यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 07, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
हवा में बढ़ती नमी भी बिगाड़ रही है मौसम, वैज्ञानिकों ने किया अलर्ट
वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के चलते साल 2100 तक बारिश का साइकिल बिगड़ जाए और बारिश ...और पढ़ें

नई दिल्ली, अनुराग मिश्र/विवेक तिवारी। पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन इस समय चिंता का विषय बना हुआ है। जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे बड़ा कारण वायुमंडल में बढ़ती गर्मी को माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने कई मॉडलों पर अध्ययन कर पाया है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए हवा में बढ़ती आर्द्रता भी जिम्मेदार है। अध्ययन में पाया गया कि 1980 से 2019 के बीच दुनिया में हवा के तापमान में 0.79°C की वृद्धि हुई है। जबकि उष्णकटिबंधीय इलाकों में कुछ जगहों पर 4 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि दर्ज की गई है। दुनिया भर में तापमान में 1.48 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। इस गर्मी के बढ़ने में हवा में तेजी से बढ़ता आर्द्रता का स्तर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि साल 2100 में बड़े बदलाव हो जाएंगी और प्राकृतिक आपदाएं बढ़ने के साथ ही हमारे आपके लिए जीवन काफी मुश्किल हो जाएगा।
धरती का तापमान बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह औद्योगिक विकास के चलते ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन माना जाता है। ग्रीन हाउस गैसों के चलते हवा का तापमान तेजी से बढ़ता है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के लिए ग्रीन हाउस गैसों को ही जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। हवा में मौजूद आर्द्रता ग्रीन हाउस गैसों से होने वाली गर्मी के प्रभाव को और बढ़ा देती हे। ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव अधिक महसूस होता है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि ग्लोबल वार्मिंग में वायुमंडल के बढ़ते तापमान, बढ़ती आर्द्रता के साथ ही लैटेंट एनर्जी के चलते ही मौसम में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं। इनके चलते हीट वेव, तूफान, तेज आंधी और बाढ़ जैसी घटनाएं देखी जा रही हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक हवा में बढ़ती आर्द्रता और latent energy जलवायु परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हाल के वर्षों में कुछ चरम मौसम की घटनाओं को भी इस मानवजनित वार्मिंग के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। बुलेटिन ऑफ अमेरिकी मौसम विज्ञान सोसायटी की ओर से 2017 में किए गए एक रिसर्च में निष्कर्ष निकाला गया, 'हम नए मौसम का अनुभव कर रहे हैं, क्योंकि हमने एक नया मौसम बनाया है। मौसम में लगातार बढ़ती गर्मी सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रही है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से बढ़ी गर्मी का अनुभव पूरी दुनिया के 80 फीसदी से अधिक भूभाग पर किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के डेटा के मुताबिक 1995 से 2015 के बीच 90 फीसदी आदपा के पीछे कारण खराब मौसम रहा। वहीं इन आपदाओं में लगभग 606,000 लोगों की जान गई और 4.1 करोड़ लोग या तो घायल हुए या वे बेघर हो गए। वहीं अगर 1985-1994 की तुलना में 2005- 2014 के बीच मौसम के चलते आने वाली आपदाओं की संख्या लगभग दो गुनी हो चुकी है। इन सबके पीछे बड़ी वजह तेजी से हो रहा जलवायु परिवर्तन है।'

ज्यादा बारिश लाएगी तबाही
वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के चलते साल 2100 तक बारिश का साइकिल बिगड़ जाए और बारिश सामान्य से 40 से 60 फीसदी तक ज्यादा दर्ज की जाएगी। जरूरत से ज्यादा बारिश होने पर कई जगहों पर बाढ़ और तूफान जैसी आपदाएं देखी जाएंगी।
बढ़ जाएगी हीट वेव
वैज्ञानिकों के मुताबिक साल 2100 तक हीट वेव या गर्म हवाएं दर्ज किए जाने के दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। हवा इतनी गर्म होगी कि खुले में किसी इंसान के लिए काफी देर तक काम कर पाना आसान नहीं होगी। इन गर्म हवाओं से इंसान के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और मुश्किल काफी बढ़ जाएगी।
तापमान बढ़ने से क्या हो रहे नुकसान
सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरनमेंट की रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ते रहने के कारण वर्षा, अतिविषमताओं, ग्लेशियर पिघलने एवं समुद्र स्तर वृद्धि की दर एवं पैटर्न में लगातार परिवर्तन होते रहे हैं। वर्ष 1993-2017 के दौरान उत्तरी हिन्द महासागर के समुद्र स्तर में प्रति वर्ष 3.3 मिमी की दर से बढ़ोतरी हुई है, जो वैश्विक माध्य के सदृश है। वैसे तो उत्तरी हिन्द महासागर में वृद्धि में उष्मीय विस्तार ने प्रमुख भूमिका निभाई है, वहीं समुद्री स्तर में वृद्धि का प्रमुख कारण ग्लेशियर का पिघलना रहा है।

