'पूरी तरह गलत...', चीन से लेकर राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में किताब की प्रति लहराने पर बोले जनरल नरवणे
पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने 'जो उचित समझो, वो करो' बयान पर सफाई दी, कहा कि यह सेना ...और पढ़ें

जनरल नरवणे ने बताया जो उचित समझो वो करो का मतलब (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी अप्रकाशित किताब को लेकर उठे विवाद पर पहली बार खुलकर बात की है। उन्होंने 'जो उचित समझो, वो करो' वाले बयान का मतलब समझाते हुए कहा कि यह सरकार का सेना पर पूरा भरोसा दिखाता है और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि इस बयान का अर्थ था कि सेना को हालात के हिसाब से निर्णय लेने की पूरी छूट दी गई थी। उनके मुताबिक, सरकार को सेना की क्षमता और नेतृत्व पर पूरा विश्वास था कि वे हर पहलू को ध्यान में रखकर सही फैसला लेंगे।
जनरल नरवणे ने यह भी कहा कि सेना पूरी तरह गैर-राजनीतिक संस्था है और इसे राजनीति में नहीं घसीटना चाहिए। उन्होंने पड़ोसी देश पाकिस्तान पर इशारा करते हुए कहा कि वहां सेना अक्सर नागरिक सरकार पर हावी रहती है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है।
क्या है पूरा विवाद?
यह विवाद फरवरी में संसद के बजट सत्र के दौरान शुरू हुआ था, जब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' का जिक्र किया। हालांकि, किताब प्रकाशित नहीं होने के कारण उन्हें स्पीकर ने रोक दिया था।
इसके बावजूद राहुल गांधी ने संसद परिसर में किताब की कॉपी दिखाते हुए दावा किया कि सीमा पर चीन की गतिविधियों की जानकारी देने के बाद भी सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का संदेश 'जो उचित समझो, वो करो' था, जिससे लगा कि जिम्मेदारी नहीं निभाई गई।
यह घटना 31 अगस्त 2020 की बताई जाती है, जब चीन की सेना रेजांग ला इलाके की ओर बढ़ रही थी। किताब का प्रकाशन फिलहाल रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के इंतजार में रुका हुआ है।
किताब और सीमा विवाद पर क्या बोले नरवणे?
जनरल नरवणे ने साफ किया कि उनकी किताब किसी भी गोपनीय दस्तावेज पर आधारित नहीं है, बल्कि यह उनके व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों पर आधारित है। सीमा विवाद पर उन्होंने कहा कि उस समय भारत की स्थिति मजबूत थी और दुनिया ने देखा कि चीन को अपनी कई जगहों पर पीछे हटना पड़ा और उसने खुद अपने निर्माण हटाए।
उन्होंने विपक्ष के उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि भारत ने जमीन गंवाई। नरवणे ने स्पष्ट कहा कि कोई भी क्षेत्र नहीं छोड़ा गया और उस समय सरकार और सेना के बीच पूरा तालमेल था, सभी फैसले मिलकर लिए गए।
