ट्रंप ने रूसी तेल और गैस खरीद से हटाया टैरिफ, भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी तेल पर 100% अतिरिक्त शुल्क लगाने वाले कानून को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है, ...और पढ़ें

रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप ने हटाया टैरिफ।
HighLights
ट्रंप ने रूसी तेल पर अतिरिक्त शुल्क कानून टाला।
भारत के लिए रूस से तेल खरीद का रास्ता खुला।
विशेषज्ञों ने इसे अस्थायी राहत बताया, स्थायी नहीं।
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसद अतिरिक्त शुल्क लगाने संबंधी अमेरिकी कानून को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है। इस फैसले से भारत के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद का रास्ता फिलहाल साफ हो गया है।
ट्रंप ने यह कदम विदेश सचिव मार्को रूबियो की भारत यात्रा से कुछ घंटे पहले उठाया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रंप ने भविष्य में इस कानून के तहत कदम उठाने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा है। यानी जरूरत पड़ने पर वॉशिंगटन फिर से इस प्रावधान का इस्तेमाल कर सकता है।
भारत के लिए क्या है मायने?
यह कानून (एसआरआईए) 18 सितंबर को लागू हुआ था, लेकिन हाल ही में अमेरिका और रूस के बीच डीजल खरीद का समझौता होने के बाद अन्य देशों पर दंड लगाना मुश्किल हो गया था। ट्रंप के इस फैसले का भारत-अमेरिका संबंधों पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।
दोनों देशों के बीच व्यापार और ऊर्जा सहयोग को लेकर चल रही बातचीत अब और सहज हो सकती है। 20 अक्टूबर को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक निर्धारित है, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा होगी। साथ ही क्वाड समिट को लेकर भी बातचीत चल रही है।
दिसंबर में होने वाले जी-20 के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने की भी चर्चा है। इन घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि दोनों देश रिश्तों को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
भारत ने किया था कड़ा विरोध
सनद रहे कि जब पिछले महीने अमेरिकी कांग्रेस मे उक्त विधेयक पारित हुआ था तो भारत ने इसका बहुत ही कड़ा विरोध किया था। भारत ने यहां तक कहा कि इस तरह के फैसले से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ने का खतरा है। वैसे भारत यह भी स्पष्ट करता रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर किसी भी दबाव में फैसला नहीं करता बल्कि देश व जनता के हितों को ध्यान में रख कर फैसला करता है।
अभी भारत रूस के साथ अमेरिका के साथ भी बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद कर रहा है। 20 अक्टूबर को मुंबई में विदेश मंत्तरी एस जयशंकर और रूबियो की बैठक में भी ऊर्जा सुरक्षा एजेंडे में काफी प्रमुखता से शामिल रहने वाला है।
रूसी तेल पर निर्भरता को लेकर पिछले कुछ महीनों में भारत पर अमेरिकी दबाव बना था, लेकिन ट्रंप के इस अस्थायी कदम से भारतीय रिफाइनरियों को राहत मिली है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थायी समाधान नहीं है।
एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर शोध करने वाली एजेंसी जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव ने अमेरिकी फैसले को राहत करार दिया है लेकिन यह भी कहा है कि यह छूट अमेरिकी व्यापार नीति के केंद्र में छिपी अनिश्चितता को उजागर करती है। वॉशिंगटन दंड की धमकी देता है, फिर जब उसे लागू करना असुविधाजनक हो जाता है तो पीछे हट जाता है।
एसआरआईए 18 सितंबर को कानून बन गया, लेकिन 9 अक्टूबर को अमेरिका-रूस के बीच रूसी डीजल खरीदने का समझौता होने के बाद अन्य खरीदारों पर दंड लगाना बचाव योग्य नहीं रहा। चीन को पहले से ही 10 जनवरी तक अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से सुरक्षा मिली हुई थी। संदेश साफ है कि अमेरिकी हित तय करते हैं कि दंड कब लागू होंगे, जबकि जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता सुरक्षा हासिल करने में मदद करती है।
उन्होंने आगे कहा, “भारत के लिए यह छूट समय सही है लेकिन इससे स्थायी निश्चितता नहीं मिलती। जुलाई में भारतीय तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 44 प्रतिशत रह गई। भारत ने ज्यादा कीमत होने के बावजूद अमेरिका से और यूएई से ज्यादा तेल खरीदा। फिर भी एसआरआईए कानून बना हुआ है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा करनी चाहिए, व्यावसायिक शर्तों पर तेल खरीदना चाहिए और अमेरिकी दबाव के फिर से बढ़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।”
