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एआई के बढ़ते चलन के साथ-साथ मानव मस्तिष्क भी नया आकार लेगाः प्रोफेसर रविंद्रन

By Rumani GhoshEdited By: Deepak Gupta
Published: Sat, 07 Feb 2026 06:52 PM (IST)

प्रोफेसर बालारमन रविंद्रन (आईआईटी मद्रास) ने एआई के प्रभाव और भारत के दृष्टिकोण पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारत ...और पढ़ें

प्रोफेसर रविंद्रन।

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रुमनी घोष। दुनिया में एआई की अवधारणा भले ही पहली बार लगभग 96 साल पहले की गई है, लेकिन चैट जीपीटी लांच होने के बाद व्यापक स्तर पर जनजीवन को प्रभावित करना शुरू किया। एआई मिशन के बीच इसके अच्छे-बुरे असर को लेकर छिड़ी विश्वव्यापी बहस के बीच भारत सरकार और आइआइटी मद्रास मिलकर फरवरी के तीसरे सप्ताह में 'एआई इम्पैक्ट समिट-2026' आयोजित करने जा रही है।

इसमें एआई के प्रभाव-दुष्प्रभाव व नवाचारों को एक मंच पर लाने की तैयारी है। इस समिट की रूप-रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं आइआइटी मद्रास के वाधवानी स्कूल आफ डाटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेंटर फार रिस्पान्सिबल एआई के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बालारमन रविंद्रन।

यूएन ने हाल ही में 40 विज्ञानियों की अंतरराष्ट्रीय एआई समिति में उन्हें शामिल किया है। देश के एआई मिशन को गति देने में जुटे प्रोफेसर रविंद्रन कहते हैं कि यदि आपको एआई का उपयोग आता है, तो आपकी नौकरी नहीं जाएगी। यही वजह है कि एआई साक्षरता मिशन का पाठ्यक्रम तय किया जा रहा है।

इसके तहत जहां यह बच्चों के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बन जाएगा, वहीं शिक्षक से लेकर माता-पिता को भी जागरूक किया जाएगा। प्रोफेसर रविंद्रन देश के नंबर एक डीप री-इन्फोर्समेंट लर्निंग विशेषज्ञ हैं और भारत के शीर्ष तीन मशीन लर्निंग विशेषज्ञों में से एक हैं।

कंप्यूटिंग में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें एसीएम डिस्टिंग्विश्ड मेंबर (2021) चुना गया है। 2020 में उन्हें एएएआई (एसोसिएशन फार एडवांसमेंट आफ एआई) के सीनियर सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरू से स्नातकोत्तर और यूनिवर्सिटी आफ  मैसाचुसेट्स से पीएचडी की है।

दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे एआई के सार्थक व समावेशी प्रभाव पर आनलाइन चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंशः

जान मैकार्थी ने 1955 में एआई शब्द को गढ़ा था। 71 साल पहले उन्होंने जो सोचा था, क्या दुनिया वहां तक शोध कर पाई है?

- जब आप पहली बार एआई की परिकल्पना की बात कर रहे हैं, तो आपको और पीछे जाना पड़ेगा। एआई बहुत प्राचीन सिद्धांत है। महान प्राचीन यूनानी विज्ञानी प्लेटो और अरस्तु के दर्शन में 'इंटेलिजेंस' का उल्लेख मिलता है। आधुनिक वैज्ञानिक युग की बात करें तो वर्ष 1930 में इसकी परिकल्पना की गई। वर्ष 1955 में जान मैकार्थी ने 'एआई' नाम दिया और वर्ष 1956 में डार्टमथ में एक कांफ्रेंस आयोजित की थी। ...और सबसे रोचक बात यह है कि इस कांफ्रेंस में मौजूद विज्ञानियों का मानना था कि एआई को तीन महीने में विकसित कर लिया जाएगा।

1956 में विज्ञानियों को लगा कि यह तीन महीने में बनकर तैयार हो जाएगी। आज 2026 है...क्या एआई पूरी तरह तैयार है?

