 2020 में मोदी सरकार के लिए आर्थिक मोर्चे पर भी कई चुनौतियां हैं। सभी तरह के सर्वे और सरकारी-गैरसरकारी रिपोर्टों से साफ है कि इंडियन इकोनॉमी पिछले कुछ समय से खराब स्थिति में है। दिसंबर तिमाही को ले लें तो पिछले सात तिमाहियों से इकोनॉमी की ग्रोथ में लगातार कमी आ रही है। ऑटो, रियल एस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन से लेकर अधिकांश सेक्टरों की हालत खराब है। बिजनेस और इन्वेस्टमेंट सेंटिमेंट खराब है। इससे जॉब फ्रंट पर सरकार के चुनौती और बढ़ गई है, जबकि करोड़ों युवाओं को रोजगार की जरूरत है।

इकोनॉमी को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने 32 से अधिक उपाय किए हैं। वित्त मंत्री ने बाकायद संसद में इन 32 उपायों का जिक्र किया। इसके बावजूद इकोनॉमी बेहतरी की तरफ जाती नहीं दिख रही है। अब सबकी नजरें एक फरवरी को पेश होने वाले बजट पर हैं। उम्मीद की जा रही है कि सरकार इसमें कई अन्य सुधारों की घोषणा कर सकती है।

विदेश नीति के फ्रंट पर भी भारत के समक्ष इस साल कई सारी चुनौतियां हैं। 2019 के दिसंबर में भारत और जापान के प्रधानमंत्री की बैठक असम के गुवाहाटी में प्रस्तावित थी, लेकिन सीएए पर राज्य में हो रहे हिंसक आंदोलन के कारण इसे स्थगित करना पड़ा। इसके अलावा, बांग्लादेश के विदेश मंत्री ए के अब्दुल मोमेन ने भी भारत की अपनी यात्रा स्थगित कर दी। इसी तरह, वाशिंगटन डीसी में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर यूएस हाउस ऑफ रीप्रजेंटेटिव के फॉरेन रिलेशंस कमिटि से मिलने वाले थे, लेकिऩ कश्मीर मुद्दे पर भारतीय रुख की बड़ी आलोचक प्रमिला जयपाल की उपस्थिति के कारण जयशंकर ने इसमें हिस्सा नहीं लिया, जिसकी काफी आलोचना हुई। यूएस राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ इंपीचमेंट लाने के बीच 2020 के नवंबर में होने जा रहे यूएस राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के सपोर्ट को लेकर ऊहापोह, मोदी सरकार द्वारा कश्मीर से धारा 370 हटाने और सीएए कानून बनाने जैसे कदम से भारत समर्थक अमेरिकी सांसदों के लिए भी खुलकर भारत का समर्थन करना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार एलिजाबेथ वारेन खासकर कश्मीर मामलों में भारत की बड़ी आलोचक हैं।

भारत के वर्तमान कदम से 2020 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर पर बहस और तेज होने की संभावना है। पश्चिमी मुल्कों के प्रभावशाली ह्यूमन राइट्स संगठनों के अनुसार, एक धर्मनिरपेक्ष और उदार देश के रूप में भारत की परंपरागत छवि को इससे धक्का पहुंचा है। पिछले साल अमेरिका के टेक्सास में हाउडी मोदी समारोह में मोदी द्वारा अनौपचारिक तौर पर ट्रंप का समर्थन करते हुए दिखना भी अमेरिका के प्रभावशाली विपक्षी नेताओं को अच्छा नहीं लगा। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मोदी द्वारा ट्रंप को समर्थन किए जाने का खंडन भी किया, लेकिन यूएस राजनीति में मैसेज ठीक नहीं गया।

सीएए और कश्मीर नीतियों से भारत की दक्षिण एशिया पॉलिसी भी प्रभावित हुई है। इसके कारण बांग्लादेश से भारत के अच्छे संबंधों पर भी असर हुआ है। भारत विरोध करने वालों में मलेशिया, तुर्की और कतर के साथ ईरान, सऊदी अरब और यूएई भी शामिल हो सकते हैं, क्योंकि उनके लिए भी अधिक समय तक चुप रहना कठिन है, जबकि भारत ने हाल के वर्षों में इन मुल्कों से अच्छे संबंध बनाने के लिए कई सफल प्रयास किए हैं। इसी तरह चीन की चुनौतियां भी लगातार बनी हुई हैं। उसने 2019 के आखिर में रूस, दक्षिण अफ्रीका और ईरान के साथ मिलकर वेस्टर्न इंडियन ओसन में सैन्य अभ्यास किया, जिसे भारत कतई पसंद नहीं करता। 

Posted By: Umanath Singh

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