नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। अफगानिस्तान शांति वार्ता के टूट जाने के बाद वहां पर शांति के प्रयासों को जोरदार झटका लगा है। वार्ता के खत्‍म होने के बाद एक बार फिर अफगानिस्‍तान वहीं पहुंच गया है जहां वह वार्ता की शुरुआत से पहले था। आने वाले दिनों में इसका व्‍यापक असर पूरी दुनिया में खासकर अफगानिस्‍तान के पड़ोसी मुल्‍कों में देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि भारत को बदलते माहौल में काफी चौकन्‍ना रहने की जरूरत होगी। अफगानिस्तान में होने वाला बदलाव सीधे तौर पर भारत के हितों को प्रभावित करता है इसलिए विदेश मंत्रालय के अधिकारी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए हैं।

राष्‍ट्रपति चुनाव नजदीक
यह ऐसे समय में हुआ है जब अफगानिस्‍तान में 28 सितंबर को राष्‍ट्रपति का चुनाव होना है। वहीं, इस फैसले के बाद अफगानिस्‍तान में मौजूद अमेरिकी और नाटो सेना को भी अब ज्‍यादा ए‍हतियात बरतनी होगी। ऐसा इसलिए है, क्‍योंकि तालिबान ने वार्ता के टूटने के बाद अमेरिका को धमकी दी है कि वह अब ज्‍यादा से ज्‍यादा अमेरिकियों को अपना निशाना बनाएंगे। लिहाजा तालिबान का मकसद बेहद साफ है कि या तो अफगानिस्‍तान में उसकी सरकार बनने के लिए अमेरिका राजी हो नहीं तो अंजाम बुरा होगा। 

ट्रंप के लिए दोहरा झटका
अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के लिए यह दोहरा झटका है। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि इस वार्ता के खत्‍म होने से अमेरिकी फौज की वापसी पर फिर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ अमेरिका में राष्‍ट्रपति चुनाव होने हैं, जिसमें शांतिवार्ता की सफलता और अमेरिकी सेना की वापसी डोनाल्‍ड ट्रंप के लिए बड़ा मुद्दा साबित हो सकता था। भारत की जहां तक बात है तो आपको बता दें कि कुछ ही समय पहले अमेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप ने भारत से अपील की थी कि वह अफगानिस्‍तान में मजबूत भूमिका अदा करे।

पाकिस्‍तान की जमीन पर फला-फूला है तालिबान
भारत की चिंता की बात करें तो आपको बता दें कि तालिबान पाकिस्‍तान की धरती पर जन्‍मा और फला-फूला है। तालिबान को जिंदा रखकर पाकिस्‍तान अपने निजी हितों को साधता रहा है। आतंकवाद के नाम पर अमेरिका से मिली वित्तीय मदद इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। वहीं, दूसरी तरफ भारत हमेशा से ही पाकिस्‍तान के निशाने पर रहा है। पाकिस्‍तान वर्षों से भारत में आतंकियों की घुसपैठ और हमला करवाता रहा है। तालिबान की तरफ से न सिर्फ अमेरिका, बल्कि भारत को भी निशाना बनाने की बात कही जाती रही है। वहीं, तालिबान  और पाकिस्‍तान दोनों ने अमेरिका के सबसे बड़े दुश्‍मन ओसामा बिन लादेन को अपने पास सुरक्षित शरण दी थी। जहां तक अन्‍य देशों की बात है तो यह जगजाहिर है कि पूरा विश्‍व इस बात को मानता है कि तालिबान, अलकायदा और आईएस के खात्‍मे के बिना अफगानिस्‍तान में शांति बहाली नहीं हो सकती है। वहीं, तालिबान अफगानिस्‍तान में अपनी सरकार दोबारा कायम करना चाहता है और ये भी चाहता है कि दुनिया उसको मान्‍यता दे। इस पर न तो अमे‍रिका ही राजी हो सकता है और न ही विश्‍व बिरादरी। 

