अरुण तिवारी। जल ऊर्जा का अनन्य स्नोत है। ऊर्जा के बगैर शरीर जीवित नहीं रह जाता। तापमान चाहे जीव का हो या शेष जग का, उनके नियमन में जल में मौजूद ऊर्जा तत्व की भूमिका अद्वितीय है। सूर्य, आकाश, मेघ, विद्युत, नदियां, पहाड़, वनस्पतियां... शरीर को ऊर्जा देने वाले अन्य स्नोत भी जल से ही प्रकट हुए हैं। नमी न हो तो प्राणवायु भी प्राणदायी न होकर, मारक हो जाए। हमारी तैरती हुई पृथ्वी भी जल के ऊपर ही स्थापित है। जीवन के उद्भव, जीव के पोषण और शरीर के शुद्धिकरण में जल की मुख्य भूमिका है ही। दुनिया में कोई वस्तु ऐसी नहीं, जिसका उत्पादन जल के बगैर संभव हो। इसी नाते जल को इंसान और इंसानी सभ्यता ही नहीं, समस्त रचनाओं का प्राणाधार कहा जाता है।

ऐसे प्राणाधार को समृद्ध रखने की गारंटी हर हाल में जरूरी है। सभी को शुद्ध जल की सिर्फ हकदारी जताने भर से यह संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों को खुद की जवाबदारी सुनिश्चित करनी होगी। यह व्यैक्तिक तथा सामुदायिक आत्म-प्रेरणा व आत्मानुशासन से ही संभव है। अदालती निर्देश व सरकारें इसमें सिर्फ सहयोगी हो सकते हैं। उनसे इससे अधिक अपेक्षा करना, खुद को पानी परजीवी बनाने की दिशा में ले जाना है। प्रत्येक सार्वजनिक कार्य के लिए सरकार की ओर ताकने की बढ़ती जन-प्रवृत्ति ने भारतीय जल प्रबंधन को बाजारू बहेलियों के जाल में फांस दिया है। जल-स्नोतों का बढ़ता शोषण-प्रदूषण, बढ़ता जल-बजट और जन-जरूरत के लिए ज्यादा ढीली होती हमारी जेबें इसी के दुष्परिणाम हैं।

सहकारी से ही सद्भाव, सहकार और सहअस्तित्व संभव होता है। सहकारी जल प्रबंधन ने जल संरक्षण..संवर्धन गतिविधियों को परंपरा बनाया। शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए जल को उपभोग की भौतिक वस्तु मात्र मानने की बजाय, सांस्कृतिक तत्व के रूप में प्रतिष्ठित किया। कुआं-ताल कहां बनायें; कहां न बनायें ? झाड़, झुकाव, जीव, भूमि के रंग, आवा? आदि के विश्लेषण से निर्जल प्रदेश में भी भूमिगत जल की उपस्थिति व स्थिति की पहचान करने का सरल, लेकिन अद्भुत ज्ञानतंत्र विकसित किया। ऐसे ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कथा, कल्पवास जैसे अवसर बनाये; ताकि आभासी होड़ा-होड़ी के युग में भी हम हकीकत भूलें नहीं। हम याद रख सकें कि जब-जब इस समयसिद्ध ज्ञानतंत्र की उपेक्षा की गई, तब-तब अकाल दुष्काल साबित हुआ; समृद्धि लाने वाली बाढ़ विनाशक बनी; बावजूद इसके हम यही कर रहे हैं। क्या हम यह करें ?

पारंपरिक सभ्यताओं ने प्यासे को कुएं के पास जाने की सीख दी। वहां खेती की, जहां जल था। वहां नगर बसाये, जहां नदी थी। राजस्व कमाने के लालच में कभी ब्रितानी हुकूमत ने नहर, नल और सीवेज पाइपों को हमारी ड्योढ़ी तक पहुंचाया। आज हमारी सरकारें भी वही कर रही हैं। इस उपक्रम में नदियों का गला बांधने से भी परहेज नहीं कर रही। पत्थर व रेत के अनियंत्रित खनन और भूजल-भंडारों के अनियंत्रित दोहन को देख को आप क्या कहेंगे ?

तनिक विरोधाभास देखिए। एक ओर सुप्रीम कोर्ट सख्त है कि लगातार घटते प्रवाह और बढ़ते प्रदूषण ने यमुना में अमोनिया बढ़ा दी है; उत्तर प्रदेश के स्कूली पाठ्यक्रम गंगा संरक्षण पढ़ाने की अच्छी शासकीय कवायद है; वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और नोएडा प्राधिकरण मिलकर पुश्तों को प्रवाह की ओर सरका कर हिंडन व यमुना नदियों को मारने की योजना पर काम कर रहे हैं।

नदी के हिस्से की जमीन बेचकर कुछ राजस्व कमा लेने का यह लालच, सबसे पहले नोएडा इलाके को ही बेपानी करेगा। यह आत्मनिर्भर भारत के नारे के विपरीत कदम है। ऐसे उलट कदमों को रोकें। पानी के मामले में आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री जी द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में किए ‘वोकल फॉर लोकल’ के आह्वान को हम पानी प्रबंधन क्षेत्र में भी लागू करें। स्थानीय जल प्रबंधन सरकारी नहीं, सहकारी हो। स्थानीय समुदाय पहल करें; जिम्मेदारी लें। सरकारें वैधानिक-प्रशासनिक बाधाएं हटाएं। सहयोगी बनें। मार्ग प्रशस्त करें।

पेयजल ही नहीं, स्थानीय जल-प्रबंधन की समग्र, स्वावलंबी व समयबद्ध कार्ययोजना बनाने तथा उसे क्रियान्वित करने का संपूर्ण दायित्व व र्आिथक-तकनीकी-प्रशासनिक अधिकार संबंधित जल संबंधी स्थानीय वार्ड समितियों को सौंप दें। उनकी जल-संरचनाओं के स्थान का चयन, डिजायन, निर्माण सामग्री तथा प्रक्रिया उन्हें स्वयं तय करने दें। उन्हें तय करने दें कि वे नल से आया पानी पीना चाहते हैं अथवा कुएं, हैंडपंप या तालाब से लाया हुआ। आत्मनिर्भरता चाहे जल के मामले में हो अथवा पढ़ाई, दवाई, कमाई, खेती और औद्योगिक उत्पादन के मामले में सहकार से ही संभव होगी। अनुभव यही है।... तो आइए, यही करें।

(लेखक जल विशेषज्ञ हैं)

Edited By: Kamal Verma