नई दिल्ली, अंशु सिंह। ऑनलाइन कक्षाओं के इस दौर में मुश्‍किल उनकी है, जिनके पास स्‍मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा नहीं हैं। पर अन्‍य उत्‍साही बच्‍चों-किशोरों और अन्‍य लोगों ने उनके लिए नई पहल करते हुए आपदा में अवसर निकाल लिए हैं और स्‍मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा न होने पर फोन पर जरूरतमंद स्‍टूडेंट व युवाओं के मेंटर बन उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। पढ़ाई में उनकी मदद करने के साथ उन्‍हें किस्‍से-कहानियां सुनाकर भी प्रेरित कर रहे हैं। आइए मिलते हैं कुछ ऐसे ही बच्‍चों-किशोरों से...

सातवीं में पढ़ती हैं चेन्नई की श्रीमहालक्ष्मी। थोड़ी-बहुत अंग्रेजी आती थी, लेकिन बेझिझक नहीं बोल पाती थीं। एक दिन उनके पास वेदांत नाम के बच्चे का फोन आया कि वह उनकी इस झिझक को दूर कर सकता है। इसके लिए वह हर हफ्ते एक कॉल करेगा और अंग्रेजी बोलने में होने वाली दिक्कत या अन्य सवालों का जवाब देगा।

श्रीमहालक्ष्मी की तो जैसे बिना मांगे मन की मुराद पूरी हो गई। अब तक वह ऐसे छह कॉल अटेंड कर चुकी हैं। वह बताती हैं, ‘शुरू में कुछ दिन नर्वस महसूस किया। लेकिन जैसे-जैसे उनकी दुविधाएं खत्म होती गईं, मजा आने लगा। अब इंग्लिश में बात करने का आत्‍मविश्‍वास आ गया है।’ वह मानती हैं कि अंग्रेजी सीखने के कई फायदे हैं। किताबें पढ़ सकती हैं। गैर-तमिल भाषियों से भी संवाद कर सकती हैं। वहीं, इनके मेंटर वेदांत की बात करें, तो दोस्‍तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि वह खुद सातवीं कक्षा के स्टूडेंट हैं और उसी शहर के एक प्रसिद्ध स्कूल में पढ़ते हैं। जब उन्हें ‘लेट्स टीच इंग्लिश’ इनिशिएटिव की जानकारी मिली, तो वे खुद को रोक नहीं पाए और वंचित तबके के बच्चों को पढ़ाने, उन्हें गाइड करने के लिए कमर कस ली।

दसवीं की स्टूडेंट बनी अंग्रेजी की मेंटर

दसवीं की स्टूडेंट सुहानी को भी स्वैच्छिक कार्यों में शामिल होना अच्छा लगता है। उन्हें लगता है कि जो अवसर उन्हें मिले हैं, उससे दूसरों की मदद करनी चाहिए। अमेरिका में वॉलंटियरिंग उनके कोर्स का भी हिस्सा होता था। वहां वह पेड़ लगाने, फूड बैंक के साथ काम करने जैसी कई गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं। जब भारत लौटीं, तो यहां भी उसे जारी रखा। वह बताती हैं, ‘मुझे पढ़ाना बहुत अच्छा लगता है।

मैं मानती हूं कि हर बच्चे को अंग्रेजी जानने-समझने का अधिकार है। फिर वह किसी भी तबके से क्यों न आते हों।’ इन दिनों सुहानी सातवीं कक्षा की स्टूडेंट जोयाना की मेंटरिंग कर रही हैं। बताती हैं, ‘मैं हर रविवार को उसे फोन करती हूं। अब तक छह कॉल किए हैं। हर हफ्ते हम अलग-अलग विषयों पर बातें करते हैं। मैं उसे अंग्रेजी में वाक्य बनाने से लेकर अन्य जरूरी चीजें बताती हूं। हम दोनों में बहुत कुछ समान है, जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। जैसे उसे कविताएं लिखने और बेकिंग का शौक है और मुझे भी। हम दोनों को ही मैथ्स खास पसंद नहीं है। इस तरह, हम खूब मजे करते हैं।’

दोस्त व गाइड बनकर बदल रहे जिंदगी

चेन्नई में समाजसेवी आरती मधुसूदन द्वारा शुरू किया गया ‘लेट्स टीच इंग्लिश इनिशिएटिव’ 100 फीसद वॉलंटियर्स द्वारा संचालित अभियान है। इसमें गरीब तबके के बच्चों के अलावा, शिक्षकों तथा कम्युनिकेशन एवं मार्केटिंग से जुड़े उन युवाओं को भी गाइड किया जाता है, जो अंग्रेजी सीखना चाहते हैं, ताकि उन्‍हें नौकरी मिलने और करने में कोई दिक्कत न आए। इसमें कोई भी स्वेच्छा से सहयोग कर सकता है। उसे 15 हफ्ते तक, एक-एक घंटे बच्चों को फोन पर अंग्रेजी पढ़ाना होता है। वॉलंटियर करने वाली की उम्र 11 से लेकर 70 वर्ष तक की हो सकती है। वे डॉक्टर, इंजीनियर, आर्टिस्ट, टीचर, स्टूडेंट, आइटी प्रोफेशनल,गृहिणी कोई भो हो सकते हैं। इससे पहले, आरती ने अप्रैल महीने में ‘द कॉल ऐंड कनेक्ट’ इनिशिएटिव शुरू किया था, जिसमें 700 से अधिक महिलाओं ने स्वेच्छा से बच्चियों की दोस्त व टीचर बनकर फोन पर बातें कीं। उनका मार्गदर्शन किया। लड़कियों ने भी दिल खोलकर उनसे अपने सपने, इच्छाएं साझा कीं। अभियान समाप्त हो चुका है। लेकिन कुछ अब भी जुड़ी हुई हैं।

