नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। हम सभी अपनी आने वाली पीढ़ियों की चिंता करते हैं। सभी आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत छोड़कर जाना चाहते हैं। हमारी आने वाली पीढ़ियों को कोई दिक्कत न हो इसके लिए हम हर संभव कोशिश करते हैं। उनके लिए जितना हो सके उतना जुटाने की कोशिश करते हैं। हममे से बहुत से लोग आने वाली पीढ़ियों के लिए काफी कुछ जुटाने में सफल भी रहते हैं।

लेकिन धरती का क्या?

जी हां! आज यह प्रश्न अपने आप से जरूर पूछें। 

क्या आप अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए वैसी ही धरती, वैसा ही पर्यावरण संतुलन छोड़कर जाएंगे, जैसा आपको मिला था। यकीनन जवाब नहीं में आएगा। अगर आपका जवाब भी नहीं में है तो अब जाग जाएं। क्योंकि आज कोई कदम नहीं उठाया तो हमारी आने वाली पीढ़ियां वो बहुत कुछ नहीं देख पाएंगी, जो आज हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं या थे।

आज वर्ल्ड अर्थडे पर अपनी धरती मां के लिए कुछ करने का संकल्प लें। पर्यावरण को बचाने की ठानें। नदी-नालों को प्रदूषण से बचाने की कसम खाएं। ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौंधे लगाने की सोचें और अन्य लोगों को भी प्रेरित करें।

अर्थडे क्या और क्यों...?

अर्थडे मनाने का कॉन्सेप्ट उस समय का है जब अमेरिका और यूएसएसआर के बीच शीत युद्ध चरम पर था और दोनों जगह एटमी परीक्षण करने की होड़ लगी हुई थी। यह वह दौर था जब दुनियाभर में औद्योगिक क्रांति हो रही थी और प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा था। ऐसे में कुछ लोगों को धरती को इस सबसे बचाने की सुध आयी और उन्होंने जागरुकता फैलाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह मुहिम वर्ल्ड अर्थ-डे के रूप में उभरी। हर साल 22 अप्रैल को दुनियाभर में अर्थ-डे मनाया जाता है। इस मौके पर पर्यावरण सुरक्षा के संबंध में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। 1970 में पहली बार अर्थडे मनाया गया था। 

बर्बादी के मुहाने पर धरती

अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच विवाद लगातार बढ़ रहा है। उत्तर कोरिया परमाणु हथियार बनाने की अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं है। वह बार-बार अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर परमाणु हमले की धमकी भी दे रहा है। उधर अमेरिका भी उत्तर कोरिया के खिलाफ परमाणु हथियार के इस्तेमाल की बात करने से नहीं चूक रहा। अगर यह युद्ध हुआ तो हमारी प्यारी धरती और मानव जाति के लिए काफी नुकसानदायक होगा।

सबसे घातक जल प्रदूषण

भारत में जल प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या है। इस प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में से एक सीवर है, जिसके पानी को साफ किए बिना ही नदियों में बहा दिया जाता है। उनमें घरों से निकलने वाले मल-मूत्र से लेकर फैक्टरियों से निकलने वाले खतरनाक जैविक पदार्थ तक बहा दिए जाते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में 80 फीसद जल स्रोत खतरनाक तरीके से प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। जल प्रदूषण के कारण हैजा, टीबी, दस्त, पीलिया, डायरिया जैसी कई घातक बीमारियां हो सकती हैं। एक शोध के अनुसार भारत में होने वाली 80 फीसद पेट की बीमारियां गंदे पानी के कारण ही होती हैं।

पल-पल दम घोंट रहा वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण दुनियाभर के अन्य देशों की तरह ही भारत में भी खतरनाक होता जा रहा है। लकड़ी का ईंधन, जैव ईंधन, ईंधन में मिलावट, वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुंआ और फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाला खतरनाक धुंआ इसके प्रमुख कारणों में से हैं। भारत में तो पतझड़ और फसल कटने के मौसम में खूंटियों के जलाने के कारण भी जबरदस्त प्रदूषण फैलता है, जिसके कारण आसपास से शहरों में स्मॉग की परत छा जाती है। बता दें कि चीन और अमेरिका के बाद भारत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में तीसरे स्थान पर है।

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साल 2013 में धुम्रपान नहीं करने वाले लोगों पर हुए एक अध्ययन के अनुसार भारतीय नागरिकों के फेफड़े यूरोपीय नागरिकों के मुकाबले 30 फीसद कमजोर हैं। साल 2016 के एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स में 180 देशों में से भारत का स्थान चिंताजनक रूप से 141 था।

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Posted By: Digpal Singh