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कागजों पर मृत लेकिन असल में जिंदा... वे लोग जिन्हें साबित करना पड़ा कि वे जीवित हैं

Published: Mon, 02 Nov 2026 06:30 AM (IST)

भारत भर में कई चौंकाने वाली घटनाएं हुईं, जहां चिकित्सा पेशेवरों या अधिकारियों द्वारा मृत घोषित किए गए व्यक्तियों को बाद में जीवित पाया गया।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

HighLights

  1. सात साल पहले मृत महिला जिंदा मिली, आरोपी जेल काट चुके।

  2. अंतिम संस्कार से पहले मृत घोषित व्यक्ति ने ली सांस, डॉक्टर निलंबित।

  3. अस्पताल ने मृत बताया, घर पर जिंदा मिला मरीज, जांच के आदेश।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं जिनमें लोगों को पहले मृत घोषित किया जा चुका है लेकिन वह जीवित हैं। इस तरह घटनाओं ने मेडिकल लापरवाही, पहचान में गलती और अस्पताल की प्रक्रियाओं में खामियों पर बार-बार सवाल खड़े किए हैं।

सात साल पहले मृत मान ली गई एक महिला के जीवित मिलने से लेकर, अंतिम संस्कार या दफनाने से ठीक पहले मरीजों के होश में आ जाने तक भारत में ऐसी कई घटनाओं ने परिवारों को चौंका दिया है और इन मामलों में जांच की नौबत आ गई है। कुछ मामलों में अस्पतालों की क्लर्कियल (दफ्तरी) गलतियां सामने आईं तो कुछ मामलों में किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं पर ही सवाल उठ खड़े हुए।

आइए, ऐसी ही कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं, जिनमें मृत घोषित किए गए लोग बाद में जीवित पाए गए।

साल साल पहले मृत घोषित की गई महिला जिंदा मिली

एक अजीबोगरीब मामले में मेहंदीपुर बालाजी पुलिस ने शनिवार को एक ऐसी महिला को हिरासत में लिया, जिसे सात साल पहले मृत घोषित कर दिया गया था। इस मामले में दो लोगों को उसकी हत्या का आरोपी ठहराया गया था और वे इसके लिए जेल की सजा भी काट चुके हैं।

पुलिस ने आरती नाम की इस महिला का पता तब लगाया, जब उन्हें कुछ लोगों से उसके ठिकाने के बारे में जानकारी मिली। मेहंदीपुर बालाजी पुलिस स्टेशन के अधिकारी अजीत सिंह बडसेरा के अनुसार, सोनू ने बताया कि उसने 2015 में आरती से कोर्ट मैरिज की थी।

हालांकि, शादी के बाद आरती ने कथित तौर पर मांग की कि जमीन और पैसे उसके नाम कर दिए जाएं। जब सोनू ने उसकी मांगें पूरी करने में असमर्थता जताई तो आरती कथित तौर पर आठ दिन बाद घर छोड़कर चली गई और गायब हो गई।

काफी तलाशने के बाद भी वह उसे ढूंढ नहीं पाए। इसी बीच, उत्तर प्रदेश पुलिस को मथुरा की मगोर्रा नहर में एक अज्ञात महिला का शव मिला। पोस्टमार्टम न होने की वजह से पुलिस ने शव का अंतिम संस्कार करवा दिया। लगभग छह महीने बाद आरती के पिता सूरज प्रसाद गुप्ता अपनी लापता बेटी के बारे में पता करने के लिए पुलिस के पास गए।

पुलिस ने उन्हें मृत महिला के पास से मिली तस्वीरें और कपड़े दिखाए, जिसके बाद उन्होंने शव की पहचान अपनी बेटी आरती के रूप में की। इसके बाद, उनके पिता ने मेहंदीपुर बालाजी के रहने वाले सोनू सैनी और गोपाल सैनी पर अपनी बेटी की हत्या करने का आरोप लगाया। दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें इस मामले में जेल भी हुई। हालांकि, अब आरती के जिंदा मिलने से इस मामले में एक नया मोड़ आ गया है।

एक और चौंकाने वाला मामला

राजस्थान में एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए गए 25 वर्षीय मूक-बधिर व्यक्ति रोहिताश कुमार में अंतिम संस्कार से ठीक पहले जिंदा होने के संकेत मिले।