- (हंसते हुए) नहीं। बिल्कुल नहीं कह सकते हैं। अभी तो शायद इसका एक सिरा ही पकड़ में आया हो। निश्चित तौर पर दुनिया इस क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में यह किस दिशा में जाएगी, इसको लेकर हम अभी भी दावे से कुछ नहीं कह सकते हैं। जहां तक बात व्यवहारिक रूप से एआई के आविष्कार की है तो अलन ट्यूरिंग टेस्ट को सबसे सटीक माना गया है। इस टेस्ट को यह तय करने के लिए डिजाइन किया गया था कि क्या कोई मशीन इंसानों जैसी इंटेलिजेंस दिखा सकती है? इसमें एक कंप्यूटर और एक इंसान को अलग-अलग दो कमरों में बिठाया गया। तीसरे कमरे में बैठे व्यक्ति को यह नहीं पता है कि किस कमरे में इंसान है और किसमें कंप्यूटर। अब वह दोनों (कंप्यूटर और इंसान) से सवाल (टेक्स्ट बेस्ड) पूछना शुरू करता है। अगर सवाल पूछने वाला जवाब देखकर यकीन के साथ यह बता नहीं पाता है कि कौन इंसान है और कौन मशीन, तो मशीन ट्यूरिंग टेस्ट पास कर लेती है। हालांकि ट्यूरिंग टेस्ट में एक परेशानी यह थी कि उन्होंने इसका कोई पैरामीटर तय नहीं किया था कि मशीन किस हद तक के सवालों का जवाब देगी, तो उसे एआई की श्रेणी में माना जाएगा। यही खोज अभी तक जारी है।

आमतौर पर यह कहा जाता है कि एआई इंसानों से आगे है। इसमें कितनी सच्चाई है कि एआई एक दिन 'टेकओवर' कर लेगी?

- एआई के बारे में यह धारणा है कि वह हमेशा ही बेहतर होगी। जो कुछ करेगी, सब सही करेगी...तो ऐसा नहीं है। हो सकता है कि कुछ मामलों में वह इंसानों से बहुत बेहतर कर जाए। जैसे कैलकुलेशन आदि। वहीं कुछ मामलों में बहुत गड़बड़ी भी हो सकती है। जैसे हाल ही में 'एआई के सोशल नेटवर्किंग' को लेकर वैश्विक स्तर पर बहुत हल्ला मचा। चिंता जताई जाने लगी कि एआई इंसानों की जगह ले लेगी, जबकि असलियत यह थी कि उसमें इतने बग (कंप्यूटर प्रोग्राम में मौजूद कोडिंग त्रुटि) थे, कि वह आसानी से हैक हो गया। इसलिए यह धारणा गलत है कि एआई हमेशा ही सही करेगा या हर क्षेत्र में इंसानों से आगे निकल जाएगा। वह किस क्षेत्र में बेहतर काम कर सकता है और कहां उसकी सीमाएं खत्म होती है, यह तलाशने के लिए अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

जब एआई पर चेक-बैलेंस रखने, उसके सही-गलत को पकड़ने के लिए इंसानों की जरूरत है तो यह डर क्यों है कि एआई बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरी छीन लेगा?

- जिसे एआई का उपयोग करना आता है, उसकी नौकरी नहीं जाएगी। ऐसा नहीं है कि एआई का उपयोग चैट जीपीटी के बाद शुरू हुआ। लंबे अरसे से यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद है। जब आप गूगल मैप देखते हैं, तो लोकेशन बताने के लिए एआई का उपयोग हो रहा है। यदि आपने जोमैटो से खाना आर्डर किया है और एआई की मदद से ही वह बताता है कि यह कितनी देर में पहुंच जाएगा। ऐसे बहुत से एआई एप्लीकेशन हमारी जिंदगी में मौजूद हैं, लेकिन आने वाले समय में इसके बढ़ते उपयोग के साथ कई नई चुनौतियां भी पैदा होंगी। अब हमें उन नई चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार होना होगा।

भारत जैसे विकासशील देश में इससे निपटने के लिए क्या तैयारी है?

- एआई साक्षरता पाठ्यक्रम। कुछ संस्थाओं के साथ मिलकर हम 'एआई साक्षरता पाठ्यक्रम' तैयार कर रहे हैं। तीन-चार साल में यह बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जाएगा। इसके साथ ही शिक्षक और अभिभावक भी इसके जरिए जागरूक हो सकेंगे। भारत के पास सभी लेवल पर सिलेबस में एआई को शामिल करने का एक बड़ा प्लान है। सीबीएसई ने पहले ही कंप्यूटेशनल थिंकिंग (निचली क्लास के लिए) और एआई (ऊंची क्लास के लिए) के सिलेबस की प्लानिंग के लिए एक कमेटी बनाई है। इसकी अध्यक्षता आइआइटी मद्रास के प्रोफेसर कार्तिक रमन कर रहे हैं। कालेज स्तर पर, सभी सब्जेक्ट्स के सिलेबस में एआई को शामिल करने का प्लान है। स्वयं प्लस पोर्टल ने फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलाजी में एआई के लिए स्किलिंग प्रोग्राम लांच किए हैं। इसे और आगे बढ़ाने की भी योजना है।

भारत की तीन बड़ी समस्याएं, जो एआई की मदद से सुलझाई जा सकती हैं?

- शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि। इन तीन क्षेत्रों में एआई का बड़े पैमाने पर उपयोग हो सकता है। शिक्षा क्षेत्र की बात करते हैं तो शहरों में तो बेहतर स्कूल हैं, लेकिन ग्रामीण अंचल के स्कूलों की स्थिति खराब है। देशभर में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जहां पहली से लेकर बारहवीं तक सिर्फ एक ही शिक्षक है ।

आपने कहा देशभर में एक लाख स्कूल हैं, जहां पहली से लेकर दसवीं तक एक ही शिक्षक है। तो क्या यह कल्पना की जा सकती है कि उन स्कूलों में एआई रोबोट पढ़ा रहे होंगे?

- एआई रोबोट टीवी शो में ही अच्छे दिखते हैं। वहीं तक ठीक है। हमारा मकसद एआई टीचर तैयार करना नहीं है। एआई रोबोट शिक्षकों का विकल्प नहीं है, बल्कि वह शिक्षकों को बेहतर ढंग से पढ़ाने में मददगार बन सकता है। जैसे, दक्षिण भारत के विद्यार्थियों को हिंदी सिखाना है। तमिल भाषी 'ग' शब्द का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाते हैं। इस वजह से यहां के शिक्षकों का हिंदी उच्चारण उतना सटीक नहीं होगा। इसी तरह स, ष, श और ख आदि शब्द हैं, जिनका सटीक उच्चारण मुश्किल है। इसी तरह हिंदी भाषी शिक्षक यदि तमिल सिखाते हैं तो संभवतः उनका उच्चारण उतना सटीक नहीं होगा। एआई बच्चों को सटीक उच्चारण सीखने में मददगार करेगा, यानी कुल मिलाकर शिक्षक एआई की मदद से किसी भी भाषा को सही उच्चारण के साथ बेहतर ढंग से सिखा सकते हैं। अब एक और उदाहरण लेते हैं। जैसे, हमारे यहां पढ़ाने का एक सेट पैटर्न, यानी तयशुदा तरीका है। एक कक्षा के हर बच्चे के लिए एक ही पाठ्य-पुस्तक है। बरसों से वे उसी तरह से पढ़ते आ रहे हैं। एआई की मदद से हर बच्चे के लिए उसकी सुविधा व समझ के अनुसार अलग-अलग पैटर्न विकसित किया जा सकता है। अलग-अलग उदाहरणों से उसे समझाया जा सकता है। एक बहुत बड़ी चुनौती यह है कि अभी भी कक्षा तीन के 76 प्रतिशत और कक्षा पांच के 55.2 प्रतिशत बच्चे कक्षा दो के पाठ पढ़ने में असमर्थ हैं। कक्षा तीन और पांच के 66 प्रतिशत से अधिक छात्र साधारण गणित नहीं कर पाते हैं। एआई की मदद से शिक्षा की गुणवत्ता में आ रही कमी को दूर किया जा सकता है।

चिकित्सा और कृषि के क्षेत्र में एआई का किस तरह से उपयोग हो सकता है?

- आइआइटी मद्रास कुछ संस्थाओं के साथ मिलकर एक पायलट प्रोजेक्ट कर रहा है कि कैसे दूर-दराज के इलाकों में चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाई जा सकती हैं। हमारे देश में एम्स जैसे सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों का कोई मुकाबला नहीं है। यहां हर मरीज के लिए बेहतरीन इलाज उपलब्ध है, लेकिन प्राथमिक चिकित्सालयों की स्थिति बदतर है। अधिकांश जगह सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांव में स्थिति और विकट है। जैसे, किसी गांव से बच्चों के बीमार होने की सूचना आई। यदि आंगनवाड़ी वर्कर को प्रशिक्षित कर दिया जाए, तो तुरंत ही बच्चों में उभरने वाले लक्षणों को स्कैन कर जिला मुख्यालय में बैठे डाक्टरों तक पहुंचा देगी। डाक्टर वहां से प्राथमिक इलाज बता देंगे और बच्चों को तत्काल उपचार मिल जाएगा। इसी तरह कृषि क्षेत्र में इसका व्यापक उपयोग हो सकता है। जैसे, देश के एक हिस्से में किसी खाद्यान्न की प्रचुरता है, लेकिन दूसरे हिस्से में कम है। किसान एआई के जरिए पता कर अपना माल वहां भेज सकता है। इससे खाद्यान्न की कमी की समस्या मिट जाएगी और उसे बेहतर आमदनी भी हो जाएगी, लेकिन यह तभी संभव है, जब वह एआई साक्षर हो। अपने फायदे के लिए इसका उपयोग करना जानता हो।

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एआई से जुड़े नवाचार शिक्षा के क्षेत्र को किस तरह से बदल सकते हैं? कुछ चौंकाने वाले नवाचारों का उल्लेख कीजिए?