फोन पर रिकॉर्ड कर रहे बच्चों की कहानियां

फोन के जरिए होने वाली ऐसी पहल का सबसे सकारात्मक पहलू यह रहा है कि अनजान लोग बच्चों से बातें करते हैं। बावजूद इसके, सबकुछ आपसी विश्वास व समझदारी से आगे बढ़ता जाता है। बच्चे पढ़ाई से लेकर अपने शौक-पसंद-नापसंद से जुड़ी चर्चाएं करते हैं। कविता-कहानी सुनते-सुनाते हैं। जैसे गुरुग्राम के दूसरी कक्षा के स्टूडेंट आरव कुमार को भी जब उनकी मां बिंदिया ने बताया कि कैसे ‘टेल अ स्टोरी’ इनिशिएटिव के जरिये बच्चों के लिए हर भाषा में कहानियां रिकॉर्ड की जा रही हैं, तो आरव ने उसमें गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने मां के साथ मिलकर कहानी रिकॉर्ड की और उसे ‘आइ-वॉलंटियर’ की वेबसाइट पर बनाए गए पेज पर अपलोड कर दिया। बिंदिया की मानें, तो आरव को कविताएं लिखने का शौक है। उसे स्टोरी सुनने में भी मजा आता है। इसलिए वह आगे सिर्फ अपनी आवाज में कहानी रिकॉर्ड कर भेजना चाहता है।

दीदी-भैया बन जोड़ रहा ‘द दोस्ती प्रोजेक्ट’

सब जानते हैं कि वैश्विक महामारी का बच्चों पर कितना असर हुआ है। स्कूल बंद। दोस्तों से मिलना खत्म। जिन परिवारों में एक ही स्मार्टफोन था या स्‍मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्‍शन नहीं था, उससे तमाम बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई। बच्चे अकेले और अलग-थलग से पड़ गए। हालांकि, इस मुश्‍किल को समझते हुए कई स्वयंसेवी संगठन बच्चों के लिए काम कर रहे थे। लेकिन उनका सीधा संवाद उनसे कम ही हो पा रहा था। तभी मुंबई की रिद्धि साह ने सोचा कि क्या हम झुग्गी बस्ती या गरीब तबके के बच्चों के लिए ऐसे दीदी-भैया तैयार कर सकते हैं, जो उनसे सीधे जुड़ सकें हो सकें। फिर नींव पड़ी ‘द दोस्ती प्रोजेक्ट’ की। इसके तहत वॉलंटियर्स दोस्त बनकर 13 से 16 वर्ष के किशोरों से फोन पर (हफ्ते के एक दिन, एक घंटे) बातें करते हैं, उन्हें गाइड करते हैं। पेशे से शिक्षाविद एवं सीआर कंसल्टेंट रिद्धि बताती हैं, ‘हमने स्वयंसेवी संगठनों की मदद से पहले बच्चों को चिह्नित किया। सोशल मीडिया के जरिये वॉलंटियरिंग के इच्छुक लोगों से संपर्क किया, जो उन बच्चों का विश्वास जीतकर, उनका मार्गदर्शन कर सकें। हमने एक पूरा कोर्स भी डिजाइन किया है कि बच्चों से क्या, किस मुद्दे पर और कैसे बात करनी है। हमारी यह योजना सफल रही। फिलहाल, मुंबई के दो इलाकों (पवई एवं कफ परेड) में यह एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चल रहा है। आगे स्थितियां सामान्य होने पर वॉलंटियर्स और बच्चे आमने-सामने भी मिल सकते हैं।’ रिद्धि के अनुसार, उनका मकसद सिर्फ यह है कि बच्चों से बात की जाए, उनका हाल-चाल पूछा जाए कि पूरे दिन या हफ्ते उन्होंने क्या कुछ किया या सीखा। इससे एक बॉन्डिंग डेवलप होती है और बच्चों को मनोबल बढ़ता है।

फोन पर ‘द टीच इंग्लिश’

समाजसेवी आरती मधुसूदन ने बताया कि एक दिन मुझे दोस्त का फोन आया कि उन्हें सरकारी स्कूल के छठी से 12वीं तक के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने वाले वॉलंटियर्स की जरूरत है। मैंने ‘द टीच इंग्लिश’ नाम से प्रोजेक्ट बनाया और फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर कर दिया कि 50 वॉलंटियर्स की जरूरत है। उम्मीद के विपरीत देश-विदेश से हजारों लोग आगे आए और उन्होंने अलग-अलग राज्यों से आने वाले बच्चे-बच्चियों को फोन पर अंग्रेजी सिखाने से लेकर अन्य समस्याओं का समाधान देना शुरू किया।

