चुनाव आयोग पर क्यों मचा घमासान? 10 सवालों के जवाब में सब होगा क्लियर
भारतीय चुनाव आयोग में अंदरूनी फैसलों को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है, जहां दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों ...और पढ़ें
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वोटर लिस्ट, नियुक्तियों और निर्णय प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
HighLights
दो चुनाव आयुक्तों ने 10 माह में 14 फैसलों पर आपत्ति जताई।
वोटर लिस्ट, नियुक्तियों और निर्णय प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल।
सुप्रीम कोर्ट ने मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय चुनाव आयोग के अंदरूनी फैसलों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक तीन चुनाव आयुक्तों में से दो सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में पूरे आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई।
ये मामला तब और ज्यादा चर्चा में आ गया जब बुधवार यानि 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया वाले कानून की वैधता पर बंटी नजर आई और मामले को CJI के पास भेज दिया गया और उनसे 5 जजों की संविधान बेंच का गठन करने की अपील की गई।
क्यों मायने रखता है ये विवाद
ये विवाद चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े तीन सवालों को सामने लाया है, कौन फैसला करता है, वोटर डेटाबेस को कौन कंट्रोल करता है और टॉप पर लोगों को कौन चुनता है।
विवाद के केंद्र में कौन से 10 सवाल?
1. पहला सवाल दो चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर आपत्ति जताई?
आपत्तियां चुनाव प्रशासन के कुछ सबसे बुनियादी कामों से जुड़ी है। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार संधू और जोशी दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म 6 में बदलाव, SIR के दौरान नाम हटाने और जोड़ने, वोटर लिस्ट डेटाबेस पर एक्सेस और कंट्रोल जैसे मुद्दे उठाए।
साथ ही दोनों ने कुछ नोट में आयोग की मंजूरी के बिना आयोग के नाम पर जारी किए गए कथित कम्युनिकेशन पर भी सवाल उठाए। इस सवाल पर EC ने जवाब देते हुए कहा, ये फैसला लेने की प्रक्रिया के दौरान मिले सुझाव थे, कई सदस्यों वाली संस्था में अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन आखिर में सभी फैसलों को तीनों आयुक्तों की मंजूरी मिली थी।
2. क्या EC एक दूसरे से असहमत हो सकते हैं?
इस सवाल का जवाब है हां, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 की धारा 18 के तहत आयोग का कामकाज 'जहां तक संभव हो' सर्वसम्मित से किया जाना चाहिए।
इस धारा में 'जहां तक संभव हो' मेन बात है। लेकिन असहमति होने पर बहुमत की राय के अनुसार फैसला लिया जाता है। तीन आयुक्त की स्थिति में 2:1 से मामले का फैसला होता है।
लेकिन मौजूदा विवाद में मुद्दा अलग है, इस विवाद में सवाल है कि उस स्थिति में क्या होगा जब दो आयुक्त कहें कि पूरे आयोग की मंजूरी के बिना कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी।
3. क्या CEC बाकी दो आयुक्तों का बॉस होता है?
नहीं ऐसा नहीं है। तीनों आयुक्तों का पद और शक्तियां समान हैं। CEC का पद संस्थागत रूप से प्रमुख हो सकता है, लेकिन उनके पास कोई विशेषाधिकार नहीं है। और न ही बाकी दो आयुक्त उनके डिप्टी हैं।
TN शेशन के कार्यालय के दौरान इस सवाल पर जबरदस्त बहस हुई थी। उस सुप्रीम कोर्ट ने कई सदस्यों वाले चुनाव आयोग के गठन को सही ठहराया और इस विचार को खारिज कर दिया कि बाकी आयुक्त सिर्फ दिखावे के लिए हैं। कानूनी तौर पर बहुमत से फैसले लिए जा सकते थे।
2023 के एक कानून के मुताबित आयोग की कार्यप्रणाली और काम का बंटवारा सबकी सहमति से तय किया जा सकता है, जबकि अहम मामलों पर असहमति होने पर बहुमत से फैसला लिया जा सकता है।
4. जब असहमति आम, तो विवाद इतना क्यों बढ़ा?
ये विवाद असहमति का नहीं है, बल्कि ये विवाद उस बात पर है कि क्या विवादित कार्रवाइयां उन क्षेत्रों में आती थीं जिनके लिए आयोग की मंजूरी जरूरी थी और अगर हां तो क्या मंजूरी ली गई थी।
हालांकि EC का कहना है कि उसके अंतिम फैसले सामूहित सर्वसम्मति से लिए गए थे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताए गए कुछ नोट में एक अहम सवाल उठाया गया, आखिर आयोग के नाम पर कार्रवाई की मंजूरी किसने दी।
उदाहरण के लिए, अप्रैल में संधू और जोशी ने अलग-अलग उन कम्युनिकेशंस की ओर इशारा किया, जिनके बारे में जांच के अनुसार आयोग की जरूरी मंजूरी के बिना जारी किया गया था।
5. क्या चुनाव आयुक्तों ने पहले असहमति नहीं जताई ?
