नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) विधेयक लोकसभा से 1 अगस्त को और राज्यसभा से 29 जुलाई को पारित हो गया है। इस नए कानून के तहत एनएमसी मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का स्थान लेगा। साथ ही इसमें प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस को नियमित करने का प्रावधान किया गया है। सरकार ने इस कदम को चिकित्सा शिक्षा तथा सुविधाओं के क्षेत्र में सबसे बड़ा सुधार बताया है।

ये हैं प्रावधान

इस नए कानून के तहत देश भर में सिर्फ एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा, एकल निकास परीक्षा, विदेशी चिकित्सा स्नातकों के लिए एक स्क्रीनिंग टेस्ट और स्नातकोत्तर कार्यक्रम में प्रवेश के लिए परीक्षा का प्रावधान है। एनएमसी में एक चिकित्सा सलाहकार परिषद होगी, जिसमें प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सदस्य शामिल होगा। यूजीसी के अध्यक्ष और राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के निदेशक एनएमसी को सलाह देंगे और सिफारिश करेंगे। स्थापना और मान्यता के लिए मेडिकल कॉलेजों को केवल एक बार अनुमति की आवश्यकता होगी। कॉलेज अपने दम पर सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा और वे अपने दम पर स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी शुरू कर सकेंगे।

एमबीबीएस छात्रों को देनी होगी एग्जिट परीक्षा

एमबीबीएस पास करने के बाद छात्रों को मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए एग्जिट परीक्षा देनी होगी। इस परीक्षा के बाद डॉक्टरों को कोई परीक्षा नहीं देनी होगी। इसमें आने वाले अंक के आधार पर उनका नामांकन पीजी में हो जाएगा। पीजी के लिए अलग से होने वाली एनआइआइटी की परीक्षा स्वत: खत्म हो जाएगी। एग्जिट परीक्षा पास करने के बाद छात्रों को प्रैक्टिस करने का अधिकार मिल जाएगा। फेल होने वाले छात्र दोबारा से यह परीक्षा दे सकेंगे। अपनी रैंक सुधारने के लिए भी दोबारा परीक्षा देने का प्रावधान है। विदेश से आने वाले एमबीबीएस के छात्रों को भी भारत में प्रैक्टिस करने के लिए अलग से परीक्षा नहीं देनी होगी।

ये हुआ बदलाव

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर बनी संसदीय स्थायी समिति की 109वीं रिपोर्ट की सिफारिशों के बाद उस प्रावधान को खत्म कर दिया गया है, जिसमें होम्योपैथी और भारतीय चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों को एक ब्रिज कोर्स के बाद एलोपैथी दवा लिखने की अनुमित थी।

संस्थानों की फीस

इस कानून के तहत देश भर के सभी निजी मेडिकल संस्थानों में 40 फीसद सीटों की फीस एनएमसी तय करेगा, जबकि शेष बची हुईं 60 फीसद सीटों की फीस निजी संस्थान खुद तय करेंगे।

क्यों हुआ बदलाव

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 92वीं रिपोर्ट (2016) में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के कामकाज की जांच की और इसकी तीखी आलोचना की। जांच में पता चला कि एमसीआइ अपनी अनिवार्य जिम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम रहा। चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता अपने निम्नतम स्तर पर है, चिकित्सा शिक्षा का वर्तमान मॉडल अच्छे स्वास्थ्य पेशेवरों का उत्पादन नहीं कर रहा है, जो देश की बुनियादी स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।

चिकित्सा शिक्षा और पाठ्यक्रम हमारे स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरतों के साथ एकीकृत नहीं हैं, मेडिकल कॉलेजों से निकलने वाले कई छात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और यहां तक कि जिलास्तर पर खराब संसाधनों में सेवा करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। चिकित्सा स्नातकों में सामान्य प्रसव कराने जैसे बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल कार्यों को करने में क्षमता की कमी है। अनैतिक अभ्यास के उदाहरण बढ़ रहे हैं, जिसके चलते डॉक्टरों के प्रति सम्मान कम हो गया है। जांच में यह भी पता चला कि यदि एमसीआइ में कोई सदस्य भ्रष्ट है तो मंत्रालय के पास उसे हटाने का अधिकार नहीं है। इस तरह के मामलों से संकेत मिलता है कि एमसीआइ समय के साथ विकसित नहीं हुआ है।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal