प्रिये,

आज होली है। तुम बहुत याद आ रही हो। मैं, फेसबुकीय नायक, हमेशा की तरह विरह के मोड में मोबाइल लिए तुम्हारी वाल पर निगाहें गड़ाए अकेला बैठा हूं। अकेला बैठना देवदासीय संकल्पना नहीं बल्कि मजबूरी है। यह जालिम दुनिया उर्फ मेरे बीवी और बच्चे, कमबख्त मुझे चैन से तुम्हारी पोस्टों के अनवरत दर्शन करने कहां देते हैं? मैं सालभर कमेंटीय तप में लगा हूं। आज जहां ग्लोबल वार्मिंग से हरियाली को कितना नुकसान पहुंचा है, वहां मैंने अनगिनत नायिकाओं के मैसेज बॉक्स में पर्यावरण प्रेम दर्शाते हुए ढेरों पुष्पमय बगीचों का सृजन किया है।

आज होली है। स्वाभाविक रूप से तुमने अपनी डीपी चेंज की है। समय-समय पर आने वाले राष्ट्रीय त्योहारों पर प्राय: तुम ऐसा करती पाई जाती हो। आज तुमने होली टच देते हुए चंद गुलाबी गुलाल का लेप अपने गालों पर लगाया है। हालांकि तुम्हारे भूतपूर्व और अभूतपूर्व फोटुओं पर गुलाबीपन पहले से ही कुछ अधिक है। जो प्रकृतिप्रदत्त न होने के कारण शंका के दायरे में आता है। आशंका के बावजूद आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो। सच कह रहा हूं। यदि ब्यूटी एप के सश्रम प्रयास में थोड़ा ब्राइटनेस कम कर दें और थोड़ी शार्पनेस घटा दें तो भी जो स्वरूप निकलकर आएगा, वो सुंदरता की श्रेणी में रखा जा सकता है। प्रेम के प्रति मेरे कंप्रोमाइज रखने वाले तर्क, भले ही करुणामय पुट दें पर इसके अलावा मेरे पास चारा नहीं है।

पर तुम इसे आरोप की श्रेणी में मत लेना। मैंने भी तुम्हें रिझाने के वास्ते कितने खतरे मोल लिए हैं। कल ही फेसबुक पर मेरी रंगीन फोटू को देखकर बीवी ने पूछ लिया था कि सुनो जी तुमने अपने फेसबुक पर किसका फोटो लगा रखा है। अब बीवी को क्या बताएं कि इसी फोटो के सहारे तो हम प्रेम के भवसागर को पार करने की हिम्मत जुटा रहे हैं। बहुत कोशिश में लगे हैं, इतने प्रयास तो हमने एसएससी के कांप्टीशन में भी नहीं किए। तुम ऑनलाइन अवतरित हो चुकी हो। तुम्हारे स्टेटस पर चमकता ऑनलाइनीय हरा बिंदु मेरे बंजर जीवन में हरियाली की चादर फैला रहा है। फिर भी कुछ है, जो मन को ठीक नहीं लग रहा। तुमने मेरे रसमय कमेंट को लाइक किया, यह ठीक है। यह तुम्हारा कर्तव्य है पर तुम जो बार-बार दूसरों की वाल पर कमेंट की पिचकारियां फेंकती हो, यह ठीक नहीं है। यह हमारे शाश्वत प्रेम के खिलाफ है। इससे न जाने कितने रंग भरे गुब्बारे मेरे सीने पर फूटने लगे हैं।

अब तुम भी मेरे चौबीसघंटीय तप पर पिघलो। देखो, मैंने तुम्हारे लिए कितना त्याग किया है। लाख डिसलाइक  की स्थिति होने पर भी सैंकड़ों-हजारों बार लाइक किया। न जाने कितनी बार सिर नोचने वाली स्थिति के बाद भी लाख पसंद होने का कमेंट किया। मात्राओं की गलतियों को भी प्रेम की परीक्षा माना। बच्चन जी की कविताओं को स्वरचित बताने पर भी मैंने तुम्हारा न केवल समर्थन किया, बल्कि तुम्हें महान कवयित्री भी बताया। कचरे में फेंकने वाली रचनाओं को कालिदास से भी उच्च कोटि का बताया। यही सोचकर कि अब तो कुछ तुम्हारी तरफ से अबीर उड़ेगा।

लोग बाहर आवाज दे रहे हैं पर मन है कि बाहर जाने को कर ही नहीं रहा। फेसबुक खोलकर बैठे हैं। हमेशा की तरह ऑनलाइन हैं, तुम दिखो और झट से रसिया गा दें। पल-पल अब युगों के समान लग रहा है। प्रिये, अब विरह सहा नहीं जा रहा। मन शंकित भी है। तुम सच-सच बतलाओ। यह फोटो, जो तुमने फेसबुक पर चिपका रखी है, यह तुम्हारी ही तो है? एक बार तुमने गलती से जेंडर मिस्टेक कर दी थी, तो मैंने तुम्हारी शाश्वत वीक हिंदी को कारण मानकर भुला दिया था। पर अब डर लगने लगा है। कहीं तुम नायक के रूप में छिपी नायिका तो नहीं हो। भगवान से यही प्रार्थना है कि ऐसा न हो। मैं तुम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। तुम औरों की वाल पर कमेंट देती हो। मुझे बुरा लगता है पर मैं स्वयं भी तो अन्य फेसबुकीय नायिकाओं की वालों पर कमेंट फेंककर विकल्प की राजनीति में फंस जाता हूं। तुम इन सब को गंभीरता सेमत लेना। आज होली है, बस अच्छा सा रसिया मेरी वाल पर लिख दो। जालिम दुनिया के कारण ऐसा न कर पा रही हो तो मैसेज बॉक्स में ही डाल दो।

शरद उपाध्‍याय 
(ssharadupadyay@gmail.com)

Posted By: Kamal Verma

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