मुकुल श्रीवास्तव। यह दुनिया का एक स्मार्ट दौर है जहां सबकुछ स्मार्ट होते जा रहे हैं। विरोधाभास यह है कि इस स्मार्ट युग में जहां हमने अपना दिमाग इस्तेमाल करने का काम भी इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों को सौंप दिया है, उसी स्मार्ट समय में हम सबसे ज्यादा ‘फेक न्यूज’ का शिकार हो रहे हैं। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ‘पोस्ट ट्रूथ’ शब्द को वर्ष 2016 का ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ घोषित किया था। उपरोक्त शब्द को एक विशेषण के तौर पर परिभाषित किया गया है, जहां निजी मान्यताओं और भावनाओं के बजाय जनमत निर्माण में निष्पक्ष तथ्यों को कम महत्व दिया जाता है। यहीं से शुरू हळ्आ फेक न्यूज का सिलसिला। लैंडलाइन फोन के युग में एक बार पूरा देश गणेश जी को दूध पिलाने निकल पड़ा था, पर पिछले एक दशक में हुई सूचना क्रांति ने अफवाहों को तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से ऐसी गति दे दी है, जिसकी कल्पना मुश्किल है। सोशल मीडिया के तेज प्रसार और इसके आर्थिक पक्ष ने झूठ को तथ्य बना कर परोसने की कला को नए स्तर पर पहुंचाया है और इस असत्य ज्ञान के स्रोत के रूप में फेसबुक और वॉट्सऐप नए ज्ञान के केंद्र के रूप में उभरे हैं।

देश के लिए विकराल होती समस्‍या है फेक न्‍यूज 
देश इन दिनों फेक न्यूज की विकराल समस्या का सामना कर रहा है। भारत जैसे देश में जहां लोग प्राप्त सूचना का आकलन अर्जित ज्ञान की बजाय जनश्रुतियों, मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर करते हैं, वहां भूतों से मुलाकात पर बना कोई भी यूट्यूब चैनल रातोंरात हजारों सब्सक्राइबर जुटा लेता है। वीडियो भले झूठे हों पर उसे हिट्स मिलेंगे तो उसे बनाने वाले को आर्थिक रूप से फायदा भी मिलेगा। किसी विकसित देश के मुकाबले भारत में झूठ का कारोबार तेजी से गति भी पकड़ेगा और आर्थिक फायदा भी पहुंचाएगा। फेक न्यूज के चक्र को समझने से पहले मिसइन्फोर्मेशन और डिसइन्फोर्मेशन में अंतर समझना जरूरी है। मिसइन्फोर्मेशन का मतलब ऐसी सूचना जो असत्य है, पर जो इसे फैला रहा है वह यह मानता है कि यह सूचना सही है। वहीं डिसइन्फोर्मेशन का मतलब ऐसी सूचना से है जो असत्य है और इसे फैलाने वाला भी यह जानता है कि अमुक सूचना गलत है फिर भी वह फैला रहा है।

फेक न्‍यूज के लिए उर्वर जमीन
देश में दोनों तरह की सूचनाओं के फैलने की उर्वर जमीन मौजूद है। एक तरफ वे भोले लोग जो इंटरनेट के प्रथम उपभोक्ता बने हैं और वहां जो भी सामाग्री मिल रही है वे उसकी सत्यता जाने समझे बिना उसे आगे बढ़ा देते हैं। दूसरी तरफ विभिन्न राजनीतिक दलों के साइबर सेल के समझदार लोग उन झूठी सूचनाओं को यह जानते हुए भी कि वे गलत या संदर्भ से कटी हुई हैं, इस मकसद से फैलाते हैं ताकि अपने पक्ष में लोगों को संगठित किया जा सके। इन सबके पीछे खास मकसद होता है। जैसे हिट्स पाना, किसी का मजाक उड़ाना, किसी व्यक्ति या संस्था पर कीचड़ उछालना, साङोदारी, लाभ कमाना, राजनीतिक फायदा उठाना या दुष्प्रचार। फेक न्यूज ज्यादातर भ्रमित करने वाली सूचनाएं होती हैं या बनाई हुई सामग्री। अक्सर झूठे संदर्भ को आधार बना कर ऐसी सूचनाएं फैलाई जाती हैं।

