जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सरकार राष्ट्रीय राजमार्गो से संबंधित मौजूदा टोल नीति में संशोधन का विचार कर रही है। इसे आम लोगों के साथ-साथ ट्रांसपोर्टरों और कारपोरेट सेक्टर के लिए राहतकारी बनाने का प्रयास किया जाएगा।

खराब सड़कों पर समान टोल और नियामक का अभाव नीति की बड़ी खामी

इसके लिए एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ एजेंसी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) की सेवाएं ली गई हैं जो मौजूदा नीति की समीक्षा कर छह महीने में अपने सुझाव देगी।

सड़क मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी मुताबिक बीसीजी से कहा गया है कि नीति को अंतरराष्ट्रीय चलन और मानकों के अनुरूप ढालने के साथ-साथ सभी स्टेकहोल्डर के लिए संतुष्टिकारक बनाने के लिए जरूरी सुझाव दे।

बीसीजी टोल दर निर्धारण के मौजूदा फार्मूले पर भी विचार करेगी। जिसमें थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर हर वर्ष अप्रैल में टोल दरों में संशोधन का प्रावधान है। बीते अप्रैल में एनएचएआइ ने इसी आधार पर पूरे देश में राष्ट्रीय राजमार्गो की टोल दरों में 5 फीसद की बढ़ोतरी की थी।

आम आदमी के साथ कारपोरेट सेक्टर को भी है नीति से शिकायत

मौजूदा नीति में दो लेन के हाईवे पर चार लेन हाईवे के मुकाबले 60 फीसद टोल वसूलने की व्यवस्था है। बीसीजी इसके औचित्य की भी जांच करेगी। साथ ही जिन 25 किस्म के विशिष्ट व्यक्तियों तथा सात किस्म के वाहनों को टोल से छूट दी गई है उनमें कमी-बेशी की संभावनाओं पर भी विचार करेगी।

दरअसल, टोल नीति में बदलाव की आवश्यकता मुख्यत: दो वजहों से महसूस की गई है। एक, जनता की नाराजगी और दो, कारपोरेट सेक्टर की मांग। जहां जनता को शिकायत है कि टोल की दरें बहुत अधिक हैं तथा अधूरी और टूटी सड़कों पर टोल की वसूली अन्याय है। वहीं कारपोरेट सेक्टर ने सड़क मौद्रीकरण योजना के आने के बाद टोल नीति की समीक्षा का दबाव बनाया है।

ट्रांसपोर्टर तो टोल को समाप्त कराने पर ही अड़े हैं। ट्रांसपोर्टरों की सोच है कि जब सरकार वाहन खरीदने से लेकर चलाने तक कई तरह के टैक्स लेती है तो फिर ऊपर से टोल क्यों। टोल विवादों के समाधान के लिए कोई नियामक भी नहीं है। यदि सड़क पर वाहन चलाने के लिए शुल्क की अदायगी करना इतना ही पवित्र राष्ट्रीय कर्म है फिर वीआइपी लोगों को इससे छूट क्यों दी जाती है? नीति की समीक्षा के जरिए सरकार इन सभी प्रश्नों का उत्तर देना चाहती है।

 

Posted By: Bhupendra Singh

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