नई दिल्ली, प्रेट्र। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी पीड़ित के साथ की गई क्रूरता की आपराधिक कार्यवाही में अनदेखी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह किसी व्यक्ति नहीं बल्कि समाज के खिलाफ अपराध होता है, जिससे सख्ती से निपटने की जरूरत है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा से किसी तरह की राहत देने से इन्कार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों में समझौते के बाद भी दोषी को सजा से राहत देने से किया इन्कार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्यायिक प्रणाली का मूल मकसद गलत करने वालों को दंडित करना है। निचली अदालत द्वारा सुनाई सजा का आकलन करने के लिए उसके पास विधायी या न्यायिक रूप से कोई तय दिशा-निर्देश भी नहीं हैं। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने कहा कि अदालत सजा तय करते समय कई पहलुओं को ध्यान में रखती है, जिसमें प्रतिरोध, पुनर्वास इत्यादि शामिल हैं। शीर्ष अदालत महाराष्ट्र निवासी भगवान नारायण गायकवाड की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

तलवार से जानलेवा हमले में सुनाई गई कड़ी सजा

गायकवाड को सुभाष यादवराव पाटिल पर 13 दिसंबर, 1993 को तलवार से जानलेवा हमला करने के मामले में निचली अदालत ने आइपीसी की धारा 326 (घातक हथियार से जानबूझकर किसी को चोट पहुंचाना) के तहत पांच साल कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माना और सीआरपीसी की धारा 357 के तहत पीड़ित के लिए दो लाख रुपये मुआवजे की सजा सुनाई थी। बांबे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। हमले में पाटिल का एक हाथ और पैर कट गया था और वह स्थायी रूप से विकलांग हो गया है।

कहा, आपराधिक कार्यवाही में क्रूरता की अनदेखी नहीं की जा सकती, इससे सख्ती से निपटना जरूरी

गायकवाड की तरफ से पेश वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि गायकवाड और पाटिल के बीच समझौता हो गया है। पाटिल नहीं चाहता कि गायकवाड बाकी की सजा काटे। दोनों परिवार अब सौहार्द के साथ रहना चाहते हैं। किसी भी तरह की राहत देने से इन्कार करते हुए पीठ ने कहा कि हमले के कारण पीड़ित व्यक्ति जीवन भर के लिए दूसरे पर निर्भर हो गया है।

डाक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समय से पीड़ित को चिकित्सा नहीं मिलती तो उसकी मौत निश्चित थी। इसी के चलते मृत्यु से पहले जैसे बयान दर्ज किया जाता है, पीड़ित का बयान भी दर्ज कर लिया गया था। घटना या सजा के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता सजा से राहत पर विचार करने का एक कारण हो सकता है, लेकिन सिर्फ उसी आधार पर फैसला नहीं लिया जा सकता।

Edited By: Arun Kumar Singh