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अगर इंदिरा संजय पर भरोसा न करतीं... क्या जेपी की हुंकार से हिल गई थीं 'आयरन लेडी'? पढ़िए इन्दु का 'डार्क' चैप्टर!

Published: Thu, 25 Jun 2026 12:52 PM (IST)

25 जून 1975 को आखिर ऐसा क्या हुआ कि आयरन लेडी 'डिक्टेटर' बन गईं? पढ़िए ये खास एक्सप्लेनर

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गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। 25 जून 1975…भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वो तारीख, जिसे सुनते ही इमरजेंसी की याद ताजा हो जाती है। उस शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण सत्ता को खुली चुनौती दे रहे थे। उन्होंने मशहूर कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की पंक्तियां दोहराईं- 

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

उधर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े संकट से जूझ रही थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट उनका चुनाव रद कर चुका था, विपक्ष इस्तीफे की मांग पर अड़ा था और सड़कों पर सरकार विरोधी आंदोलन तेज हो चुका था।

फिर उसी रात राष्ट्रपति भवन में एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुए, आधी रात के बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हुईं, अखबारों पर सेंसरशिप लग गई और सुबह जब देश जागा तो बताया गया कि भारत में इमरजेंसी लागू हो चुकी है। 

दैनिक जागरण के आज के एक्सप्लेनर में आप पढ़ेंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि बांग्लादेश युद्ध में जीत दिलाने वाली 'आयरन लेडी' इंदिरा गांधी पर लोकतंत्र को कुचलने के आरोप लगे? इसकी कहानी उस रात से नहीं, बल्कि कई साल पहले शुरू होती है।

साल 1969… इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े संघर्षों में से एक लड़ रही थीं। कांग्रेस पार्टी दो हिस्सों में बंट चुकी थी। पार्टी के पुराने दिग्गज नेताओं को लगता था कि जवाहरलाल नेहरू की बेटी राजनीति में अनुभवहीन हैं। कभी कांग्रेस के भीतर उन्हें ‘गूंगी गुड़िया’ कहकर उपहास का पात्र बनाया गया था।

19 जुलाई 1969… 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। देशभर में संदेश गया कि प्रधानमंत्री बड़े उद्योगपतियों और पुराने सत्ता केंद्रों को चुनौती देने का साहस रखती हैं। 

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इसके बाद रियासतों के पूर्व शासकों को मिलने वाले प्रिवी पर्स खत्म करने की लड़ाई शुरू हुई। 1971 में 26वें संविधान संशोधन के जरिए राजाओं की विशेष सुविधाएं समाप्त कर दी गईं। 

गरीबों और वंचितों के बीच इंदिरा गांधी की छवि मजबूत होने लगी। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा गूंजने लगा।

'आयरन लेडी' कैसे बनी थीं इंदिरा गांधी?

फिर आया 1971 का युद्ध, पाकिस्तान के खिलाफ जीत और बांग्लादेश के बनने के बाद इंदिरा गांधी को देश में युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई पसंद करने लगा। इंदिरा को ‘आयरन लेडी’ की पहचान यहीं से मिली। 

1973 और 1974 आते-आते तस्वीर बदलने लगी। तेल संकट से महंगाई बढ़ी। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा फैलने लगा। गुजरात में एक नया आंदोलन शुरू हुआ। बिहार में स्टूडेंट्स सड़कों पर उतर आए। यहीं से एंट्री होती है जयप्रकाश नारायण की।

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युवाओं के आंदोलन का चेहरा बने जेपी नारायण

जेपी स्वतंत्रता आंदोलन के नायक थे। जब स्टू़डेंट्स ने उनसे नेतृत्व की अपील की तो उन्होंने आंदोलन का चेहरा बनने का फैसला किया। पटना की सभाओं में उन्होंने कहा, ‘यह केवल सरकार बदलने की लड़ाई नहीं है। यह व्यवस्था बदलने की लड़ाई है।’ इस आंदोलन का संपूर्ण क्रांति का नाम दिया गया। अब बिहार से शुरू हुई आवाज पूरे देश में फैलने लगी। 

