नई दिल्ली, [रमेश ठाकुर]। धर्मनिरपेक्ष संसदीय व्यवस्था में किसी धार्मिक आयोजन के लिए सब्सिडी मुहैया कराने को उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से हज सब्सिडी खत्म करने के कदम की सराहना करनी होगी। मगर यहां यह भी साफ होना चाहिए कि कभी भी किसी मुस्लिम नेता या विद्वान ने हज सब्सिडी की मांग नहीं की बल्कि यह कार्यक्रम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय शुरू किया गया था। कहा जाता है कि आपातकाल के बाद मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए इंदिरा गांधी ने यह कदम उठाया था। यह लोकप्रिय राजनीति का यह एक उदाहरण भर है।

सरकारें न जाने कितने कदम ऐसे ही उठाती रहती हैं जिसका समाज की बेहतरी से कोई रिश्ता नाता नहीं होता है, लेकिन वोट की खेती लहलहाती रहती है। बेहतर होता कि मुस्लिमों की स्थिति की पड़ताल के लिए गठित आयोगों की सिफारिशों पर ही सरकारें कदम उठातीं। सच्चर आयोग तो मुसलमानों की स्थिति भारत में दलितों से भी बदतर बता चुका है। उचित होता कि अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए हज सब्सिडी की राशि को खर्च किया जाता।

गौरतलब है कि हाल के कुछ वर्षो में हज सब्सिडी को बंद करने के लिए मुस्लिम समुदाय की तरफ से ही मांग उठने लगी थी। बताते चलें कि सरकार सिर्फ मुस्लिम हज यात्रियों के लिए ही सब्सिडी नहीं दे रही थी, लेकिन अक्सर चर्चा के केंद्र में इसी को रखा जाता है जबकि यह भी एक सच्चाई है कि कैलाश मानसरोवर यात्र को केंद्र के अलावा कई राज्य सरकारों की तरफ से मदद मिलती है। कुंभ और अर्ध कुंभ मेलों का आयोजन भी सरकारी मदद से किया जाता है। कई जगहों पर मंदिर के पुजारियों को सरकार की तरफ से वेतन देने की व्यवस्था है। सिख तीर्थ यात्रियों के लिए भी कई जगह सरकारी इंतजाम रहते हैं। मगर सेक्युलर राष्ट्र होने के नाते सरकार को किसी धार्मिक आयोजन को आर्थिक मदद देने से बचना चाहिए और इसके बजाय इस धन का उपयोग शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरी क्षेत्रों में किया जाना चाहिए।

हज सब्सिडी खत्म करने के बाद सरकार को दूसरे धर्मो के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को भी खत्म करने पर विचार करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि हज जाने के लिए हवाई यात्र के नाम पर सब्सिडी बंद होने के बाद आवाज उठ रही है कि सेक्युलर देश में धर्म को सरकारी धन से पोषित नहीं करना चाहिए। केंद्र सरकार को हज सब्सिडी की तरह दूसरे धर्मो के धर्मात के नाम पर बंदरबांट होने वाले सरकारी खजाने पर तुरंत रोक लगा देनी चाहिए। अनुमान के तौर पर धार्मिक सब्सिडी पर प्रत्येक वर्ष पच्चीस हजार करोड़ रुपये खर्च होता है। अगर उस राशि का प्रयोग विकास के विभिन्नि क्षेत्रों में किया जाए तो उसकी तस्वीर अलहदा होगी। केंद्र सरकार को धीरे धीरे उस दिशा में बढ़ना चाहिए जहां वह धार्मिक आयोजनों, तीर्थयात्रओं और पुजारियों के लिए धन खर्च करना पड़ता है। धार्मिक आयोजनों पर होने वाले खर्च की दिशा को बदल कर सामाजिक विकास की तरफ किया जाना चाहिए। इससे समाज के प्रगति की रफ्तार भी तेज होगी और देश के नागरिक तमाम धार्मिक अंधविश्वासों से उबर भी सकेंगे।

एक सेक्युलर और प्रगतिशील राज्य को चाहिए कि उन मूल्यों और उपायों को बढ़ावा दिया जाए जिससे नागरिकों में वैज्ञानिक विचारों का जन्म हो। इसके लिए धार्मिक रुझानों को कम करना होगा और धर्म संबंधी प्रयोजनों में खर्च होने वाले धन को शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए खर्च किया जाना चाहिए। इसलिए सर्वधर्म का एक सामान उदाहरण पेशकर केंद्र सरकार को ऐसी फिजूल खर्ची वाली राशि पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इसलिए ऐसा कोई एक तरफा फैसला नहीं किया जाना चाहिए जिससे धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े हों।

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Posted By: Abhishek Pratap Singh

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