तापमान में कथित वृद्धि के कारण प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम काफी बढ़ गया है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन वैश्विक है, लेकिन जलवायु में होने वाले परिवर्तन पूरी पृथ्वी पर एकसमान नहीं होते हैं, इसलिए प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम भी पूरी दुनिया में अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए, वैश्विक औसत की तुलना में आर्कटिक तापमान में काफी तेजी से वृद्धि हो रही है। पूरी दुनिया में समुद्री स्तर की दर में बहुत महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। वैश्विक महासागर के गर्म होने तथा हिम एवं ग्लेशियर पिघलने का एक परिणाम यह हुआ है कि समुद्र स्तर के औसत में बढ़ोतरी हो रही है। समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण अधिक जनसंख्या वाली तटीय आबादियों तथा विश्व की निचली सतह वाले द्वीपसमूहों पर स्थित देशों पर काफी अधिक दबाव पड़ सकता है।
हिन्द महासागर वाले क्षेत्र में काफी अधिक जनसंख्या है, इसमें बहुत से निचली सतह वाले द्वीपसमूह तथा तटीय क्षेत्र है तथा भरपूर मात्रा में समुद्री परितंत्र है। हिन्द महासागर के आसपास के क्षेत्रों में लगभग 2.6 अरब लोग रहते हैं, जो विश्व की 40 प्रतिशत जनसंख्या के बराबर है। एक तिहाई भारतीय जनसंख्या तथा अधिकांश एशियाई जनसंख्या तटीय क्षेत्रों में स्थित है। इसलिए समुद्री स्तर में वृद्धि के कारण जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर एवं समुद्री पारितंत्र के लिए लगातार चुनौतियां बढ़ सकती है।
तापमान बढ़ने पर हुए हैं ये शोध
अमेरिका स्थित युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सामने आया कि वर्षा पट्टी में यह बड़ा बदलाव जलवायु परिवर्तन के वैश्विक असर संबंधी पहले के अध्ययनों में सामने नहीं आया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया और उत्तरी अटलांटिक महासागर में तापमान बढ़ा है। इस ताजा अध्ययन के तहत पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध क्षेत्र में प्रतिक्रिया को अलग-अलग करके भारत में आगामी दशकों में आने वाले बड़े बदलावों को रेखांकित किया गया है। अध्ययन के सह लेखक एवं यूसी इरविन के वैज्ञानिक जेम्स रैंडरसन ने कहा कि एरोसोल उत्सर्जन में अनुमानित कमी, हिमालयी क्षेत्र में हिमनदी के पिघलने और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी क्षेत्रों में बर्फ का आवरण हटने से एशिया में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक तेजी से तापमान बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि इस गर्मी के कारण वर्षा पट्टी का स्थानांतरण और पूर्वी गोलार्ध में उत्तर की ओर इसकी गतिविधि जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों के अनुरूप है।

चीन, यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिकों के अध्ययन में सामने आया है कि आने वाले 50 सालों में भारत में मौसम का मिजाज और गड़बड़ाएगा। स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन की यही स्थिति जारी रही या वायुमंडल में मौजूद गैसों का तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो भारत का तापमान सहारा रेगिस्तान जितना गर्म हो जाएगा।
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में छपे अध्ययन में कहा गया है कि आने वाले सालों में भारत में 1.2 बिलियन लोग गर्मी के इस ताप का सामना करेंगे जबकि पाकिस्तान में 100 मिलियन, नाइजीरिया में 485 मिलियन गर्मी के इस प्रकोप का सामना करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा समय में दुनिया भर में मानव आबादी औसत सालाना तापमान छह डिग्री सेंटीग्रेड से लेकर 28 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में रहती है जो कि लोगों की सेहत और खाद्य उत्पादन के लिहाज से बेहतर है। पर यदि यह तापमान बढ़ता रहा तो इसका आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक असर होगा। इसकी वजह से मानव आबादी के लिए आजीविका, रहन-सहने से लेकर खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न होगी।