सोशल मीडिया पर फेक न्‍यज
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और कंटार-आइएमआरबी की रिपोर्ट के अनुसार बीते जून तक देश में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या पांच करोड़ हो चुकी थी, जबकि दिसंबर 2017 में इनकी संख्या 4.8 करोड़ थी। इंटरनेट यूजर्स में इतनी वृद्धि साफ इशारा करती है कि इंटरनेट के ये प्रथम उपभोक्ता सूचनाओं के लिए सोशल मीडिया, वॉट्सऐपव फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर निर्भर हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। भारत में लगभग 20 करोड़ लोग वॉट्सऐप का प्रयोग करते हैं जिसमें कई संदेश, फोटो और विडियो फेक होते हैं। पर जागरूकता के अभाव में ये वायरल होते हैं। एंड टू एंड एनक्रिप्शन के कारण वॉट्सऐप पर कोई तस्वीर सबसे पहले किसने डाली, यह पता करना लगभग असंभव है। भारत के लिहाज से इंटरनेट एक युवा माध्यम है जिसे यहां आए 22 साल ही हुए हैं। सोशल नेटवर्किंग अभी बाल्यावस्था में ही है।

बदल गया खबर पाने का तरीका
इंटरनेट ने खबर पाने के पुराने तरीके को बदल दिया। पहले पत्रकार खुद किसी खबर की तह में जाकर सच्चाई पता करता था और तस्दीक कर लेने के बाद ही उसे पाठकों तक प्रेषित किया जाता था। आज इंटरनेट ने गति के कारण खबर पाने के इस तरीके को बदल दिया है। इंटरनेट पर जो कुछ है वह सच ही हो ऐसा जरूरी नहीं, इसलिए अपनी सामान्य समझ का इस्तेमाल जरूरी है। पिछले दिनों देश के कई चैनलों ने मुंबई में आए ओखी साइक्लोन पर मुंबई पुणे एक्सप्रेस वे पर ओले गिरने का फर्जी वीडियो चला दिया। वीडियो में दिखने वाली गाड़ियां लेफ्ट हैंड ड्राइविंग थीं, जबकि भारत में राइट  हैंड ड्राइविंग है। इन गाड़ियों के नंबर भी भारतीय नहीं थे। खबर को जल्दी पहुंचाने की यह मनोवृत्ति फेक न्यूज के फैलने का भी एक बड़ा कारण बन रहे हैं और इसी प्रवृत्ति का विस्तार आम आदमी के वॉट्सऐप चैट बॉक्स कर रहे हैं जहां बगैर सच जाने विभिन्न वॉट्सऐप ग्रुपों में लगातार ऐसी असत्य या संदर्भ से कटी सूचनाएं फोटो या वीडियो के माध्यम से प्रेषित की जा रही हैं।

फेक न्‍यूज को पहचानें
फर्जी फोटो को पहचानने में गूगल और यांडेक्स ने रिवर्स इमेज सुविधा शुरू की है, जहां आप कोई भी फोटो अपलोड करके यह पता कर सकते हैं कि कोई फोटो इंटरनेट पर यदि है, तो वह सबसे पहले कब अपलोड की गई है। एमनेस्टी इंटरनेशल ने वीडियो में छेड़छाड़ और उसका अपलोड इतिहास पता करने के लिए यूट्यूब के साथ मिलकर यू ट्यूब डाटा व्यूअर सेवा शुरू की है। अनुभव यह बताता है कि 90 प्रतिशत वीडियो सही होते हैं पर उन्हें गलत संदर्भ में पेश किया जाता है। किसी भी वीडियो की जांच करने के लिए उसे ध्यान से बार-बार देखा जाना चाहिए।

खुद करें पड़ताल  
किसी भी वीडियो को समझने के लिए उसमें कुछ खास चीजों की तलाश करनी चाहिए जिससे उसके सत्य या सत्य होने की पुष्टि की जा सके। जैसे वीडियो में पोस्टर, बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट फोन नंबर की तलाश की जानी चाहिए, जिससे गूगल द्वारा उन्हें खोज कर उनके क्षेत्र की पहचान की जा सके। किसी लैंडमार्क की तलाश की जाए, वीडियो में दिख रहे लोगों ने किस तरह के कपड़े पहने हैं, वे किस भाषा या बोली में बात कर रहे हैं, उसे समझना चाहिए। किसी भी वीडियो और फोटो को देखने के बाद यह जरूर सोचें कि यह आपको किस मकसद से भेजा जा रहा है, महज जागरूकता या जानकारी के लिए या फिर भड़काने के लिए।

(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

Edited By: Kamal Verma