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अमान्य मदरसों पर कई राज्यों में सरकारों की सख्ती से हजारों बच्चों को भविष्य बचा बर्बाद होने से

By Dharmendra SinghEdited By: Shubham Kumar
Published: Thu, 05 Nov 2026 05:15 PM (IST)

कई राज्यों में बिना सरकारी मान्यता और अनियमितताओं के चल रहे मदरसों पर सरकार ने सख्त कार्रवाई शुरू की है। ...और पढ़ें

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

HighLights

  1. बिना मान्यता मदरसों में मिलीं गंभीर अनियमितताएं और फर्जीवाड़े।

  2. यूपी, बंगाल, उत्तराखंड सहित कई राज्यों में हुई कार्रवाई।

  3. बच्चों की शिक्षा और भविष्य सुरक्षित करना मुख्य उद्देश्य।

धर्मेंद्र सिंह, नई दिल्ली। प्रत्येक बच्चे का सपना होता है कि उसे अच्छी शिक्षा मिले, वह आगे बढ़े और अपने परिवार का सहारा बने। इस सपने की बुनियाद जिस संस्थान में रखी जा रही हो, उसकी अपनी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में हो तो बच्चे का भविष्य कैसे सुरक्षित रह सकता है। कई राज्यों में बिना सरकारी मान्यता और जरूरी पंजीकरण के संचालित हो रहे मदरसों की पड़ताल में कुछ ऐसी ही तस्वीर सामने आई है।

कहीं बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता संदिग्ध मिली तो कहीं संस्थानों के पास अपनी जमीन और भवन तक नहीं थे। कई जगह प्रबंधन समितियों के दस्तावेज फर्जी पाए गए और वित्तीय लेनदेन में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। ऐसे संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और उनके भविष्य की जवाबदेही आखिर किसकी थी।

यह सवाल सरकार और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय था। बच्चों को ऐसे संस्थानों के भरोसे छोड़ देना उनके भविष्य के साथ जोखिम लेने जैसा था। इसी गंभीरता को समझते हुए उत्तर प्रदेश, बंगाल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान समेत कई राज्यों में सरकारों ने कार्रवाई शुरू की है। कहीं मदरसों को सील किया गया, कहीं बंद करने के नोटिस जारी हुए तो कहीं बच्चों को दूसरे संस्थानों में पहुंचाया गया।

यह कार्रवाई केवल नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं है, इसका बड़ा उद्देश्य उन बच्चों को ऐसी व्यवस्था से निकालना है, जहां उनकी शिक्षा और भविष्य की कोई सुनिश्चित गारंटी नहीं थी।

बंगाल में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग की ओर से 22 जिलों और कोलकाता में कराए गए सर्वेक्षण में 2396 मदरसे बिना जरूरी सरकारी पंजीकरण अथवा मान्यता के संचालित होते मिले। इनमें 252 को तत्काल बंद करने का नोटिस जारी किया गया, जबकि 100 को कारण बताओ नोटिस दिया गया है।

सर्वेक्षण में केवल कागजी मान्यता ही नहीं, बच्चों की संख्या, शिक्षकों की योग्यता, प्रबंधन, भवन और वित्तीय स्रोतों की भी पड़ताल की गई। जिला प्रशासन की रिपोर्ट का दोबारा सत्यापन करने के लिए राज्य स्तर पर निरीक्षण दल लगाए गए हैं। जिन संस्थानों में बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं, वहां उनका भविष्य किस भरोसे सुरक्षित रहता। सरकार अब पंजीकरण, सत्यापन और निरीक्षण की स्पष्ट व्यवस्था बनाने की तैयारी में है।

उत्तर प्रदेश में करीब 24 हजार मदरसे संचालित हैं। इनमें 16 हजार मान्यता प्राप्त और आठ हजार गैरमान्यता प्राप्त बताए गए हैं। भूमि के कूटरचित दस्तावेज के आधार पर मान्यता लेने के मामले में 12 मदरसों की मान्यता निलंबित की गई है। आजमगढ़ के जामिया नूरुल उलूम की मान्यता निलंबित करने के साथ एफआइआर के आदेश भी दिए गए हैं।

इसके अलावा अतिक्रमण के मामलों में 225 मदरसों पर कार्रवाई हुई है। जांच में फर्जी प्रबंध समितियां, अपनी जमीन और भवन का अभाव, अयोग्य शिक्षकों की नियुक्तियां, बिना अनुमति छात्रावासों का संचालन और वित्तीय लेनदेन में अनियमितताएं सामने आई हैं। कोरोना काल में 308 शिक्षकों की नियुक्तियों पर भी सवाल उठे हैं।