- भारत में एआई को लेकर अभी कोई केंद्रीकृत नीति नहीं है। यही वजह है कि हर कोई अपने-अपने स्तर पर काम कर रहा है। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में बहुत-सी संस्थाएं एआई का उपयोग अमूमन 10 साल से कर रही होंगी, लेकिन यह उन तक ही सीमित है। सब कुछ निजी स्तर पर हो रहा है। इस कान्क्लेव के जरिए हम सबको एक मंच पर ला रहे हैं। इसमें देशभर में जो भी एआई को लेकर काम कर रहा है, वह इसमें शामिल हो सकता है। वह बड़ा उद्योगपति या इंजीनियरिंग संस्थाएं हो सकती हैं, तो निजी स्तर पर काम करने वाला कोई व्यक्ति भी।

भारत ने साफ्टवेयर के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई है। क्या एआई के क्षेत्र में भी हम नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं?

- मैं यह नहीं कहना चाहता कि भारत को ग्लोबल एआई मूवमेंट का नेतृत्व करना चाहिए। यह बहुत बड़ी बात होगी, लेकिन मेरा मानना है कि भारत को ग्लोबल साउथ के साथ मिलकर आम समस्याओं की पहचान करनी चाहिए। यदि हम अपने लिए एआई विकसित करते हैं, तो वह पूरे ग्लोबल साउथ के लिए है। क्योंकि वह हमारी जरूरत के मुताबिक किफायती, सुलभ और अनुकूलन क्षमता वाला होगा।

इस बात में कितनी सच्चाई है कि एआई से बुद्धि कुंद हो रही है? नई पीढ़ी सामान्य गुणा-भाग, जोड़-घटाव के लिए इसका उपयोग करने लगी है? नया व मौलिक सोचने के बजाय एआई की मदद से प्रोजेक्ट्स या सवालों के जवाब तैयार हो रहे हैं?

- यह सही है कि एक बड़े वर्ग की यह धारणा है कि एआई हमारी बुद्धि को कमजोर कर रही है। अब हमें आंकड़े याद नहीं रहते हैं। पहाड़े या फोन नंबर याद नहीं रहते हैं, लेकिन मैं मानता हूं कि यह समय के साथ विकास का एक तरीका है। यहां एक शोध का उल्लेख करना चाहूंगा। विज्ञानियों ने दिमाग के विकास को देखने के लिए दो व्यक्तियों पर शोध किया। एक व्यक्ति, जो किताबें पढ़ता है और दूसरा, जो टीवी देखता है। दोनों के दिमाग की संरचना में अंतर पाया गया। अब किताबें पढ़नेवाला और टीवी देखने वाला... दोनों में से किसका मस्तिष्क ज्यादा विकसित है, यह तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन दोनों के काम करने का पैटर्न अलग-अलग है। इसी तरह जब इंसान बड़े पैमाने एआई का उपयोग करने लगेगा तो उसके दिमाग का पैटर्न भी शायद बदल जाए। हो सकता है, कुछ और नई चीज को बेहतर ढंग से सोचने-समझने में सक्षम हो जाए।

लोगों ने एआई को जिंदगी का हिस्सा मानना शुरू कर दिया है। उसके कहने पर हत्याएं करने जैसे मामले सामने आने लगे हैं। आखिर वह कौन-सी मानसिक स्थिति होती है, जिसमें लोग एआई की बातें सुनने लगते हैं। इस प्रवृत्ति को कैसे रोका जा सकता है?

- हमें यह बात समझनी होगी कि एआई हमारा दोस्त नहीं है। हमारा मार्गदर्शक या पथ प्रदर्शक नहीं है। वह एक सलाहकार है। उससे वैसा ही बर्ताव करें। इसी जागरूकता (एआई साक्षरता) की बात हो रही है, कि उसका कहां और कितना उपयोग करें। सामाजिक दायरों को बरकरार रखने के लिए उसकी कितनी बातें मानें और किस बात को खारिज करें, यह हमें तय करना है।

आने वाले समय में एआई से सबसे ज्यादा खतरा क्या है?

