नई दिल्ली। पेट्रोल की तरह जल्द ही डीजल के दाम तय करने का अधिकार भी कंपनियों के हाथ आ सकता है। बताया जाता है कि सरकार ने इसके लिए मन बना लिया है। इसलिए अब पेट्रोल की तरह डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी से इंकार नहीं किया जा सकता है।

केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया है कि वो सैद्धांतिक तौर पर डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने पर सहमत है। लेकिन रसोई गैस को पूरी तरह नियंत्रण से मुक्त नहीं किया जाएगा।

केंद्र सरकार ने डीजल के मूल्य को नियंत्रण मुक्त करने का मन बना लिया है। वित्ता राज्यमंत्री नमो नारायण मीणा ने राज्यसभा में एक सवाल के दिए लिखित जवाब में कहा कि केंद्र ने सैद्धांतिक रूप से डीजल के मूल्य पर नियंत्रण हटाने का फैसला लिया है। फैसला पिछले साल लिया गया था। अभी उसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया है।

केंद्र ने इसके साथ रसोई गैस को पूरी तरह नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला नहीं किया है।

पेट्रोल को सरकार पहले ही बाजार के हवाले कर चुकी है और तब से पेट्रोल की कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है।

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डीजल मूल्यवृद्धि से पहले ही विरोध शुरू

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]।

ऐसा लगता है कि सरकार बजट सत्र के बाद भी डीजल की कीमत नहीं बढ़ा सकेगी। सरकार ने डीजल की कीमत तय करने का मामला तेल कंपनियों के हवाले करने के अपने साल भर पुराने फैसले का जिक्र क्या किया, विपक्षी दलों के साथ ही सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस की भी भृकुटियां तन गई। ऐसे में सरकारी तेल कंपनियों की मुसीबत हाल-फिलहाल खत्म होती नहीं दिख रही है।

राज्य सभा में मंगलवार को वित्ता राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा ने एक प्रश्न के लिखित जवाब में कहा कि डीजल की कीमत को विनियंत्रित करने का सैद्धांतिक फैसला हो चुका है।

मीणा के इस बयान के मीडिया में आते ही सबसे पहले भाजपा ने इसकी आलोचना की। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावेडकर ने कहा, 'ऐसा लगता है कि सरकार बहुत जल्द ही डीजल की कीमत बढ़ाने जा रही है। सरकार के इस तरह के किसी भी कदम का भाजपा पूरा विरोध करेगी। इससे न सिर्फ यात्रा खर्च बढ़ेगा बल्कि दूसरी चीजें भी महंगी हो जाएंगी'। भाजपा के बाद संप्रग की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने भी साफ कर दिया कि वह पेट्रो मूल्यवृद्धि पर अपने अड़ियल रवैये में कोई बदलाव नहीं करने जा रही। पार्टी सांसद सुखेंदु राय ने कहा कि डीजल की कीमत तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को देने का विरोध किया जाएगा।

दरअसल, डीजल मूल्य विनियंत्रण का सैद्धांतिक फैसला पिछले वर्ष जून में ही हो गया था, लेकिन विरोध के चलते इस पर कभी अमल नहीं हुआ। डीजल की कीमत अभी भी सरकार ही तय करती है। यही वजह है कि सरकारी तेल कंपनियां डीजल को 12 रुपये प्रति लीटर के घाटे पर बेच रही हैं। घाटे से आजिज आकर तेल कंपनियों ने धमकी दी है कि या तो कीमत बढ़ाने की इजाजत दी जाए वरना आगे ईधन की आपूर्ति करना संभव नहीं होगा।

राजनीतिक वजहों, खासकर पांच राज्यों के बीते विधानसभा चुनावों के कारण संप्रग सरकार दिसंबर, 2011 के बाद से पेट्रोलियम पदार्थो में कोई मूल्यवृद्धि नहीं कर पाई है। अब सरकार बजट सत्र की समाप्ति के बाद पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमत बढ़ाने की इजाजत तेल कंपनियों को देना चाहती है। लेकिन लगता नहीं है कि उसके लिए अब भी ऐसा करना आसान होगा।

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