इसी बीच एक कानूनी मामला धीरे-धीरे राजनीतिक भूकंप बनने जा रहा था। इसके लिए हमें तीन साल पहले 1971 में चलना होगा। इस साल देश में पांचवीं लोकसभा को चुनने के लिए आम चुनाव हुए, जो कि 1 से 10 मार्च के बीच कराए गए। 

लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से भारी मतों से जीत दर्ज की, उनके प्रतिद्वंद्वी थे समाजवादी नेता राजनारायण। राजनारायण ने अपनी हार आसानी से स्वीकार नहीं की।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

उन्होंने चुनाव में धांधली के आरोप लगाए और  इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। आरोप लगे कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया है।

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करीब चार साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने ऐसा फैसला सुनाया, जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। 

अदालत ने माना कि चुनाव अभियान के दौरान सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हुआ था। नतीजतन, इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया गया और उनपर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई।

दिल्ली में सन्नाटा छा गया। प्रधानमंत्री पद पर बने रहना अब कानूनी और राजनीतिक दोनों रूप से मुश्किल हो गया था। कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि इंदिरा गांधी को इस्तीफा दे देना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए। 

Kuldeep Nair

प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘एक ज़िंदगी काफ़ी नहीं’ के पेज नंबर 263 से 271 के बीच लिखते हैं- 

'संजय गांधी उस समय किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। वे चाहते थे कि उनकी मां किसी भी हालत में पीछे न हटें। इंदिरा गांधी अपने बड़े बेटे राजीव गांधी की तुलना में संजय गांधी पर ज्यादा भरोसा करने लगी थीं। वे अक्सर कहा करती थीं, ‘राजीव को राजनीति का क, ख, ग भी नहीं आता।’ इंदिरा गांधी अपने मन की बातें सबसे ज्यादा संजय से साझा करती थीं। इलाहाबाद फैसले के बाद भी संजय लगातार उन्हें समझा रहे थे कि लड़ाई कानूनी नहीं, राजनीतिक है।'

18 जून 1975…  इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अभी छह दिन ही हुए थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग कर रहा था, उधर कांग्रेस में भी सबकुछ स्थिर तो नहीं था। इसके बाद दिल्ली में कांग्रेस सांसदों की बैठक बुलाई गई। दरअसल, ये बैठक बुलाई ही इसलिए गई ताकि इंदिरा गांधी को ये भरोसा दिलाया जा सके कि पार्टी उनके साथ खड़ी है।

'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा'

बैठक में एक के बाद एक नेताओं ने इंदिरा गांधी के समर्थन में भाषण दिए। इसी दौरान कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने ऐसा नारा दिया, जो भारतीय राजनीति के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया… ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’। हालांकि, ये स्लोगन जितना चर्चित हुआ, उतना ही विवादों से भी घिरा रहा।  

Devkant Baruah

24 जून को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को आंशिक राहत दी। वे प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकती थीं।  

25 जून 1975 को आखिर क्या-क्या हुआ था? आइए, उस दिन की घटनाओं को एक-एक कर समझते हैं। 

  • 25 जून 1975 की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल जनसभा हुई। मंच पर जयप्रकाश नारायण खड़े थे। 
  • स्टेज पर जेपी ने रामधारी सिंह दिनकर की कविता की पंक्तियां पढ़ीं, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’, लाखों लोगों की भीड़ गर्जना कर रही थी। कहा जाता है कि इस भाषण ने प्रधानमंत्री आवास में खलबली मचा दी थी।
  • उसी शाम लगभग साढ़े आठ बजे इंदिरा गांधी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के साथ राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलने पहुंचीं। प्रस्ताव था… आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) लागू किया जाए।
  • राष्ट्रपति ने देर रात दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। आधी रात बीतते-बीतते लोकतंत्र का सबसे ‘डार्क चैप्टर’ शुरू हो चुका था। दिल्ली में पुलिस की गाड़ियां निकल चुकी थीं।
  • जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडिस को गिरफ्तार कर लिया गया। यही नहीं हजारों की संख्या में कार्यकर्ताओं को रातोंरात उठा लिया गया।
  • 26 जून की सुबह रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज गूंजी। उन्होंने कहा कि देश में अराजकता और षड्यंत्र की स्थिति पैदा हो गई थी, इसलिए इमरजेंसी आवश्यक थी।

