अमिताभ भूषण। तुमने दिया देश को जीवन, देश तुम्हें क्या देगा, अपनी आग तेज रखने को, नाम तुम्हारा लेगा- रामधारी सिंह दिनकर के इस भाव की अनुभूति जब स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में संपूर्ण भारत कर रहा है, ठीक उसी समय दुनिया के कई देश अपने अपने यहां भारतवंशियों के आगमन और उनके योगदान का स्मरण उत्सव मना रहे हैं।

प्रशांत महासागर का रमणीक देश फिजी आज 143वां गिरमिट स्मरण दिवस मना रहा है। फिजी के लोग आज अपने उन गिरमिटिया पुरखों का पुण्य स्मरण कर रहे हैं जिन्होंने अपने संघर्ष, श्रम और साधना के बूते फिजी को प्रशांत का स्वर्ग बनाया। इस देश के साथ भारत के आधुनिक संबंधों की शुरुआत 14 मई 1879 को हुई थी। यही वह तिथि है जब भारतवंशी गिरमिटियों का पहला समूह फिजी की धरती पर उतारा गया था। इस समूह में लगभग 500 गिरमिटिया थे।

तीन मार्च 1879 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से गिरमिटियों को लेकर चले ‘लेवनीडास’ नामक जहाज को उस समय फिजी पहुंचने में लगभग ढाई माह का समय लगा था। वर्ष 1879 में शुरू हुआ गिरमिटियों का यह सफर वर्ष 1916 में गिरमिट के खत्म होने तक बदस्तूर जारी रहा। फिजी में गिरमिट काल के लगभग 37 वर्षो के दौरान 42 जहाजों के माध्यम से 60 हजार से अधिक गिरमिटियों को फिजी भेजा गया था। ‘सतलज पांच’ वह आखिरी जहाज था जिसने गिरमिटियों की अंतिम खेप साल 1916 में फिजी पहुंचाई थी।

पुरखों का स्मरण : फिजी का गिरमिटिया स्मरण दिवस वास्तव में उन पुरखों के स्मरण का उत्सव है जिन्हें ब्रिटिश सरकार और उसके कारिंदों ने बहला-फुसलाकर और धमकाकर विदेश भेज दिया था। विदेश में उन पर किए गए अत्याचार के बावजूद गिरमिटियों का भारत भाव उनके आचार-विचार और व्यवहार में हमेशा बना रहा। दो पीढ़ियों तक जबरन निरक्षर रखे गए गिरमिटियों ने वाचिक परंपरा के माध्यम से अपनी भाषा, बोली, अपनी परंपरा, पूजा पद्धति, उत्सव, गीत, भजन आदि को न केवल अक्षुण्ण रखा, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को जस का तस हस्तगत भी करते गए। भारत की संस्कृति से फिजी को समृद्ध करने वाले गिरमिटियों ने अपमान और यातना को भूलकर फिजी की स्वाधीनता का अभियान शुरू किया। भारतीय मूल के तमाम फिजी निवासी नायकों के नेतृत्व में चले लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार 10 अक्टूबर 1970 को यह देश स्वाधीन हुआ। विजयादशमी के दिन फिजी की स्वाधीनता का प्रथम उत्सव भगवान राम के विजय उत्सव के साथ मनाया गया था। इससे वहां भारतीय संस्कृति का प्रभाव और गहराता गया।

सत्ता में महत्वपूर्ण भागीदारी : अतीत की गाथाओं से दशकों और पीढ़ियों की दूरी तय कर चुके फिजी के वर्तमान गिरमिटियावंशी आज इस देश की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। सरकार से शासन तक और व्यापार जगत से लेकर समाज तक, फिजी की हर व्यवस्था में गिरमिटिया पुरखों की संतति आज शीर्ष पर है। भारतीय संस्कृति और वंश की जड़ों से फिजी के जुड़ाव के कारण भारत फिजी संबंधों में नए और सुखद अध्यायों का जुड़ाव अभी निरंतर जारी है। वहां के बच्चों के लिए स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का निदान करने के लिए हाल ही में भारत के सहयोग से फिजी की राजधानी सुवा में एक चिल्ड्रेन हार्ट अस्पताल का निर्माण किया गया। इसी वर्ष 27 अप्रैल को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से इस अस्पताल का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा था, ‘भारत और फिजी के बीच विशाल समुद्र जरूर है जिससे हमारे बीच लंबी भौगोलिक दूरी है, लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें आपस में जोड़कर रखा है। भारत का यह सौभाग्य है कि हमें फिजी के सामाजिक-आर्थिक विकास में भूमिका निभाने और योगदान करने का अवसर मिलता रहा है। बीते दशकों में भारत और फिजी के रिश्ते हर क्षेत्र में लगातार आगे बढ़े हैं, मजबूत हुए हैं।’

उल्लेखनीय है कि गिरमिटियों ने समूचे विश्व में जिस भूमि पर कदम रखा, उस भूमि को उन्होंने उन्नत और उर्वर बना दिया। यही कारण है कि आज दुनियाभर के गिरमिटिया देश भारतवंशी श्रमनायकों को सम्मान के साथ याद करते हैं। कुछ देश अपने यहां भारतीय गिरमिटिया के आगमन का जश्न मनाते हैं, उनकी सफलता और समाज में योगदान का उत्सव मनाते हैं, तो कुछ देश गिरमिटिया पूर्वजों की मेहनत और उनकी कठिनाइयों को याद करते हैं। इसके लिए इन देशों में या तो सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई है या फिर स्मारकों के माध्यम से उन्हें याद करने का रिवाज है। फिजी में जहां आज यानी 14 मई ‘गिरमिट स्मरण दिवस’ है तो वहीं गुयाना में यह पांच मई को मनाया जाता है तो जमैका में 10 मई को भारतीय विरासत दिवस मनाया जाता है। मारीशस में दो नवंबर बंधुआ मजदूरों का आगमन दिवस है तो वहीं सूरीनाम में पांच जून को ‘भारतीय आगमन दिवस’ तो त्रिनिदाद और टोबैगो में 30 मई को भारतीय आगमन दिवस मनाया जाता है।

[सामाजिक मामलों के जानकार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal