जागरण इनवेस्टीगेशन ब्यूरो, नई दिल्ली। जहरीली शराब कांड में अब तक हरिद्वार (उत्तराखंड) व सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) के करीब 25 गांवों में 129 मौतें हो चुकी हैं, सौ से अधिक बीमार हैं। प्रभावित गांवों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। हरिद्वार के बाल्लूपुर में पहुंचे आइजी अजय रौतेला के सामने ग्रामीणों ने खुलेआम कहा, साहब! पुलिस और आबकारी विभाग को गांव से दो लाख रुपये हर माह जाता था, तब आप कहां थे..। दैनिक जागरण की टीम के सामने पूछे गए लोगों के इस सवाल का आइजी के पास माकूल जवाब न था।

जांच के लिए गांवों में पहुंच रहे अधिकारियों को लोग जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। पीडि़त परिवारों का आरोप है कि साजिश के तहत मासूमों को शराब की लत लगाई गई। उधार पर शराब पिलाई जाती और सूद समेत वसूली होती। शिकायत की हिम्मत कौन जुटाता। पता था कि जहर के सौदागरों को पुलिस और प्रशासन का संरक्षण है।

मौन रहने वाले ग्रामीणों का फूट रहा गुस्सा
जागरण टीम के सामने बाल्लूपुरवासियों ने पुलिस और प्रशासन की पोल खोल कर रख दी। बताया कि यहां सुबह से ही ऐसे शराब बिकने लगती थी, मानो कोई हाट-बाजार लगा हो। देर रात तक यह सिलसिला जारी रहता था। लोगों ने जांच अधिकारियों के सामने अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा- हम में से यदि किसी ने साहस कर माफिया के विरुद्ध सूचना भी दी तो सूचना ही लीक कर दी जाती। दबिश डालने से पहले खुद छापा टीम गांव के बाहर से हूटर बजाते आती ताकि कोई सुबूत न मिले। यही कारण है कि माफिया आज तक गिरफ्तार नहीं हुआ। उलटे सूचना देने वालों पर ही आफत टूट पड़ी। किसी पर अनुसूचित जाति उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज हुआ तो किसी पर छेड़छाड़ का। यहां तक कि आवाज उठाने वालों पर गोली भी चलाई गई। सो, सूचना देने वालों ने भी खामोश रहने में ही भलाई समझी..।

करोड़पति बन बैठे भट्ठी चलाने वाले 
हरिद्वार जिले में अवैध शराब की सबसे बड़ी मंडी बाल्लूपुर गांव ही है। इसी गांव से शराब आसपास के गांवों में बेची जाती है। पुंडेन गांव का पिंटू हो या फिर बाल्लूपुर के फकीरा-सोनू, सभी की इलाके में इस कदर पैठ बन चुकी थी कि उन्होंने 50 से अधिक एजेंट तैयार कर लिए थे, जो गांव-गांव जाकर अवैध शराब बेचते थे। शुरू में कई लोगों ने पुलिस और आबकारी विभाग को सूचना दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, ऊपर से वे माफिया के लिए दुश्मन बन बैठे। अवैध शराब का धंधा करने वालों की लगातार तरक्की होती रही। उन्होंने कोठियां और महंगी कारें जुटा लीं और बड़ी-बड़ी जमीनों के मालिक बन बैठे।

नीचे से ऊपर तक सेटिंग
बाल्लूपुर गांव की एक हजार की आबादी में से 40 परिवार इस धंधे से जुड़े हैं। यहां रोजाना शराब का दो से ढाई लाख का कारोबार होता था। हर माह दो से तीन लाख रुपये आबकारी विभाग व पुलिस महकमे तक पहुंचते थे। बीट कांस्टेबल से लेकर ऊपर तक के अधिकारियों को साध लिया जाता था। यही वजह रही कि इस धंधे से जुड़े किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आज तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

भट्ठी वाले जिताते चुनाव
चुनाव में शराब का इस्तेमाल खूब होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। जितना छोटा चुनाव, शराब की उतनी ही ज्यादा खपत। सूत्रों की मानें तो कई गांवों में शराब माफिया इस हैसियत में हैं कि ग्राम प्रधान से लेकर क्षेत्र और जिला पंचायत सदस्य तक का चुनाव उनके मनमुताबिक होता है। हालांकि, ग्राम पंचायत बिंडू खड़क के प्रधान शिवकुमार पुलिस और आबकारी विभाग पर सीधा आरोप लगाते हैं। उनका आरोप है कि इन विभागों ने पूर्व में की गई शिकायतों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसी की परिणति है कि हर तरफ चीत्कार और सिसकियां सुनाई दे रही हैं।

सहारनपुर और हरिद्वार में तैनात रहे सेवानिवृत्त पुलिस क्षेत्राधिकारी कुलदीप असवाल की मानें तो इसके लिए पूरी तरह से सिस्टम दोषी है। कांस्टेबल से लेकर बीट दारोगा और इंस्पेक्टर से लेकर उच्च अधिकारी तक। कच्ची शराब पर लगाम इनकी प्राथमिकता में नहीं। चुनाव के वक्त जरूर दो-चार बोतल पकड़कर चालान काट दिया जाता है। जब तक आरोपित की मुकदमे से संबंधित फर्द तैयार होती है, तब तक उसकी जमानत भी हो जाती है। कच्ची शराब की बिक्री पर इंस्पेक्टर और आबकारी अधिकारी की जवाबदेही तय कर देनी चाहिए। यदि कोई ईमानदार इंस्पेक्टर आता है और महीना लेना बंद कर देता है तो इस गोरखधंधे पर 80 फीसद तक अंकुश लग जाता है। लेकिन, सिस्टम का हाल यह है कि जब वह मुहिम को अंजाम तक पहुंचाता है, तबादला के ऑर्डर उसके हाथ में होता है।

हमारा नेटवर्क कमजोर है : आइजी
बाल्लूपुर समेत आसपास के गांवों में हो रही शराब की बिक्री दर्शाती है कि पुलिस का नेटवर्क बेहद कमजोर है। लोगों में पुलिस के प्रति विश्वास नहीं रहा है। लिहाजा उन्होंने खामोशी ओढ़ ली है। अब इन गांवों में बैठकें कर पुलिस के प्रति विश्वास जगाया जाएगा। साथ में खुफिया तंत्र को भी मजबूत किया जाएगा। ग्राम पंचायत विकास अधिकारी, लेखपाल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम और सरकारी शिक्षकों से अपील की जाएगी कि वह इस तरह की गतिविधियों पर नजर रखें। सूचना देने के लिए विशेष नंबर भी दिए जाएंगे। सूचना देने वालों के नाम पूरी तरह गुप्त रखे जाएंगे।

-अजय रौतेला, पुलिस महानिदेशक गढ़वाल परिक्षेत्र

हमारा भी नेटवर्क बहुत कमजोर है..

यह प्रकरण कहीं न कहीं आबकारी विभाग की चूक का नतीजा है। या तो विभाग को सूचना नहीं मिली या फिर वह लोगों में विश्वास नहीं जमा पाया। यदि आबकारी विभाग के अधिकारी गांव में जाकर बैठक करेंगे और लोगों से जानकारी लेंगे तो सूचना जरूर मिलेगी।

-बीएस चौहान, संयुक्त आबकारी आयुक्त, हरिद्वार

हमें पता ही नहीं चला..

हम शराब के खिलाफ हैं। हमें इस बात की जानकारी नहीं हो पाई कि इस इलाके (बाल्लूपुर) में इतने बड़े पैमाने पर जहरीली शराब का धंधा हो रहा है। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के बाद इन गांवों में जागरूकता गोष्ठी आयोजित कर लोगों से संवाद करेंगे। लोगों को बताएंगे कि शराब ने कैसे अनेक घरों को उजाड़ दिया।

-ममता राकेश, स्थानीय विधायक, बाल्लूपुर

कुशीनगर में भी चलता रहा खुला खेल
गोरखपुर, उप्र के कुशीनगर इलाके के पडरौना में दो दशक पहले भी जहरीली शराब से 33 मौतें हुई थीं। इस माह फिर कच्ची शराब से यहां हुई दस मौतों से पूरा क्षेत्र दुखी है। लोगों ने बताया कि गांव के हर चौक चौराहों पर धड़ल्ले से कच्ची शराब की दुकानें चलती रहीं पर किसी ने लगाम नहीं लगाई। अब छापे पड़े तो अनेक दुकानें और मौत का सामान बनाने वाली धधकती भट्ठियां पकड़ी गईं। ग्राम जवहीं दयाल चयनपट्टी निवासी डेबा (55) ने गांव में ही कच्ची शराब की दुकान से शराब पी थी और जान गंवाई। इसके बाद मौतों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर मरने वालों की संख्या 10 तक जा पहुंच गई, बीमारों की संख्या 15 तक। अब जब छापेमारी हुई तो माफिया और सरकारी विभागों का गठजोड़ खुद खुलकर सामने आ गया। उप्र-बिहार की सीमा पर बसे इस जिले में हर सप्ताह पंजाब, हरियाणा निर्मित अवैध शराब की बड़ी खेप मिलती रही तो जहरीली शराब को बनाने वाला स्पि्रट का जखीरा भी। इसकी बरामदगी कर खानापूरी भर की गई। कभी इसके पीछे चलने वाले मौत के खेल को रोकने का प्रयास ही नहीं किया गया, क्योंकि मौत के सामान के इस कारोबार में कई जिम्मेदारों के हित भी जुड़े हुए थे।

गांव में ही मौत का सामान बिक रहा था, जिसे सभी मरने वालों ने पीया, जिसमें मेरा बेटा (डेबा) भी था। खाकी हो या फिर विभागीय जिम्मेदार, चाहे आला अफसरान, सबकी जेब भर रही थी, हमारा घर उजड़े तो उजड़े, उनको क्या फर्क पड़ता है साहब..।

-बिशुन, मृतक डेबा के पिता, कुशीनगर, उप्र

Posted By: Ravindra Pratap Sing