कुमार एक शेल्टर होम में रहते थे और उनका कोई परिवार नहीं है। गुरुवार को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें झुंझुनूं जिले के बीडीके अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में ले जाया गया। इलाज के दौरान कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर डॉक्टरों ने दोपहर करीब 2 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया और शव को मोर्चरी में रखवा दिया।

जरूरी कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद पुलिस शव को श्मशान घाट ले गई। लेकिन, पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही शव को चिता पर रखा गया कुमार सांस लेते हुए दिखाई दिए। तुरंत एक एम्बुलेंस बुलाई गई और उन्हें वापस अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया। बाद में अधिकारियों ने बताया कि उनकी हालत स्थिर है। इस घटना के बाद जिला प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं।

जिला कलेक्टर रामअवतार मीणा ने गुरुवार रात तीन डॉक्टरों डॉ. योगेश जाखड़, डॉ. नवनीत मील और प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर डॉ. संदीप पचार को सस्पेंड कर दिया। एक जांच समिति भी गठित की गई और चिकित्सा विभाग के सचिव को इस घटना के बारे में सूचित किया गया। इसके बाद राजस्व अधिकारी महेंद्र मुंड और सामाजिक न्याय विभाग के उप निदेशक पवन पूनिया ने अस्पताल का दौरा किया।

कोलकाता में मरीज को मृत घोषित किया गया, बाद में जिंदा मिला

अस्पताल की एक कथित लापरवाही के मामले में कोलकाता के चित्तरंजन नेशनल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक ऐसा मरीज जिंदा मिला, जिसे मृत घोषित कर दिया गया था और जिसका डेथ सर्टिफिकेट भी जारी हो चुका था। छाती में दर्द की शिकायत के बाद साबिर मोल्ला को 11 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

गुरुवार शाम को उनके परिवार को अस्पताल से फोन आया कि उनकी मौत हो गई है। अगली सुबह उनके रिश्तेदार शव लेने के लिए अस्पताल के मुर्दाघर पहुंचे। लेकिन, एक हैरान करने वाली घटना में मोल्ला ने अस्पताल की एक इमारत के बाथरूम से अपने एक रिश्तेदार को देख लिया और उसे आवाज दी।

जब परिवार ने अस्पताल प्रशासन को इस बारे में बताया तो शुरुआत में उनसे कहा गया कि शायद उन्होंने किसी और को मोल्ला समझ लिया होगा। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल ने पहले शव सौंपने से इनकार कर दिया था, जिसका कारण उन्होंने मरीज का कोविड टेस्ट पॉजिटिव आना बताया था। इसके बाद, उसी सुबह मोल्ला को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अस्पताल प्रशासन ने इस घटना की जांच शुरू कर दी है।

अस्पताल ने जिसे मृत घोषित किया, वह घर पर जिंदा मिला

आगरा की एक ऐसी घटना जिसने पुलिस और परिवार दोनों को हैरान कर दिया। सांप के काटने के इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी पा चुके एक व्यक्ति को उसी मेडिकल कॉलेज ने बाद में मृत घोषित कर दिया।

रविवार सुबह सांप के काटने के बाद कुश चौरसिया को एसएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। मेडिकल जांच के बाद कुछ घंटों में ही डॉक्टरों ने उन्हें छुट्टी दे दी। हालांकि, अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचित किया कि उनकी मौत हो गई है। जब पुलिस उनके घर पहुंची ताकि परिवार को जानकारी दी जा सके और विवरण लिया जा सके तो वे चौरसिया को जिंदा देखकर हैरान रह गए।

चौरसिया ने कहा, "यह एक अजीब स्थिति थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूं। मैंने यह साबित करने के लिए सभी दस्तावेज दिए कि मैं जीवित हूं और पुलिस को बताया कि शायद अस्पताल प्रशासन से कोई गलती हुई है।" उनकी पत्नी ऋचा चौरसिया ने बताया कि परिवार चाय पी रहा था तभी एक पुलिस अधिकारी आए और उन्हें बताया कि उनके पति की मौत हो गई है, जबकि उनके पति ठीक उनके बगल में ही खड़े थे।

उन्होंने कहा, "हमें लगता है कि यह अस्पताल के कर्मचारियों की कोई लिपिकीय गलती है। उन्होंने पुलिस को किसी और व्यक्ति के बारे में गलत जानकारी दे दी होगी, जिसकी शायद अस्पताल में मौत हुई हो।"

