नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। नरेन्द्र मोदी सरकार मातृ भाषा हिंदी समेत संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी भाषाओं को बढ़ावा देगी। हिंदी किसी पर थोपी नहीं जा रही है। हिंदी स्वत: स्वीकार्य है। तभी तो यह लगातार पुष्पित और पल्लवित हो रही है। उक्त बातें केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहीं।

वो दैनिक जागरण और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम ‘विश्व भाषा हिंदी, 2050’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उद्घाटन सत्र को आइजीएनसीए के सदस्य सचिव डा. सच्चिदानंद जोशी और दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने भी संबोधित किया। इस दौरान 'हिंदी हैं हम' के लोगो का भी लोकार्पण किया गया।

हिंदी स्वत: स्वीकार्य, इसे थोपे जाने का सवाल नहीं

जनपथ होटल स्थित आइजीएनसीए के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में अर्जुन राम मेघवाल ने पुडुचेरी में चुनाव प्रचार के दौरान की एक घटना के संदर्भ में कहा कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जा रही है। चुनाव में इस तरह के विषय उठाए जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि जब संविधान बन रहा था तो राष्ट्रभाषा का विषय आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी रहेगी, बाकी बाद में चर्चा कर राष्ट्रभाषा तय की जाएगी, तब तक राजभाषा हिंदी रहेगी।

15 साल बाद फिर यही मुद्दा उठा। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संसद में पंडित नेहरू की बात को ही दोहराया और मामला फिर आगे बढ़ता ही चला गया, लेकिन इन वर्षों के दौरान हिंदी का विकास नहीं रुका, क्योंकि हिंदी स्वत: स्वीकार्य है। यह जनमानस की भाषा है। हिंदी की इस ताकत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पहचान गए थे।

महात्‍मा गांधी ने दिया हिंदी को बढ़ावा

वर्ष 1917 में चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी जी को यह आभास हो गया था कि यदि भाषा एक नहीं होगी तो बड़ी संख्या में लोगों से संवाद करना मुश्किल होगा। गांधी जी ने हिंदी भाषा को बढ़ावा देने को कहा। इस दिशा में तेजी से काम हुआ। तभी तो आजादी के मतवाले हिंदी में ही संवाद करते थे। यदि पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक कोई एक भाषा है, जिसे लोग समझते और जानते हैं तो वो हिंदी ही है।

हिंदी ने गढ़ा था चार हजार कैदियों का समाज

अर्जुन राम मेघवाल ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह स्थित सेल्युलर जेल से जुड़ा एक वाकया भी सुनाया। उन्होंने कहा कि इसी जेल में वीर सावरकर बंद थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के चलते बंदी बनाए गए लोगों को हिंदी में बातचीत करने के लिए प्रेरित किया।

इसका असर यह हुआ कि जेल में बंद केरल, तमिलनाडु समेत विभिन्न राज्यों के लोग हिंदी बोलने लगे। आजादी के बाद इन्हें रिहा किया गया। करीब चार हजार कैदियों ने बैठक कर तय किया कि वो अपने घर नहीं जाएंगे। उन्हें आपस में वैवाहिक रिश्ते बनाए और आज वो बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं। वह हिंदी ही थी, जिसने सेल्युलर जेल समाज के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा।

गंगा की तरह है हिंदीः विष्णु प्रकाश त्रिपाठी

कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने दैनिक जागरण द्वारा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किए जा रहे हिंदी है हम, हिंदी बेस्टसेलर, संवादी, सृजन आदि कार्यक्रमों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होने हिंदी को समृद्ध करने में अखबारों के योगदान पर बोलते हुए कहा कि यदि नई पीढ़ी को हिंदी पढ़ना है तो वो दैनिक जागरण जरूर पढ़े। दैनिक जागरण का भाषा के प्रति सत्याग्रह है।

भारतीय संयुक्त परिवार की तरह है हिंदी

हिंदी में शुद्धतावाद पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग शुद्धतावाद के कट्टर समर्थक होते हैं। हालांकि, दैनिक जागरण संस्थागत तौर पर यह मानता है कि हिंदी भारतीय संयुक्त परिवार की तरह है। जैसे भारतीय परिवार में दूसरे परिवार से वधु आती है तो वह नए परिवार के संस्कार ग्रहण कर इसका हिस्सा बन जाती है। उसी तरह, दूसरी भाषाओं के शब्दों को हिंदी में शामिल करना चाहिए, लेकिन उसके व्याकरण, विन्यास संबंधी नियम हिंदी के लागू होने चाहिए। उन्होंने कहा कि इस बारे में अंग्रेजी भाषा से सीखने की जरूरत है।

प्रतिवर्ष अंग्रेजी शब्दकोश में विभिन्न भाषाओं के शब्द शामिल किए जाते हैं, जबकि हिंदी में दूसरी भाषाओं के शब्दों को शामिल करने पर लोग आंदोलित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी गंगा की तरह है। हिंदी हमारी मां है। गंगा, गंगोत्री से प्रवाहित होती है, लेकिन ऋषिकेश तक आते आते इसमें कई नदियां मिल जाती हैं। गंगा के प्रयाग तक पहुंचते पहुंचते इसमें मध्यप्रदेश की कई नदियां मिल जाती हैं। कोई भी गंगा की पवित्रता पर सवाल नहीं खड़ा करता। कोई यह नहीं कहता कि इसमें बेतवा, यमुना आदि नदियां मिली हैं। इसी तरह हिंदी भी है।

न्यूनता बोध हटाने में ‘हिंदी हैं हम’ कारगरः डा. सच्चिदानंद जोशी

डा. सच्चिदानंद जोशी ने अपने संबोधन की शुरुआत एक खबर के शीर्षक- स्टूडेंट ने एंज्वाय की फेयरवेल पार्टी के उदाहरण से की। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट के स्थान पर छात्र और फेयरवेल पार्टी की जगह विदाई समारोह भी लिखा जा सकता था। हिंदी के प्रति इस तरह की न्यूनता बोध को हटाने में ‘हिंदी हैं हम’ कार्यक्रम बहुत कारगर है। उन्होंने कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हर किसी को प्रयास करना होगा। एक उदाहरण के जरिये उन्होंने बताया कि एटीएम प्रयोग करते समय अक्सर हिंदी व अंग्रेजी भाषा के चयन का विकल्प दिया जाता है, लेकिन लोग अमूमन अंग्रेजी चुनते हैं, जबकि यहां हिंदी चुना जाना चाहिए। इस तरह के छोटे-छोटे कदमों से भाषा मजबूत होती है।

Edited By: Arun Kumar Singh