'सरकार के प्रति ज्यादा झुकाव है', पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जज ने पूर्व CJI चंद्रचूड़ पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ की न्यायिक नियुक्तियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।

पूर्व जज ने पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ के रवैये पर उठाए सवाल (फाइल फोटो)
HighLights
जस्टिस कौल ने चंद्रचूड़ की नियुक्ति शैली पर सवाल उठाए।
सरकार से पूर्व-अनुमोदन लेने की प्रथा पर चिंता व्यक्त की।
कौल की किताब 'विदाउट फियर ऑर फेवर' में खुलासा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी. वाई. चंद्रचूड़ की न्यायिक नियुक्तियों से जुड़ी कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।
पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने आरोप लगाया है कि डी. वाई. चंद्रचूड़ सरकार के प्रति बहुत ज्यादा झुकने वाले थे। उन्होंने कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले ही उम्मीदवारों के बारे में कार्यपालिका (सरकार) से बातचीत करने की प्रथा पर भी चिंता जताई है।
पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ के रवैये पर उठाए सवाल
जस्टिस कौल ने अपनी आने वाली किताब 'विदाउट फियर ऑर फेवर' (बिना डर या पक्षपात के) में, सुप्रीम कोर्ट में छह खाली पदों को भरने के लिए हुई एक कॉलेजियम बैठक का जिक्र किया है।
जस्टिस कौल ने बताया इस बैठक में पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। उनका आरोप है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने आखिरी मौके पर एक छठे उम्मीदवार का नाम सुझाया और इस नियुक्ति पर सरकार की राय लेने के बारे में सोचा।
जस्टिस कौल ने अपनी किताब में लिखा है, 'मुख्य न्यायाधीश मुझे एक अलग कमरे में ले गए और सोचने लगे कि क्या उन्हें सरकार की राय जानने के लिए फोन करना चाहिए।'
कॉलेजियम में नियुक्तियों पर सवाल
जस्टिस कौल ने एक निजी चैनल से अपनी किताब के बारे में बात करते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कॉलेजियम को कार्यपालिका के दबाव का विरोध करना चाहिए।
जस्टिस कौल से जब पूछा गया कि क्या जस्टिस चंद्रचूड़ सरकार को खुश करने की कोशिश कर रहे थे या उनसे पहले से मंजूरी लेना चाहते थे, तो उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि यह सरकार को खुश करने का मामला था। असल में, उन्होंने इन नामों पर मुझसे पहले ही चर्चा कर ली थी।'
जस्टिस कौल ने आगे बताया, 'हम पांच नामों पर सहमत हो गए थे, और मुझे लगा कि कॉलेजियम के बाकी सदस्य भी इन नामों से सहमत होंगे। लेकिन कॉलेजियम की बैठक में जाते समय, आखिरी मौके पर यह (छठा) नाम सामने रखा गया। मैंने कहा कि यह नाम मुझे मंज़ूर नहीं है और आगे भी कभी मंजूर नहीं होगा।'
दिसंबर 2023 में रिटायर हुए जस्टिस कौल ने लिखा है कि कार्यपालिका (सरकार) से निपटने के तरीके को लेकर हुए मतभेदों ने जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ उनके संबंधों में तनाव पैदा कर दिया। जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम में कौल जून 2022 से उनके साथ काम कर रहे थे।
सरकार के प्रति ज्यादा झुकाव
कौल ने अपने संस्मरण में लिखा, 'परामर्श करने और जिसे मैं 'पूर्व-अनुमोदन' (pre-approval) मानता हूं यानी कॉलेजियम में औपचारिक चर्चा होने से पहले ही सरकार की सहमति मांग लेना—इन दोनों बातों में फर्क है।'
कौल ने आगे कहा, 'उनका मानना था कि चीजें हमेशा से ऐसे ही होती आई हैं। लेकिन मेरा यह मानना था कि आप जैसे मुख्य न्यायाधीश, जिनका कार्यकाल दो साल का है और जो अपनी योग्यता और भरोसे के कारण इस स्थिति में हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपके बाद आने वाले मुख्य न्यायाधीशों के लिए इस परंपरा को न अपनाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उनका कार्यकाल और भी छोटा होगा।'
कांग्रेस ने भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को जताई चिंता
कांग्रेस ने रविवार को नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई। पार्टी ने एक आगामी संस्मरण (मेमॉयर) में किए गए खुलासों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान की रक्षा करने वाली इस संस्था को सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से मुक्त रहना चाहिए।
कांग्रेस के संचार विभाग के महासचिव जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट साझा की, जिसमें जस्टिस कौल के संस्मरण 'विदाउट फियर ऑर फेवर' (बिना किसी डर या पक्षपात के) की पांडुलिपि का जिक्र है।
रिपोर्ट के अनुसार, इसमें कहा गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ न्यायिक नियुक्तियों के मामले में सरकार के प्रति कुछ ज्यादा ही नरम थे।