इस घटना के बाद मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. सरोज सिंह ने जांच के आदेश दिए। मामले की जांच के लिए मेडिसिन विभाग के डॉ. पी. के. माहेश्वरी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई, जिसे दो दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है।

डॉ. सरोज सिंह ने कहा, "हमें लगता है कि यह एक लिपिकीय गलती है। हो सकता है कि डॉक्टर ने असल मृतक के बजाय किसी दूसरे मरीज का नाम गलती से लिख दिया हो।" शाहगंज के स्टेशन ऑफिसर विनय कुमार मिश्र ने भी पुष्टि की कि चौरसिया जीवित हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि यह घटना अस्पताल के कर्मचारियों की किसी लिपिकीय गलती के कारण हुई है।

सिद्धार्थनगर में दफनाने से ठीक पहले जीवित मिला व्यक्ति

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में दिल का दौरा पड़ने के बाद परिवार ने एक व्यक्ति को मृत मान लिया था, लेकिन दफनाने से ठीक पहले वह जीवित पाया गया। यह घटना डुमरियागंज के सिखरा गांव की है।

अकरम मुंबई में थे, जहां उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा और उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई। उन्हें एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां लगभग 24 घंटे तक उनका इलाज चला, जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें आगे के इलाज के लिए कहीं और भेज दिया। हालांकि, उनके परिवार वालों को लगा कि उनकी मौत हो गई है और उन्होंने उनके गांव में रिश्तेदारों को इसकी सूचना दे दी।

उन्हें दफनाने की तैयारियां शुरू हो गईं और उन्हें घर ले जाने के लिए एक एम्बुलेंस का इंतजाम किया गया। बुधवार तड़के करीब 3 बजे जब एम्बुलेंस गांव पहुंची तो कुछ लोगों को उनमें जीवन के संकेत दिखे और उन्हें शक हुआ कि अकरम अभी भी सांस ले रहे हैं। यह शक लगभग छह घंटे तक बना रहा।

जब शव को नहलाने की तैयारी चल रही थी तो वहां मौजूद एक व्यक्ति ने अकरम के होंठों में हल्की हलचल देखी। उन्हें तुरंत एक डॉक्टर के पास ले जाया गया, जिन्होंने पुष्टि की कि वे जीवित हैं।

अकरम को पहले पास के एक निजी अस्पताल ले जाया गया और बाद में उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें बस्ती के एक अस्पताल में भेज दिया गया। हालांकि, अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई, ऐसा गांव के रहने वाले शकील ने बताया।

बीड में नवजात को मृत घोषित किया गया, एक दिन बाद जीवित मिला 

महाराष्ट्र के बीड जिले में अंबाजोगई के एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किया गया एक नवजात, 24 घंटे बाद जीवित मिला था, लेकिन शुक्रवार रात उसकी मौत हो गई। बच्चे को वापस स्वामी रामानंद तीर्थ ग्रामीण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल लाया गया, जहां उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था।

नवजात को नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (NICU) में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उसका इलाज जारी रखा। प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के प्रमुख डॉ. गणेश टोंडागे ने बताया कि बच्चे की मौत कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट (दिल और फेफड़ों के काम करना बंद कर देने) के कारण हुई।

उन्होंने कहा, "बच्चे का जन्म गर्भावस्था के केवल 27वें हफ्ते में हुआ था। नवजात को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए उसे लाइफ सपोर्ट पर रखा गया था। तमाम कोशिशों के बावजूद, बच्चा बच नहीं सका।"

डॉक्टरों ने बताया कि नवजात शिशु में लैजरस सिंड्रोम देखा गया। यह एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें मृत घोषित किए गए व्यक्ति में सीपीआर और अन्य पुनर्जीवन प्रयासों के विफल रहने के बाद अचानक जीवन के संकेत दिखाई देने लगते हैं।

इस घटना में एक ऐसी स्थिति भी शामिल थी जिसे डॉक्टर सस्पेंडेड एनीमेशन कहते हैं। इसमें शरीर के जरूरी काम-काज, यहां तक कि दिल की धड़कन भी कुछ समय के लिए रुक सकती है। अस्पताल के डीन डॉ. शंकर धापटे ने बताया कि इस घटना की जांच के लिए पांच सदस्यों की एक समिति बनाई गई है, लेकिन अभी तक उसकी रिपोर्ट नहीं आई है।

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