गोवा में अंतिम संस्कार की लकड़ी के लिए नहीं थे पैसे, परिजनों ने श्मशान में लावारिस छोड़ा शव
गोवा में एक व्यक्ति का शव श्मशान घाट पर इसलिए लावारिस छोड़ दिया गया क्योंकि परिवार के पास अंतिम संस्कार की लकड़ियां खरीदने के पैसे नहीं थे।

(यह तस्वीर एआई द्वारा जनरेट की गई है)

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डिजिटल डेस्क, पणजी। भारत के सबसे छोटे राज्य गोवा में प्रति व्यक्ति आय देश में दूसरे स्थान पर है, बीच विला करोड़ों में बिकते हैं और जीडीपी के आंकड़े हमेशा शानदार दिखते हैं। इसके बावजूद, एक व्यक्ति का शव पूरी रात श्मशान घाट पर लावारिस पड़ा रहा, क्योंकि उसके परिवार के पास चिता जलाने के लिए लकड़ियां खरीदने के पैसे नहीं थे।
इस व्यक्ति का नाम अशोक विष्णु पालयेकर था। उत्तरी गोवा के पेरनेम स्थित कासारवर्ने के देउलवाड़ा वार्ड में उनका घर किसी सामान्य घर जैसा नहीं है। बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच बमुश्किल 20 वर्ग मीटर में बना यह एक छोटा सा ढांचा है। इसमें बिना प्लास्टर की लेटराइट पत्थरों से बनी दीवारें और दो कमरे हैं, जिन पर अब ताला लटका हुआ है।
अशोक अपना जीवन इस छोटे से घर और अपनी दो बहनों के घरों के बीच बिताते थे। उनकी दोनों बहनें विधवा हैं और पेरनेम के अन्य गांवों में रहती हैं। दोनों का गुजारा गरीबों को मिलने वाली 2,000 रुपये प्रति माह की सरकारी पेंशन से होता है। दो साल पहले जब अशोक का एक पैर काटना पड़ा और होटल में उनकी छोटी-मोटी नौकरी छूट गई, तब से उनकी बहनें ही बारी-बारी से उनकी देखभाल कर रही थीं।
गणेश चतुर्थी की पूर्व संध्या पर टूटा दुखों का पहाड़
13 सितंबर को गणेश चतुर्थी की पूर्व संध्या पर 65 वर्षीय अशोक अपने छोटे से घर में बीमार पड़ गए। मुफ्त 108 एंबुलेंस उन्हें पास के कासारवर्ने स्वास्थ्य केंद्र ले गई, जहां अशोक को मृत घोषित कर दिया गया। वहां मौजूद गार्ड के अनुसार, उनकी मौत को रजिस्टर में दर्ज तक नहीं किया गया।
उनकी बहनों ने कहीं सुना था कि पेरनेम नगर पालिका श्मशान घाट में गरीबों का मुफ्त में अंतिम संस्कार किया जाता है। इसलिए, उन्होंने अपने पास बचे थोड़े-बहुत पैसे जुटाए, एक वाहन किराए पर लिया और अपने भाई के शव को वहां ले गईं।
पैसे के अभाव में श्मशान घाट पर छोड़ना पड़ा शव
देर शाम का वक्त था और वहां कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था। राज्य के सबसे बड़े त्योहार से एक दिन पहले श्मशान घाट बिल्कुल खाली था। बहनों के पास लकड़ियां खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, न ही शव को वापस ले जाने या किसी और जगह ले जाने के पैसे थे। इसलिए, मजबूरन उन्हें अपने भाई का शव वहीं छोड़ना पड़ा।
पुलिस को बाद में समझ आया कि यह किसी क्रूरता की वजह से नहीं था, बल्कि इस टूटी हुई उम्मीद के साथ किया गया था कि जो काम परिवार नहीं कर सका, उसे सरकार पूरा करेगी और उनके भाई को सम्मानजनक विदाई मिलेगी।
पुलिस ने सुलझाई लावारिस शव की कहानी
अगली सुबह जब पुलिस को श्मशान में शव मिला, तो उन्हें लगा कि यह किसी बेघर इंसान का लावारिस शव है। यह पेरनेम पुलिस के सब-इंस्पेक्टर आदित्य गाड थे, जिन्होंने इस पूरी कहानी की कड़ियां जोड़ीं और कासारवर्ने के उस 20 वर्ग मीटर वाले घर तक पहुंचे।
टीओआई के अनुसार, एक पड़ोसी ने बताया कि पैर कटने से पहले अशोक एक होटल में छोटे-मोटे काम करता था। यह परिवार हमेशा से झोपड़ी में ही रहा। दस साल पहले, उसके भाई ने, जो खदानों में ट्रक चलाता था, यह पक्का ढांचा बनवाया था। लेकिन कुछ ही समय बाद उसकी मौत हो गई और परिवार वापस गरीबी के दलदल में धंस गया।
चंदे के पैसों से हुआ अंतिम संस्कार
जब पुलिस ने बहनों का पता लगा लिया, तो बिना पोस्टमार्टम के शव उन्हें सौंप दिया गया। सब-इंस्पेक्टर गाड ने बताया कि परिवार बेहद गरीब है और लकड़ियां खरीदने तक का खर्च नहीं उठा सकता था। दूर के रिश्तेदारों ने फिर से पैसे इकट्ठा किए और अशोक का अंतिम संस्कार करने के लिए उन्हें पणजी के सेंट इनेज श्मशान घाट ले गए।
कागजों पर भारत का सबसे अमीर राज्य होने का दावा करने वाले गोवा में अशोक पालयेकर की अंतिम यात्रा के लिए लकड़ियों की खातिर भी चंदे की जरूरत पड़ी। पेरनेम के पुलिस इंस्पेक्टर नितिन हलर्णकर ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। गोवा में ऐसा नहीं होता। सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हर किसी का अधिकार है।