पाकिस्‍तान पर भी होगा असर
इस वार्ता के टूटने का व्‍यापक असर पाकिस्‍तान पर भी देखने को मिलेगा। ऐसा इसलिए, क्‍योंकि अफगान शांति वार्ता में पाकिस्‍तान एक अहम भूमिका निभा रहा था। इतना ही नहींं, पाकिस्‍‍‍‍‍तान कई मंचों से इस बात को कह चुका था कि उसको मिली इस बड़ी भूमिका की वजह उसका जिम्‍मेदार मुल्‍क होना ही है। वहीं, दूसरी तरफ तालिबान भी पाकिस्‍तान पर अफगानिस्‍तान सरकार से ज्‍यादा भरोसा करता है। इसकी भी एक वजह है। दरअसल, 90 के दशक में अफगानिस्‍तान की तालिबान सरकार को मान्‍यता देने वालों में पाकिस्‍तान भी शामिल था। वार्ता से पहले ही तालिबान ने इस वार्ता में अफगान सरकार की सहभागिता को नकार कर पाकिस्‍तान को इसमें शामिल करने की बात कही थी। यही वजह थी कि इसकी वार्ता की शुरुआत से लेकर अंत तक इसमें अफगान सरकार का कोई नुमांइदा शामिल नहीं था। यही वजह है कि वार्ता के रद होने का असर यहां पर भी जरूर दिखाई देगा। 

जून 2011 में हुई थी शुरुआत
गौरतलब है कि अफगान शांति वार्ता की शुरुआत जून 2011 में शुरू हुई थी। लेकिन यह वार्ता पहले ही चरण में विफल हो गई थी। इसके बाद 2012 और 2013 में में हुई वार्ता का भी यही हाल हुआ था। इसके बाद जनवरी और फिर अक्‍टूबर 2016 में पाकिस्‍तान ने शांति वार्ता आयोजित की जिसमें अफगानिस्‍तान, चीन और अमे‍रिका तो शामिल हुए, लेकिन तालिबान का कोई नुमाइंदा शामिल नहीं हुआ। इस वार्ता के चार चरण हुए थे, लेकिन ये कामयाब नहीं हो सकी। 

2018 में अफगानिस्‍तान का बड़ा फैसला 
2018 में अफगानिस्‍तान की निर्वाचित सरकार के मुखिया और राष्‍ट्रपति अशरफ गनी ने बड़ा फैसला लेते हुए तालिबान को एक राजनीतिक पार्टी की मान्‍यता देते हुए तालिबान के जेल में बंद लड़ाकों को रिहा करने का फैसला लिया। बिना शर्त शांतिवार्ता  मकसद था कि वह वार्ता के लिए राजी हों और देश में शांति बहाल हो सके। इस दौरान करीब चार बार वार्ता या तो हुई या फिर इसके प्रयास किए गए, लेकिन इसमें भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका। इस वर्ष फरवरी में शुरू हुई इस शांतिवार्ता में कुछ तरक्‍की जरूर देखने को मिली थी। इसी दौरान अफगानिस्‍तान के पूर्व राष्‍ट्रपति हामिद करजई इस शांतिवार्ता का हिस्‍सा बने थे, लेकिन अफगान सरकार को इसमें शामिल नहीं किया गया। मॉस्‍को में हुई यह वार्ता महज दोबारा मेज पर बैठने को लेकर लिए गए फैसले तक ही सीमित रही थी। इस वर्ष सात बार इस शांतिवार्ता के कई चरण हुए, लेकिन सभी बेनतीजा रहे।  

तालिबान का अडि़यल रवैया
शांतिवार्ता के खत्‍म होने की सबसे बड़ी वजह तालिबान का अडि़यल रवैया रही। तालिबान की शर्त है कि चुनाव रद होने पर ही वह अमेरिका के साथ समझौता करेगा। इसके अलावा शांतिवार्ता के दौरान भी तालिबान के हमले पूरी तरह से बंद नहीं हुए। जहां तक अमेरिका के वार्ता रद करने का सवाल है तो अफगानिस्‍तान की सरकार ने इसका पूरा समर्थन किया है। सरकार के मुताबिक, तालिबान और अमेरिका के समझौते का मसौदा अफगानिस्तान में शांति की गारंटी नहीं देता। वहींं, अमेरिका द्वारा इस वार्ता को स्‍थागित करने की वजह वो काबुल हमला है जिसमें 11 अमेरिकी जवानों की मौत हो गई थी। यह वार्ता कैंप डेविड में होनी थी। आपको बता दें कि शांतिवार्ता के समझौते को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो पहले ही अपनी नाराजगी जता चुके थे। 

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Posted By: Kamal Verma

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