अब कच्चे तेल के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहेगा भारत, सरकार ने बनाया 'मास्टर प्लान'
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण भारत ने कच्चे तेल आयात रणनीति में बदलाव किया है। अब भारत अपनी ...और पढ़ें

खाड़ी देशों पर क्रूड की निर्भरता में भारी कटौती करेगा भारत। (रॉयटर्स)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जयप्रकाश रंजन,नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल-अमेरिका के बढ़ते संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शिपिंग बाधाओं को देखते हुए भारत सरकार ने कच्चे तेल आयात की रणनीति में तत्काल बदलाव कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के बीच उच्च-स्तरीय सामंजस्य बिठाया गया है कि क्षेत्रीय स्थिति स्थिर होने तक भारत अपनी 85-88 प्रतिशत आयात निर्भरता को मुख्य रूप से गैर-खाड़ी स्त्रोतों (रूस, अमेरिका, नाइजीरिया, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) से पूरा करने की तरफ बढ़ चला है। इस रणनीति के तहत रूस से 2023-24 की तरह ही बड़े पैमाने पर क्रूड खरीद फिर शुरू हो सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने हाल ही में 30 दिन की विशेष छूट जारी कर दी है, जिससे रूसी तेल के 'सी-बॉर्न' कार्गो की भारत तेजी से खरीद कर रहा है। नाइजीरिया और अंगोला जैसे पश्चिम अफ्रीकी देशों से भी सीधी आपूर्ति बढ़ाने के लिए रिलायंस, एचपीसीएल और अन्य रिफाइनरियां बातचीत कर रही हैं। साथ ही कुछ सौदे भी हो चुके हैं। सरकार के तीनों मंत्रालय इस फैसले को अमल में लाने में सक्रिय हैं।
विदेश मंत्रालय कूटनीतिक समर्थन और अमेरिकी छूट का उपयोग करेगा
वाणिज्य मंत्रालय व्यापार समझौतों पर नजर रखेगा और पेट्रोलियम मंत्रालय रिफाइनरियों को वैकल्पिक ग्रेड्स से जोड़ेगा। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने हाल ही में कहा, “नान-होर्मुज स्त्रोत 2025 में 60 प्रतिशत थे, अब तनाव के बाद 70 प्रतिशत हो गए हैं। आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है।'' इसी बीच सरकारी अधिकारियों का मानना है कि शुक्रवार को ट्रंप प्रशासन ने ईरान की तेल की बिक्री में सर्शत छूट देने का जो फैसला किया है उससे भारत को बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने वाला।
बड़ा लाभ चीन को मिलेगा
पिछले कई वर्षों से ईरान का 90 प्रतिशत से अधिक तेल चीन ही खरीद रहा है और उसके पास पहले से ही ऐसे कार्गो की खरीदारी के मजबूत नेटवर्क, छूट वाले रिफाइनरियां और 'शैडो फ्लीट' हैं। भारत ने 2019 के बाद ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर दिया था, इसलिए इस छूट से नए सौदे या डायरेक्ट लाभ नहीं होगा।
ऐतिहासिक रूप से भारत की क्रूड खरीद में खाड़ी क्षेत्र (सऊदी अरब, यूएई, ईरान) की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक थी। लेकिन पिछले दशक में विविधीकरण की नीति ने इसे काफी कम किया। फरवरी 2022 में रूस की हिस्सेदारी मात्र 0.2 प्रतिशत थी, जो 2024 में 37 प्रतिशत और 2025 में औसतन 35-36 प्रतिशत तक पहुंच गई। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद यह 2025 में भी 33 प्रतिशत के आसपास रही।
40 देशों से तेल खरीद रहा है भारत
सूत्रों का कहना है कि वर्तमान तनाव और अमेरिकी छूट के बाद यह 40 प्रतिशत तक जा सकती है। भारत पहले दर्जन भर देशों से कच्चे तेल खरीदता था आज यह 40 देशों से खरीद रहा है। अप्रैल-नवंबर 2025 में भारत का कुल आयात 17.8 करोड़ टन रहा था जिसमें छह करोड़ टन सिर्फ रूस से था। रूस और अटलांटिक क्षेत्र (अमेरिका, नाइजीरिया) पर ज्यादा निर्भरता से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत तो होगी लेकिन इन क्षेत्रों से तेल भारत तक आने में ज्यादा वक्त लगेगा।
रूस से तेल पहुंचने में औसत 15-18 दिन लगते हैं, अमेरिका से 25-31 दिन, जबकि खाड़ी से सिर्फ 4-7 दिन। साथ ही रूस से तेल खरीदने के लिए लंबी दूरी की लागत थोड़ी बढ़ने की संभावना है। इसकी भरपाई के लिए सरकार रूस से अतिरिक्त डिस्काउंट हासिल करके और स्वेज नहर के वैकल्पिक रूट का इस्तेमाल करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बातचीत कर रही है।
खाड़ी से तेल आपूर्ति तकरीबन पूरी तरह से ठप
वास्तव में गैर-खाड़ी स्त्रोतों से बढ़ी खरीद की वजह से 20 दिनों तक खाड़ी से तेल आपूर्ति तकरीबन पूरी तरह से ठप हो जाने के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों पर कोई दबाव नहीं पड़ा। साथ ही भारत के किसी भी पेट्रोल पंप पर पेट्रोल व डीजल की किल्लत नहीं है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान ने तनाव के बीच पेट्रोलियम खपत कम करने के कड़े कदम उठाए हैं, हफ्ते में कार्यालय चार दिन ही खोले जा रहे हैं और सरकारी विभागों को ईंधन आपूर्ति आधी कर दी गई है। अन्य एशियाई देश भी इसी राह पर हैं, जबकि भारत का विविधीकरण रणनीति ने उसे बफर दे दिया है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रूड आयातक- आइईए
अंतरराष्ट्रीय इनर्जी एजेंसी (आइईए) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रूड आयातक बन चुका है। 2023 में आयात भारत ने 46 लाख बैरल प्रतिदिन था आयात किया थो वर्ष 2030 तक 58 लाख बैरल प्रति दिन हो सकता है। घरेलू उत्पादन बढ़ाने की भारत सरकार की कोशिशें खास काम नहीं कर पाई हैं। आयात पर निर्भरता पिछले एक दशक में 78 फीसद से बढ़ कर 87-88 फीसद तक हो चुकी है, जिससे आपूर्ति सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बनी रहती है।
