छह महीने का समय मिलता तो टल जाता SIR विवाद, दावों-आपत्तियों के निपटारे पर देना होगा जोर
एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों के तीव्र विरोध के बावजूद यह संवैधानिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी वैध ठहराया है।
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों का तीव्र विरोध चल रहा है। इसे खारिज करने की मांग की जा रही है जो संभव नहीं है क्योंकि एसआईआर संवैधानिक भी है और इसका इतिहास भी है। देश में पहले भी 1951 अब तक आठ बार एसआईआर हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट भी लगभग एक साल तक चली सुनवाई के बाद यह स्पष्ट कर चुका है कि एसआईआर वैधानिक है और चुनाव आयोग को इसे कराने का पूरा अधिकार है।
पर इस सबके बावजूद जिस तरह का विवाद उभरा है उससे एक बात स्पष्ट है कि अगर शुरू से ही आयोग इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ा और वक्त देता और अधिकारी संयम रखते तो यह स्थिति ही नहीं खड़ी होती।
SIR संवैधानिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है
इस पूरी प्रक्रिया को तीन महीने के अंदर खत्म करने के शेड्यूल की बजाय छह सात महीने भी किया जाता तो चुनाव आयोग पर संभवत: कोई आंच ही नही आती और एक संवैधानिक प्रक्रिया को राजनीतिक दल सड़कों पर न घसीट पाते।
विपक्ष की ओर से कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं जो बहुत तार्किक नहीं हैं। लेकिन यह सवाल लाजिमी है कि ऐसे हर मतदाता को जिन्हें किसी न किसी कारण से ड्राफ्ट और अंतिम सूची से बाहर रखा गया है, उसे अपनी पहचान स्थापित करने के लिए पूरा वक्त मिल रहा है या नहीं।
कोई अपना पता बदलना चाहता है तो उसे पूरी सुविधा के साथ यह करने दिया जा रहा है या कोई कर्मचारी बाधा बना बैठा है। ऐसा तो नहीं कि किसी तकनीकी अड़चन का शिकार कोई मतदाता बन रहा है।
13 करोड़ के आंकड़ें में कितनी सच्चाई?
13 करोड़ का जो आंकड़ा विपक्षी दलो की ओर से दिया जा रहा है वह तर्कसंगत नहीं है क्योंकि दो दशक के बाद एसआईआर हो रहा है और इस बीच लगभग तीन करोड़ लोग तो मृत हो चुके हैं।
कई एक स्थान से पलायन कर चुके है। करोड़ों के नाम दो तीन स्थानों पर हैं। लेकिन माना जा रहा है कि इस सबके बावजूद लगभग ढ़ाई से तीन करोड़ लोगों के नाम किसी न किसी प्रक्रिया में उलझे हैं।
पश्चिम बंगाल में इसकी बड़ी संख्या है। चुनाव के आखिरी समय में ट्रिब्यूनल बनाकर इसे निपटाने की कोशिश हुई थी लेकिन वह पूरा नहीं हो सका।
SIR के लिए छह महीने का समय होना चाहिए
ऐसे में कई विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर के लिए तीन की बजाय छह महीने का समय नियत किया जाना चाहिए। उसमें भी सबसे अधिक समय लगभग तीन महीना केवल विवाद निपटारा के लिए होना चाहिए और उस दौरान ऐसे सक्षम अधिकारियों को पूरी तरह इस काम में लगना चाहिए जो फैसला ले सकें।
ऐसा नहीं है कि राज्यों की ओर से आग्रह के बाद समय नहीं बढ़ा हो। पश्चिम बंगाल में ही प्रक्रिया में तीन बार विस्तार कर लगभग 15 दिन का समय बढ़ाया गया था। उत्तर प्रदेश में भी चार बार विस्तार किया गया और लगभग एक महीने का समय बढ़ाया गया था। लेकिन उसके बीच कुछ विवाद उपजे और राजनीतिक दलों को चारा मिल गया।
मतदाता पहचान के लिए पर्याप्त समय जरूरी
गौरतलब है कि तीन महीने के वक्त में पहले महीने घर घर जाकर फार्म बांटा जाता है और उसके बाद एक ड्राफ्ट लिस्ट जारी की जाती है। उसमें जो नाम बाहर हो जाते हैं उसके दावे के लिए एक महीने का वक्त होता है। उसके अगले महीने अंतिम सूची जारी की जाती है।
इस दावे के समय को ही लंबा करने की जरूरत मानी जा रही है। इसके साथ ही विश्लेषक एसआईआर शुरू करने से पहले चुनाव आयोग की ओर से सभी राजनीतिक दलों को हर बूथ पर अपना एजेंट नियुक्त करने की भी अपील करे तो और पारदर्शी होगा। दरअसल अधिकतर राजनीतिक दल बूथ पर अपना एजेंट ही नियुक्त नहीं करते हैं और उसके बाद आरोप की झड़ी लगती है।
