माला दीक्षित, नई दिल्ली। एससी एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफजहां राजनीतिक वर्ग आक्रोशित है और पुनर्विचार याचिका की मांग हो रही है। वहीं कानूनी तौर पर पुनर्विचार याचिका के सफल होने की उम्मीद जरा कम ही रहती है। कोर्ट के अलावा संसद कानून में संशोधन के जरिए कोर्ट का आदेश निष्प्रभावी कर सकती है लेकिन इस मामले में ये भी थोड़ा मुश्किल होगा क्योंकि कोर्ट ने कानून के किसी भी प्रावधान को नहीं छेड़ा है सिर्फ प्रक्रिया तय की है।

एससी एसटी कानून में तुरंत एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर काफी हायतौबा है। पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की तैयारी चल रही है। लेकिन बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के जो नियम तय हैं उसमें ऐसी याचिकाओं की सफलता की दर काफी कम है। कारण है कि किसी भी फैसले पर पुनर्विचार तभी किया जाता है जबकि उसमें सीधे तौर पर कानूनी खामी नजर आ रही हो।

साथ ही पुनर्विचार याचिका में ऐसी कोई नयी दलीलें या तथ्य नहीं दिये जा सकते जो कि मुख्य मामले की सुनवाई के दौरान नहीं पेश हुए थे। पुनर्विचार याचिका पर सामान्यता खुली अदालत में बहस और सुनवाई नहीं होती। नियम के मुताबिक याचिका पर मुख्य फैसला देने वाले न्यायाधीश चैम्बर में सकुर्लेशन के जरिये विचार करते हैं। अगर उसमें उन्हें लगता है कि खुली अदालत में सुनवाई की जरूरत है तो वे इस बारे में आदेश देते हैं। चूंकि मामले पर विस्तृत सुनवाई हो चुकी होती है और फैसला देने वाले न्यायाधीश ही पुनर्विचार करते हैं तो ज्यादातर मामलों में याचिका खारिज हो जाती है।

पुनर्विचार के बाद हो सकती है क्यूरेटिव याचिका

पुनर्विचार याचिका के बाद फैसले से संतुष्ट न होने पर क्यूरेटिव (सुधार) याचिका दाखिल हो सकती है। हालांकि इसके लिए भी शर्ते तय हैं। क्यूरेटिव पर मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के अलावा फैसला देने वाली पीठ के न्यायाधीश विचार करते हैं। इसमें भी सर्कुलेशन के जरिए चैम्बर में सुनवाई होती है। बहुत कम मामलों में नोटिस जारी कर खुली अदालत में सुनवाई होती है। क्यूरेटिव का मुख्य आधार किसी ऐसी कानूनी बात या तथ्य को सामने लाना होता है जिससे पूरे मामले की परिस्थिति और परिदृश्य ही बदल जाता हो। ऐसा विरले ही मामलों में होता है इसलिए क्यूरेटिव की सफलता दर भी बहुत कम है।

संसद के पास भी कम है गुंजाइश

किसी भी मामले में कानूनी पेच फंसने पर संसद के पास कानून में संशोधन के असीमित अधिकार होते हैं। हालांकि संसद सीधे तौर पर कोर्ट के फैसले को निरस्त नहीं कर सकती लेकिन फैसले में आधार बनाए गए कानून के प्रावधानों में बदलाव करके फैसला निष्प्रभावी कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के वकील ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि इस मामले में संसद के पास कुछ करने की गुंजाइश जरा कम है क्योंकि कोर्ट ने कानून के किसी भी प्रावधान को असंवैधानिक या रद घोषित नहीं किया है। कानून जस का तस अपनी जगह कायम है। कोर्ट ने सिर्फ नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को नेचुरल जस्टिस और संविधानसम्मत बनाया है।

 

Posted By: Kishor Joshi

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