- फेक इम्प्रोवाइजेशन के जरिये असल तस्वीर व आवाज की हु-ब-हू नकल तैयार की जा सकती है। यह सबसे बड़ा खतरा है। जैसे, आपके फोन पर आपकी मां का फोन आया। आपको लगेगा कि आपकी मां ही बात कर रही हैं, लेकिन हो सकता है एआई की मदद से आपकी मां की आवाज की नकल कर ली गई हो। एेसे में लोगों को इस स्तर तक सावधानी रखनी होगी कि वह फोन को काटकर पहले मां को दोबारा फोन करें और कन्फर्म करें कि उन्होंने काल किया था कि नहीं। हालांकि इसका नाटक, संगीत, भाषण के क्षेत्र में इसका बहुत बेहतरीन उपयोग भी हो सकता है...और हो रहा है।

बचाव के लिए क्या उपाय?

- बहुत मजबूत 'फैक्ट चेक सिस्टम' बनाना होगा। ताकि असली-नकली की पहचान हो सके।

क्या एआई के उपयोग को नियंत्रित के लिए कोई रेगुलेटरी अथारिटी (नियामक प्राधिकरण) होनी चाहिए? एआई को अलग से रेगुलेट करने का तरीका विकसित करना चाहिए?

- भारत का रेगुलेटरी तरीका अपनी असलियत और प्राथमिकताओं पर आधारित होना चाहिए। हमें एआई को रेगुलेट करने के मामले में अमेरिकियों या यूरोपियनों की नकल नहीं करनी चाहिए। यही वजह है कि मैं बार-बार कहता हूं कि हमें तुरंत होने वाले नुकसान के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए। भविष्य की चीजों के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। हम अभी ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि हमें एआई से बहुत कुछ हासिल करना है।

एआई के युग में क्या इंसान की मौलिकता खतरे में है?

- नहीं। इंसान के भीतर एक इंट्यूशन (अंतर्ज्ञान) की क्षमता होती है। जैसे एक डाक्टर और एआई दोनों ही एक एक्स-रे रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं। उस रिपोर्ट में ऐसा कुछ हो, जिसे देखकर डाक्टर के मन में कोई शंका उत्पन्न हो। वह उसकी जांच करेगा और फिर रिपोर्ट देगा। हो सकता है कि जांच करने के बाद कोई नया तथ्य सामने आए, जिससे इलाज की दिशा बदल जाए। एआई यह नहीं कर सकता है। वह उस बिंदु को नोटिस ही नहीं करेगा... इसलिए इंसान की मौलिकता हमेशा बनी रहेगी।

एआई के प्रति रुचि कैसे जागी? आपने पीएचडी के लिए डीप री-इन्फोर्समेंट एआई को ही क्यों चुना?

- 1980 के दौर में मेरे पिता सिंगापुर एयरपोर्ट के बुक स्टोर से एक किताब खरीदकर लाए थे। यह एक टेक्स्टबुक थी। मैंने इसे पढ़ना शुरू किया और इसी से मुझे यह समझने में दिलचस्पी पैदा हुई कि इंसानी दिमाग कैसे काम करता है। भारतीय विज्ञान संस्थान से स्नातकोत्तर करते वक्त मैंने री-इन्फोर्समेंट लर्निंग विषय चुना। 1995 के उस दौर में तो इस विषय पर पाठ्य-पुस्तकें भी उपलब्ध नहीं थीं। तब मैंने प्रोफेसर अथिकीर्ति के साथ मिलकर सर्वे आर्टिकल लिखा। वह सर्वे आर्टिकल अब पाठ्य-पुस्तक की तरह रैफर होते हैं। शुरुआती दौर में कई बार विषय बहुत नीरस लगा। सिर्फ मैथेमेटिकल कैलकुलेशन (गणितीय आकलन) लगता था। लोग यहां तक कहते थे कि इस विषय में नौकरी का कोई स्कोप नहीं है, लेकिन जब मैं पीएचडी के लिए यूनिवर्सिटी आफ मैसाचुसेट्स में गया, तो सब बदल गया। न्यूरल नेटवर्क के क्षेत्र के विशेषज्ञ व ट्यूरिंग अवार्ड विजेता एंड्रयू बाट्रो के अधीन मैंने अपना शोध कार्य किया। न्यूरल नेटवर्क एक मशीन लर्निंग माडल है, जो इंसानी दिमाग से प्रेरित है, जिसमें आर्टिफिशियल न्यूरांस की आपस में जुड़ी हुई लेयर्स होती हैं, जो काम्प्लेक्स डाटा में प्रोसेस व एनालाइज पैटर्न को पहचानती हैं। शोध के दौरान मैंने यह अध्ययन किया कि बंदरों का दिमाग कैसे फैसले लेता है। यह बहुत ही रोचक था।