भारत कपास की खेती में सबसे आगे, लेकिन पैदावार में क्यों पीछे? Inside Story
भारत कपास की खेती में दुनिया में सबसे आगे है, लेकिन प्रति हेक्टेयर पैदावार में काफी पीछे है। इसका मुख्य ...और पढ़ें

भारत कपास रकबे में अग्रणी, पर पैदावार में पिछड़ा

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कपास की खेती में भारत दुनिया में सबसे आगे और पैदावार में पीछे है। विश्व के कुल कपास रकबे का करीब 37 प्रतिशत भारत में है, मगर उत्पादन में हिस्सेदारी सिर्फ 20 प्रतिशत है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन में आस्ट्रेलिया-चीन ही नहीं, पाकिस्तान से भी हम पीछे हैं।
इसकी प्रमुख वजह उन्नत बीज और खेती की तकनीक का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं होना है। स्थिति है कि सरकारी मंजूरी नहीं मिलने के बावजूद हर्बिसाइड टालरेंट बीटी (एचटीबीटी) कपास की खेती तेजी से फैल रही है। विश्व मे अमेरिका, अस्ट्रेलिया, ब्राजील, अर्जेंटीना जैसे बड़े उत्पादक देश एचटीबीटी का ही प्रयोग करते हैं।
पैदावार में पिछड़ने की वजह क्या है?
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया ने प्रेस कान्फ्रेंस में बताया कि देश में अभी बीटी काटन की खेती को ही मंजूरी है। फिर भी 25 से 30 प्रतिशत कपास क्षेत्र में ऐसे एचटीबीटी बीजों का इस्तेमाल हो रहा है, जिन्हें मंजूरी नहीं मिली है।
खरीफ 2025-26 में 65 से 72 लाख एकड़ में एचटीबीटी बीज से खेती हुई है। इन अनधिकृत बीजों का समानांतर बाजार करीब 1,500 करोड़ रुपये का है।
साउथ एशिया बायोटेक्नोलाजी सेंटर के साथ नेशनल सीड एसोसिएशन आफ इंडिया की स्टडी में एचटीबीटी बीज का इस्तेमाल महाराष्ट्र में सबसे अधिक हो रहा है। इसके बाद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का स्थान है।
एफएसआईआई के चेयरमैन अजय राणा ने बताया कि देश में एचटीबीटी को पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली है। प्रस्ताव जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रीजल कमेटी (जीईएसी) के विचाराधीन है और मंजूरी जैव-सुरक्षा तथा पर्यावरणीय आकलन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत होनी है।
कपास भारत के कपड़ा उद्योग की रीढ़
समस्या यही पर है। कपास भारत के कपड़ा उद्योग की रीढ़ है। इस उद्योग में करीब 4.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। इसलिए कपास की उत्पादकता बढ़ाना सिर्फ खेती का मुद्दा नहीं है।
यह किसानों की आय, कपड़ा उद्योग की लागत और निर्यात प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा है। बड़े रकबे के बावजूद कम उपज की चुनौती से निपटने के लिए उन्नत बीज, बेहतर तकनीक और सुरक्षित खर-पतवार प्रबंधन को साथ लेकर चलना होगा।
अनधिकृत बीजों से खेती का सबसे बड़ा कारण लागत है। कपास की फसल में खर-पतवार की समस्या से निपटने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है।
लेकिन गांवों में मजदूरों की कमी और निराई-गुड़ाई महंगी है। मजदूर लगाकर खर-पतवार निकालने पर प्रति एकड़ 12,000 से 15,000 रुपये तक खर्च आता है।
दूसरी ओर एचटीबीटी बीज से खेती में किसान ग्लाइफोसेट का छिड़काव कर खर-पतवार को नियंत्रित करते हैं। इसमें प्रति एकड़ 750 से 850 रुपये खर्च आता है। जाहिर है, लागत में बड़ा फर्क है। यही कारण है कि सरकारी मंजूरी नहीं होने के बावजूद ऐसे बीजों की खेती बढ़ती जा रही है।
बाक्सउत्पादन में पाकिस्तान से भी पीछे
असली चुनौती उत्पादकता में है। आस्ट्रेलिया में प्रति हेक्टेयर करीब 2,000 किलोग्राम लिंट कपास का उत्पादन होता है। चीन में यह करीब 1,400 किलोग्राम है। पाकिस्तान भी 600 किलोग्राम उत्पादन कर लेता है।
भारत में यह आंकड़ा महज 435 किलोग्राम है। जाहिर है, कपास का रकबा ज्यादा है, मगर उत्पादन कम है। इसका सीधा असर किसानों की आय और देश के कपड़ा उद्योग की प्रतिस्पर्धा पर पड़ता है।
