नई दुनिया, बिलासपुर। स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में श्रीमद् भगवत गीता को शामिल किए जाने की मांग संबंधी याचिका पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनवाई मंजूर कर ली है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की सराहना करते हुए यूजीसी, सीबीएसई, अखिल भारतीय विश्वविद्यालय संगठन, केंद्र व राज्य शासन सहित 17 पक्षकारों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

अखिल भारतीय मलयालम संघ के अध्यक्ष सोमन के. मेनन, वीर वीरांगना संगठन अध्यक्ष चंद्रप्रभा सिसोदिया समेत अन्य ने देश में पहली बार गीता को पाठ्यक्रम में शामिल कराने की मांग संबंधी जनहित याचिका हाई कोर्ट में दाखिल की है। गुरुवार को याचिका पर सुनवाई में चीफ जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी व जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर की डबल बेंच के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि धर्म व अध्यात्म अलग हैं।

धर्म से पहले अध्यात्म आया है। 1000 वर्ष पूर्व आदिशंकराचार्य ने हिंदू धर्म के लिए काम शुरू किया। वहीं, अध्यात्म 5000 हजार वर्ष पुराना है। धर्म बाद में आया है। उन्होंने कहा कि गीता में कहीं भी हिंदू शब्द का उपयोग नहीं हुआ है। कोई भी धर्म संस्कृति के आधार पर बनता है। कोई भी व्यक्ति जन्म से अध्यात्म में जा सकता है। अध्यात्म से व्यक्ति का दिमाग शांत होता है। इसके बाद दिमाग किसी बड़ी शक्ति में विलय हो जाता है। इसी आधार पर नई खोज व आविष्कार होता है। ऐसे में गीता को पाठ्यक्रम में शामिल कर शोध भी कराया जाना चाहिए। विदेशों में कई विवि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कर चुके हैं।

ब्रेन मैपिंग का दिया उदाहरण

याचिका में अध्यात्म को परिभाषित करने के लिए ब्रेन मैपिंग का उदाहरण दिया गया। याचिका में कहा गया वैज्ञानिकों ने दिमाग की स्थिति को नापने के लिए न्यूरो प्लास्टिसिटी की खोज की है। सात नन के दिमाग में इलेक्ट्रोट लगाकर उनके दिमाग की स्थिति की जांच की गई थी। इसमें सभी के दिमाग को शांत पाया गया। यही अध्यात्म की स्थिति है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh