ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। ग्वालियर का आसमान ही तेजस को हवा में रिफ्यूल करने का साक्षी रहा है। ऐसा करने वाला देश का एकमात्र एयरबेस है। यानी यदि यहां से युद्ध के दौरान उड़ान भरने वाले किसी फाइटर जेट को फ्यूल की जरूरत पड़ी तो तुरंत दूसरा जेट हवा में जाकर ही उसे रिफ्यूल कर सकता है।

पिछले दिनों भारतीय रक्षा के प्रमुख संस्थान हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड ने एयरफोर्स के साथ मिलकर यह इतिहास रचा। यहीं से भारत के लड़ाकू विमान 'तेजस' को हवा में ही ईंधन भरकर भारत विश्व के चुनिंदा देशों में शामिल हुआ। अब लड़ाई के दौरान हमारे लड़ाकू विमान बिना रुके दुश्मन से लड़ सकते हैं। रिफ्यूल करने के लिए उन्हें लैंड करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 10 सितंबर 2018 को यह इतिहास बना।

20 हजार फीट की उंचाई पर हुई रिफ्यूलिंग

सितंबर 2018 को मध्य प्रदेश में ग्वालियर के आसमान में 20 हजार फीट की ऊंचाई पर भारतीय वायु सेना के रूस निर्मित एमकेआइ टैंकर विमान आइएल-78 के जरिये तेजस एलएसपी-8 विमान में 1900 किलोग्राम ईंधन भरा गया। इस दौरान तेजस की गति 270 नॉट थी।

महाराजपुरा एयरफोर्स स्टेशन को बनाया था कंट्रोल एंड कमांड सेंटर

आइएल-78 विमान को विंग कमांडर सिद्धार्थ सिंह उड़ा रहे थे, जबकि ग्वालियर स्थित ग्राउंड स्टेशन से एचएएल और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) के डिजायनर पूरी प्रणाली के मानकों की निगरानी कर रहे थे। इससे पहले, चार और छह सितंबर को हवा में ईंधन भरने की प्रणाली का परीक्षण किया गया था, लेकिन इस दौरान विमान में ईंधन का ट्रांसफर नहीं किया गया था।

चुनिंदा देशों के पास है यह क्षमता

इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने सैन्य विमानों में एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की प्रणाली विकसित कर ली है। मालूम हो कि तीन महीने पहले ही एयर-टू-एयर बियांड विजुअल रेंज (बीवीआर) मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया था।

एयरफोर्स के कई घंटे बचेंगे

इस उपलब्धि को पाने के बाद इंडियन एयरफोर्स के कई घंटे बचाए जा सकेंगे, क्योंकि अभी लड़ाई के दौरान फ्यूल कम होने पर तेजस को वापस लैंड करना पड़ता है और रिफ्यूल होने के बाद फिर से टेकऑफ करना पड़ता, इस प्रक्रिया में कई घंटे खराब होते हैं।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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