हाँ। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने 2019 में आचार संहिता के कुछ मामलों में बहुमत से अलग राय रखी थी कुछ मामलों में आयोग का अंतिम फैसला 2-1 से हुआ था। लेकिन मौजूदा मामला वैसा नहीं है।
संधू और जोशी के नोट मुख्य रूप से मतदाता सूची प्रणाली के प्रशासन और कार्रवाई को मंजूरी देने की प्रक्रिया से संबंधित है न कि इस बात से कि आयुक्तों को औपचारिक रूप से 2-1 से हराया गया।
6. क्या EC की असहमति को सार्वजनिक किया जाना चाहिए?
यह सवाल राजनीतिक रूप से अभी अनसुलझा है। इस सवाल को लेकर दो तर्क हैं, पहला तर्क गोपनीयता को लेकर है जिसमें ये कहा गया है कि अगर हर असहमति तुरंत सार्वजनिक कर दी जाए, तो अधिकारी ज्यादा सतर्क हो सकते हैं, खासकर तब जब चुनाव चल रहे हों।
वहीं दूसरे तर्क में कहा गया कि जानकारी सार्वजनिक करने से यह दिखाया जा सकता है कि विवादित फैसलों पर सिर्फ बिना सोचे-समझे मंजूरी नहीं दी गई है, बल्कि उन पर चर्चा की गई थी। दूसरे तर्क में बताया गया कि RBI और SC इसी तरीके को अपनाते हैं।
RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी के मामले न सिर्फ फाइनल फैसले को पब्लिश करना जरूरी होता है बल्कि यह भी बताना जरूरी है कि हर सदस्य ने कैसे वोट दिया और हर सदस्य का लिखित स्पष्टीकरण क्या था।
वहीं अगर सुप्रीम कोर्ट की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट भी अक्सर बहुमत और असहमति वाले फैसले पब्लिश करता है। हालांकि चुनाव आयोग का तरीका पारंपरिक रूप से अलग रहा है इसीलिए मौजूदा विवाद ने एक पुराना सवाल फिर से खड़ा कर दिया है।
7. वोटर लिस्ट का सॉफ्टवेयर विवाद में क्यों आया?
चुनाव आयोग का काम अब काफी हद तक डिजिटल हो गया है। कानून के तहत, चुनाव क्षेत्र के चुनावी रोल की जिम्मेदारी किसी वैधानिक अधिकारियों की होती है, लेकिन आज-कल वोटर रोल को आपस में जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मैनेज किया जाता है।
इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के मुताबिक संधू और जोशी ने चुनावी डेटाबेस तक पहुंच के बढ़ते केंद्रीकरण और स्थानीय वैधानिक अधिकारियों के पास बचे नियंत्रण के दायरे पर सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट में गोवा के 97 वोटरों का एक मामला बताया गया जिन्हें चुनावी अधिकारियों ने योग्य तो माना था, लेकिन उन्हें तुरंत बहाल नहीं किया जा सका था क्योंकि उस समय सॉफ्टवेयर में जरूरी सुविधा नहीं थी।
8. SIR प्रक्रिया इतनी संवेदनशील क्यों है?
इस सवाल का सीधा जवाब है पैमाना। SIR के दौरान देशभर के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी योग्य नागरिक का नाम मतदाता सूची से कटना एक गंभीर मुद्दा माना जाता है।
सिस्टम को इसे ठीक करने का कोई तेज तरीका खोजने की जरूरत है। दिल्ली में हुई SIR प्रक्रिया ने एक अजीब स्थिति पैदा कर दी है। 33 लाख से ज्यादा वोटरो को लॉजिकल विसंगतियों जैसे मामलों के नोटिस मिले हैं। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि क्या कुछ नोटिस बिना सोचे समझे जारी किए गए थे और पूछा है कि क्या अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत थी।
9. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर विवाद क्यों?
बुधवार यानि 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा चुनाव ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के तरीके पर अलग-अलग राय रखी थी जस्टिस शर्मा ने 5 जजों की संविधान पीठ को मामला भेजने का समर्थन किया था।
वहीं जस्टिस दत्ता ने इससे अलग राय रखते हुए इस बात पर जोर दिया कि EC को न सिर्फ स्वतंत्र होना चाहिए बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। अब यह मामला सही बेंच बनाने के लिए चीफ जस्टिस के पास जाएगा।
10. तो अब इस विवाद के बाद बड़ा सवाल क्या है?
बड़ा सवाल ये नहीं है कि चुनाव आयोग में सहमति या असहमति सही है या नहीं, क्योंकि तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था को बनाया ही इस तरह से गया कि असहमति की गुंजाइश हो।
लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि क्या उस असहमति के बाद क्या होगा, इसके लिए कोई नियम है या नहीं। साथ ही यह बात वोटर लिस्ट की शुद्धता से भी जुड़ी है।बल्कि बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि असहमति होने की स्थिति में क्या किया जाए?
यह बात वोटर लिस्ट की पवित्रता से जुड़ी भी है। किसी भी तरह के चुनाव में कोई भी योग्य वोटर वोट देने के अपने अधिकार से वंचित नहीं रहना चाहिए।
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