अब अगला निशाना थी प्रेस… दिल्ली के कई अखबारों की बिजली रात में ही काट दी गई। अखबार छप नहीं पाए। समाचारों को सेंसर अधिकारियों की मंजूरी के बिना प्रकाशित करना अपराध बन गया।

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दैनिक जागरण अखबार ने भी इमरजेंसी लगाने के फैसले का विरोध करते हुए अखबार के संपादकीय पेज पर लिखा था,’नया लोकतंत्र? सेंसर लागू…’ और इस कॉलम को खाली छोड़ दिया था। दरअसल, अखबार ने तब भी अपने पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए इंदिरा सरकार के लोकतंत्र को बेड़ियों में जकड़ने के फैसले का खुलकर विरोध किया था। अखबार ने इसी के साथ लोगों से भी शांति बरतने का संदेश जारी किया। 

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इमरजेंसी की कहानी में कुछ ऐसे किरदार भी उभरे, जिन्हें आज भी 1975 का विलेन कहा जाता है...

1. संजय गांधी: बिना किसी संवैधानिक पद के भी सत्ता में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे। नसबंदी अभियान और शहरी पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण वे इमरजेंसी का सबसे चर्चित और विवादित चेहरा बन गए।

2. विद्या चरण शुक्ल: सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल को आज भी इस सेंसरशिप को लेकर एक विलेन के रूप में देखा जाता है। उन्हें इमरजेंसी का ‘सूचना सेनापति’ कहा जाने लगा। कौन सी खबर छपेगी, कौन सी नहीं, इसका अंतिम निर्णय उनके मंत्रालय के पास था। कई विदेशी पत्रकारों की गतिविधियों पर नजर रखी गई।

3. बंसी लाल: हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसी लालl का नाम भी इमरजेंसी के सबसे विवादित चेहरों में शामिल हो गया। उन्हें संजय गांधी का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था और प्रशासनिक सख्ती के कई फैसलों में उनकी भूमिका की चर्चा होती थी। 

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देश में डर का माहौल था। लेकिन जेलों के भीतर एक अलग कहानी लिखी जा रही थी।

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जेपी, आडवाणी, वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव जैसे अनेक नेता या तो जेल में थे या भूमिगत संघर्ष में शामिल थे। बाद में यही लोग भारतीय राजनीति के बड़े चेहरे बने। इमरजेंसी ने नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर दी।

1976 में 42वां संविधान संशोधन लाया गया। इसे अक्सर ‘मिनी संविधान’ कहा जाता है। इससे संसद और केंद्र सरकार की शक्तियां बढ़ीं और न्यायपालिका की भूमिका सीमित करने की कोशिश की गई।

ऐसा लग रहा था कि इंदिरा गांधी की सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। लेकिन जनवरी 1977 में अचानक इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला कर लिया। जनवरी में आम चुनाव का एलान हुआ और आपातकाल को 21 मार्च 1977 को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया था।

जेल से नेता बाहर आने लगे और देशभर में सभाएं शुरू हुईं। फिर मार्च 1977 में परिणाम आते हैं,  इंदिरा गांधी रायबरेली से हार जाती हैं, उधर संजय गांधी भी चुनाव नहीं जीत पाते। जनता दल ने उस समय 295 सीटें जीती थीं, मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। 

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