उत्तर प्रदेश में 558 मदरसे सरकार से अनुदान प्राप्त करते हैं और इनमें मुंशी व आमिल कक्षाओं में करीब 63 हजार विद्यार्थी पंजीकृत हैं। जब बच्चों को पढ़ाने और उनके भविष्य की जिम्मेदारी उठाने वाली व्यवस्था ही नियमों का पालन नहीं कर रही हो तो जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। फर्जी दस्तावेज और अवैध नियुक्तियों के मामलों में संबंधित संचालकों और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए।

उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड की जगह एक जुलाई 2026 से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने जिम्मेदारी संभाली है। पहले बोर्ड के तहत 452 मदरसे पंजीकृत थे। नई व्यवस्था में सभी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के लिए शिक्षा विभाग में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। अब तक 21 मदरसे सील किए जा चुके हैं, जबकि 108 ने स्वयं संस्थान बंद करने का पत्र दिया है। इनमें 104 हरिद्वार के हैं।

पंजीकरण के लिए आगे नहीं आने वाले 89 अन्य मदरसों को बंद करने की संस्तुति की गई है। दूसरी ओर 34 संस्थानों को अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान का प्रमाणपत्र दिया गया है और 200 ने पंजीकरण कराया है। नई व्यवस्था में गणित, विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान समेत आठ विषयों की आधुनिक शिक्षा अनिवार्य है। धार्मिक शिक्षा ऐच्छिक रखी गई है। उद्देश्य यह है कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा से वंचित न रहना पड़े और उनकी पढ़ाई के लिए जवाबदेह व्यवस्था सुनिश्चित हो।

जम्मू-कश्मीर में भी कुछ मदरसों के संचालन और प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठे हैं। जुलाई 2026 में श्रीनगर के सैदपोरा ईदगाह स्थित शाही बगदादी यतीम ट्रस्ट के नाम पर चल रहे अवैध मदरसे से 16 बच्चों को रेस्क्यू कर पंजीकृत संस्था के हवाले किया गया। वर्ष 2023 में हब्बाकदल के एक मदरसे से 25 बच्चों को मुक्त कराया गया था।

किश्तवाड़ के दो मदरसों में पढ़ने वाले करीब 100 बच्चों को कार्रवाई के बाद सरकारी स्कूलों में भेजा गया। शोपियां के जमात सिराज उल उलूम में 814 विद्यार्थी पढ़ रहे थे। प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी से संबंधों के आधार पर जुलाई 2026 में इस संस्थान पर कार्रवाई की गई, हालांकि, इसका पंजीकरण था।

इन घटनाओं ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पंजीकरण ही बच्चों की सुरक्षा और संस्थान की जवाबदेही की गारंटी नहीं है। संस्थानों की गतिविधियों और प्रबंधन की नियमित निगरानी भी जरूरी है।

दिल्ली से राजस्थान तक अलग-अलग तस्वीर

दिल्ली में करीब चार हजार छोटे मदरसे संचालित होने का अनुमान है। इनमें लगभग 150 सोसायटी के रूप में पंजीकृत बताए जाते हैं। शेष के पंजीकरण की स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्थानीय अनुमान के अनुसार इनमें करीब 80 हजार बच्चे पढ़ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में आठ मदरसे संचालित हैं। सिरमौर के मिस्सरवाला में 586 और शिमला के कुठार में 87 बच्चे पढ़ रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों में वहां कोई कार्रवाई नहीं हुई है। राजस्थान में राज्य मदरसा बोर्ड के अधीन 3250 मदरसे पंजीकृत हैं। करीब दो माह पहले जैसलमेर, बाड़मेर और श्रीगंगानगर में सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बने सात मदरसों को ध्वस्त किया गया।

बच्चों की पढ़ाई न छूटे, तय हो संचालकों की जवाबदेही

सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार कहते हैं कि सरकारों की कार्रवाई के साथ सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन बच्चों के भविष्य को संभालने की है, जो इन संस्थानों में पढ़ रहे थे। उन्हें उनकी उम्र और कक्षा के अनुरूप मान्यता प्राप्त विद्यालयों में प्रवेश दिलाना, पढ़ाई का क्रम बनाए रखना और जरूरत के अनुसार देखभाल की व्यवस्था करना जरूरी है।

श्रीनगर और किश्तवाड़ में बच्चों को दूसरी संस्थाओं और सरकारी स्कूलों में भेजने की पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण है। साथ ही फर्जी दस्तावेज, अवैध नियुक्तियों, वित्तीय गड़बड़ियों और बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले संचालकों को भी जवाबदेह बनाना होगा।

किसी संस्थान को नियमों के विरुद्ध चलाने की कीमत मासूम बच्चों को अपनी शिक्षा और भविष्य गंवाकर नहीं चुकानी चाहिए। सरकारी सख्ती तभी पूरी तरह सार्थक होगी, जब बच्चों को सुरक्षित शैक्षिक वातावरण मिले, उनकी पढ़ाई निर्बाध जारी रहे और ऐसे संस्थानों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।

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