नई दिल्‍ली, जेएनएन। स्वास्थ्य को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी कहा जाता है। इसी तरह एक राष्ट्र के लिए उसके लोगों का स्वस्थ होना भी उतना ही जरूरी है। वास्तव में विकास के कई मानक स्वास्थ्य से जुड़े हैं। 1947 में स्वाधीनता के समय स्वास्थ्य के विभिन्न मानकों पर देश की स्थिति चिंताजनक थी। बीते 75 वर्ष में देश ने स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वावलंबन की दिशा में कई अहम पड़ाव पार किए हैं। आजादी के समय जीवन प्रत्याशा मात्र 32 साल थी, जो आज 70 साल हो गई है। 1956 में पहले एम्स की स्थापना से आज हमने 15 एम्स तक का सफर तय कर लिया है। हम लगातार स्वावलंबन की राह पर बढ़ रहे हैं।

दुनिया का फार्मास्युटिकल हब बनने की राह पर हम: भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। विगत वर्षों में भारत ने लगातार अपनी इस स्थिति को मजबूत किया है। भारत को दुनिया में सस्ती दवाओं का गढ़ कहा जाता है। अफ्रीका के गरीब देशों में भारतीय दवा कंपनियों द्वारा निभाई जाने वाली जीवन रक्षक भूमिका फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भारत की वैश्विक सफलता की कहानियों में से एक है।

एक अनुमान के अनुसार, अफ्रीका हर साल लाखों एड्स रोगियों के इलाज पर लगभग 2 अरब डालर खर्च करता है। यूएनएड्स के कार्यकारी निदेशक मिशेल सिदीबे ने कहा था कि यदि भारत का सहयोग न मिलता तो इस खर्च में इलाज संभव नहीं था। यह लागत 150 अरब डालर पहुंच गई होती।

स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ाना आवश्यक: अध्ययन बताते हैं कि स्वास्थ्य पर होने वाला भारी-भरकम खर्च परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे पहुंचा देता है। दो-ढाई दशक पहले तक दुनिया के अधिकांश गरीब और विकासशील देशों में स्वास्थ्य पर अधिक सरकारी खर्च को अनुपयुक्त और फिजूल का खर्च समझा जाता था। अब  ऐसा नहीं है। यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च विकास मूलक और मानवीय खुशियों से संबंधित लाभप्रद निवेश है।

नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डीटन ने अपनी पुस्तक में कहा है कि महामारी और संक्रामक बीमारियां आर्थिक विकास के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारत में भी स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारी खर्च भी अपेक्षाकृत बहुत कम है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में स्वास्थ्य पर भारत में सरकारी खर्च दो प्रतिशत से भी कम है। जापान में यह नौ प्रतिशत से ज्यादा है। अमेरिका में भी जीडीपी के 8.5 प्रतिशत के बराबर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च है।

चुनौतियों से पार

  • भारतीय दवा कंपनियां अधिकतर जनरिक दवाएं बनाती हैं। इस क्षेत्र में र्न दवाओं पर शोध उत्पादन की तुलना में बहुत कम है
  • दवाओं के निर्माण के लिए कच्चे माल को लेकर आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी है। फार्मा सेक्टर के विकास में यह बड़ी बाधा है
  • दवा उद्योग में क्षमता के अनुरूप आवश्यक निवेश की कमी इस क्षेत्र के विकास लिए एक बड़ी चुनौती है

Edited By: Sanjay Pokhriyal