इससे बच्चों का भाषा के प्रति डर दूर करने में काफी मदद मिली। आज वे फोन का बेसब्री से इंतजार करने लगे हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। हमने इसके लिए एक वेबसाइट भी तैयार की है, जहां 15 हफ्ते के प्रोग्राम का पूरा खाका दिया गया है। हम इस कार्यक्रम को आगे भी ले जाना चाहते हैं।

क्षेत्रीय कहानियों के लिए ‘टेल अ स्टोरी’ अभियान

मुंबई के आइ वॉलंटियर के संस्थापक शलभ सहाय ने बताया कि कहानियां सुनना किसे पसंद नहीं। बच्चों को तो खासकर। हमने देखा कि अंग्रेजी में तो ढेरों कहानियां मिल जाती हैं। लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं या बोलियों में कहानियों की संख्या बहुत कम होती है। इसी कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हमने ‘टेल अ स्टोरी’ अभियान शुरू किया है, जिसके तहत ऑडियो रिकॉर्डेड स्टोरीज की एक पब्लिक लाइब्रेरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसमें वॉलंटियर्स सस्ते से सस्ते मोबाइल पर अपनी भाषा (मराठी, बांग्‍ला, कन्‍नड़ या किसी भी अन्य क्षेत्रीय भाषा) में बच्चों के लिए कहानियां रिकॉर्ड कर हमें भेज सकते हैं। खुद बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं। अब तक स्टूडेंट (12 से 18 वर्ष), पेशेवर व पैरेंट वॉलंटियर्स की 200 से अधिक कहानियां हमें मिली हैं। हम उन्हें जांचने-परखने के बाद अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड करते हैं, जहां से कोई भी बच्चा उन्हें सुन सकता है।

दोस्तों से फंड रेज कर खरीदे फोन

चेन्नई के विद्या निकेतन स्कूल की राधा वासुदेवन ने बताया कि मेरे स्कूल में समाज के कमजोर तबके से आने वाले बच्चों एवं शिक्षकों की अच्छी संख्या है। वे अंग्रेजी सीखना और बोलना चाहते हैं। लेकिन घर में इसके अभ्यास का उपयुक्त माहौल न होने एवं संसाधानों की कमी के कारण वे खुद को उसमें असमर्थ या असहज पाते हैं। इसके लिए हमने वॉलंटियर्स से संपर्क किया, जो उन्हें अंग्रेजी में बोलना आदि सिखा सकें।

साथ ही, हमने कुछ पुराने फोन इकट्ठा किए। दोस्तों की मदद से फंड रेज कर नए फोन भी खरीदे गए, क्योंकि कई ऐसे बच्चे थे जिनके घरों में बेसिक फोन तक नहीं था। इस तरह कुल 60 फोन इकट्ठा हुए। आज 280 बच्चों के साथ-साथ 14 टीचर्स भी वॉलंटियर्स की मदद से अपनी अंग्रेजी को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। पैरेंट्स को सिर्फ सिम कार्ड का खर्च उठाना पड़ता है। इसे लेकर बच्चे और पैरेंट्स दोनों खूब उत्साहित हैं।

वॉलंटियरिंग से मिलती है खुशी

सिएटल (यूएस) की सॉफ्टवेयर इंजीनियर नेहा कटोच ने बताया कि वॉलंटियरिंग में देने से अधिक कुछ हासिल करने की खुशी मिलती है। मैं बीते पांच सालों से स्वैच्छिक गतिविधियों में हिस्सा ले रही हूं। कोशिश रहती है कि हफ्ते में कुछ घंटे स्वेच्छा से किसी की मदद कर सकूं। मैंने अमेरिका में फूड किचन में काम करने से लेकर लोगों को कपड़े तक बांटे हैं। बेघरों के लिए एप डेवलप किया है। बुजुर्गों के घरों तक खाना पहुंचाया है। ऑटिस्टिक मरीजों के साथ उनके स्वीमिंग क्लासेज में गई हूं।

लेकिन मार्च महीने के बाद से जब बाहर निकलना बंद हो गया, तब मैंने अपने देश के लिए वर्चुअल वॉलंटियरिंग शुरू की। पहले पिरामल फाउंडेशन के लिए काम किया। बाद में ‘टेल अ स्टोरी’ एवं ‘द टीच इंग्लिश’ कैंपेन से जुड़ी। इस समय भारत के 15 से ज्यादा संगठनों के साथ को-ऑर्डिनेट कर रही हूं। हमारे साथ दुनिया भर के 1600 से अधिक वॉलंटियर्स जुड़े हैं। ये सभी 12 से लेकर 55 वर्ष के लोगों को इंग्लिश ग्रामर सिखाने से लेकर उनसे अलग-अलग मुद्दों पर बात करते हैं।

Edited By: Sanjay Pokhriyal