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Religious Conversion: जबरन मतांतरण राष्ट्र की सुरक्षा और धर्म की स्वतंत्रता को करता है प्रभावित

Religious Conversion 1960 पिछड़ा समुदाय (धार्मिक संरक्षण) विधेयक लाया गया। इसका लक्ष्य किसी अभारतीय धर्म में किसी के मतांतरित होने पर लगाम लगाना था। इस्लाम ईसाई और यहूदी समेत कुछ धर्मों को इस श्रेणी में रखा गया था।

By Jagran NewsEdited By: Sanjay PokhriyalPublished: Mon, 21 Nov 2022 01:05 PM (IST)Updated: Mon, 21 Nov 2022 01:05 PM (IST)
1954 भारतीय मतांतरण (नियमन एवं पंजीकरण) विधेयक लाया गया।

नई दिल्‍ली, जेएनएन। भय, प्रलोभन और अंधविश्वास के माध्यम से किसी को अपनी धार्मिक पहचान बदलने के लिए बाध्य करना देश के लिए बड़ा और गंभीर संकट बनता जा रहा है। इस तरह के मतांतरण के विरुद्ध याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि इस पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार को प्रयास करने होंगे। अनदेखी से स्थिति बिगड़ सकती है। जबरन मतांतरण राष्ट्र की सुरक्षा और धर्म की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

मतांतरण कराने वालों के निशाने पर प्राय: गरीब तबका होता है, जिसकी विवशता और गरीबी का लाभ उठाकर उन्हें धर्म बदलने के लिए बाध्य किया जाता है। संविधान में सभी को अपने मत-मजहब के प्रचार की स्वतंत्रता है, लेकिन इसका अनुचित लाभ उठाया जा रहा है। प्रचार के नाम पर अन्य को बरगलाने की स्वतंत्रता किसी को नहीं दी जा सकती है। कई राज्यों में गरीब आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों को बहकाकर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए विवश करने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, यह कोई छिपा तथ्य नहीं रह गया है। इन पर अंकुश लगाना इसलिए भी अनिवार्य है, क्योंकि किसी देश का सामाजिक ताना-बाना बदलने से वहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियां पैदा होती हैं।

शीर्ष न्यायालय की टिप्पणी में भी इस चिंता को देखा जा सकता है। मतांतरण के माध्यम से समाज के सांस्कृतिक चरित्र को बदलने का प्रयास राष्ट्रघाती है। मतांतरण में लिप्त कुछ संगठनों को चिह्नित कर विदेश से उनके चंदे पाने संबंधी नियमों में केंद्र सरकार ने बदलाव किए हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। मतांतरण मूलत: राष्ट्रांतरण के छिपे एजेंडे पर बढ़ता कदम है। यह देश एवं समाज के लिए आतंकवाद से कम घातक नहीं है। इससे निपटने के लिए भी सरकार को सख्त प्रविधान करने की आवश्यकता होगी।

मतांतरण के खतरे का अनुमान और इस पर रोक के लिए आवाज उठाने का क्रम नया नहीं है। असल में स्वतंत्रता के पहले से ही इस संकट को भांपकर इससे बचने के प्रयास होने लगे थे। अमेरिका की लाइब्रेी आफ कांग्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 1930 के आसपास कुछ रियासतों में जबरन मतांतरण पर लगाम के लिए कानून बनाए जाने लगे थे। इनका उद्देश्य हिंदू आबादी को ब्रिटिश मिशनरियों के प्रभाव में आने से बचाना था। स्वतंत्रता के बाद भी मतांतरण का यह संकट कम नहीं हुआ।

कई राज्यों ने अपने हाथ में ली कमान

2015 में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने कहा कि जबरन मतांतरण पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानून नहीं बनाया जा सकता है। कानून एवं व्यवस्था राज्यों का विषय है, इसलिए राज्य इस संबंध में कानून बना सकते हैं। वैसे केंद्रीय मंत्रालय की इस टिप्पणी के बहुत पहले से राज्यों ने अपने स्तर पर इस संबंध में कानून बनाने प्रारंभ कर दिए थे। सबसे पहले 1967 में ओडिशा इस संबंध में कानून लाने वाला पहला राज्य बन गया था। 1968 में मध्य प्रदेश और 1978 में अरुणाचल प्रदेश ने इस संबंध में कानून बनाया।

कई बार हुआ है राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने का प्रयास

स्वतंत्र भारत में जबरन मतांतरण पर रोक के लिए कई बार कानून लाने का प्रयास हुआ है। हालांकि कोई राष्ट्रव्यापी कानून बनाने में सफलता नहीं मिल पाई।

  • 1954 भारतीय मतांतरण (नियमन एवं पंजीकरण) विधेयक लाया गया।
  • इसमें मिशनरियों के लिए अनिवार्य लाइसेंस और धर्म बदलने की स्थिति में सरकारी कार्यालय में पंजीकरण कराने का प्रविधान किया गया। हालांकि संसद में इस विधेयक को बहुमत का समर्थन नहीं मिल पाया।
  • 1960 पिछड़ा समुदाय (धार्मिक संरक्षण) विधेयक लाया गया। इसका लक्ष्य किसी अभारतीय धर्म में किसी के मतांतरित होने पर लगाम लगाना था। इस्लाम, ईसाई और यहूदी समेत कुछ धर्मों को इस श्रेणी में रखा गया था।
  • 1979 धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक लाया गया। इसमें किसी अन्य धर्म में मतांतरित होने पर आधिकारिक रूप से रोक का प्रविधान किया गया था। इसे भी राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।

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