नई दिल्‍ली, जेएनएन। सन 1976 में जब अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने चेचक के पहले टीके की खोज की तो शायद दुनिया को नहीं मालूम था कि आगे चलकर यही अमृत की बूंदें तमाम महामारियों के खिलाफ रामबाण साबित होंगी। आज अगर मानव सभ्यता फल-फूल पा रही है तो इसके पीछे उसके द्वारा ईजाद यही अमोघ अस्त्र है। दिसंबर 2019 में चीन से निकले एक वायरस ने ज्ञात इतिहास की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदा खड़ी कर दी। अपने विकास क्रम में इसके तमाम मायावी रूप आज भी जारी है।

बीतते दिनों के साथ ये रूप ज्यादा संक्रामक और घातक होते जा रहे हैं। डरना नहीं, क्योंकि अगर वायरस डाल-डाल है तो इंसान पात-पात। हमने बहुत कम समय में ही इसकी काट वैक्सीन खोज ली है। इस वायरस का आज पलड़ा इसलिए भारी दिख रहा है, क्योंकि दुनिया की बड़ी आबादी को वैक्सीन नहीं लग सकी है जो एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। जिस दिन धरती के हर आदमी को वैक्सीन की उपयुक्त खुराक मिल जाएगी, वायरस का समझो खेल खत्म।

सभी देश इसी दिशा में तेजी से बढ़े हैं। भारत में भी वैक्सीन लगाने का दायरा बढ़ चुका है। अब एक मई से 18-44 आयु वर्ग को शामिल करने के बाद देश के सभी वयस्कों के लिए टीकाकरण शुरू हो चुका है। वैक्सीन की उपलब्धता और इसे युद्धस्तर पर लगाए जाने के लिए दोनों स्वदेशी टीकों के अलावा दुनिया के अन्य अहम टीकों की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। बस, जरूरत है आगे बढ़कर लगवाने की। तो आइए, दुनिया के सबसे बड़े टीकोत्सव में हम शरीक हों और इस महामारी को मुंहतोड़ जबाव दें।

बड़ी आबादी की चुनौती : कोरोना महामारी के खिलाफ लोगों को रक्षाकवच देने वाले टीके को लगाते भारत में 108 दिन हो चुके हैं। बीते रविवार को ही इस अभियान ने अपने सौ दिन पूरे किए। अब तक अजेय बनी इस महामारी को हम इसी टीके से परास्त कर सकते हैं। इसलिए सबको तय समय पर टीका जरूर लगाना चाहिए। हालांकि इस महाअभियान में देश की बड़ी आबादी उसके संसाधनों के सामने चुनौती बनी हुई है। आइए देखते हैं कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले हमारा टीकाकरण कहां ठहर रहा है।

दो फीसद से कम का ही अभी पूर्ण टीकाकरण : टीकाकरण करते हुए देश में सौ दिन से ऊपर हो चुके हैं। अभी तक दो फीसद से भी कम आबादी को दोनों खुराकें लगाई जा सकी हैं। दस में से एक से भी कम को टीके की पहली खुराक लग सकी है। टीकाकरण में आज वे देश आगे हैं जहां यह अभियान पहले शुरू हो गया था। इजरायल अपनी आधी से अधिक आबादी का टीकाकरण कर चुका है। इसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।

टीकाकरण पर राज्यों का खर्च : टीकाकरण की खरीद के लिए धन की व्यवस्था में राज्यों की भूमिका बहुत अहम है। अपनी योग्य आबादी के 50 फीसद को टीकाकरण के लिए (दोनों खुराक) या वैकल्पिक रूप से 75 फीसद आबादी को एक खुराक और 25 फीसद को दोनों खुराक से आगे बढ़ना होगा। सबसे बड़े राज्य को अपनी आबादी के टीकाकरण के लिए अपने सालाना स्वास्थ्य बजट का एक तिहाई खर्च करना पड़ सकता है। केरल, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा के साथ पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्य अपने सालाना स्वास्थ्य बजट में आसानी से इस राशि का प्रबंध कर सकते हैं।

कुल टीकों में भारत शीर्ष पांच में : आबादी के हिसाब से टीकाकरण में भारत भले ही पिछड़ता दिखे, लेकिन अब तक लगाए गए कुल टीकों की संख्या में वह शीर्ष पांच देशों में जगह बनाता है। इसका इंजेक्शन टू इंफेक्शन रेट कुछ यूरोपीय देशों से भी बेहतर है। हालांकि यूरोपीय देश टीकाकरण की जा चुकी आबादी की हिस्सेदारी में आगे हैं।

तेज टीकाकरण यानी कम नुकसान : अगर हमारे राज्य तेज टीकाकरण करते हैं तो इसका मतलब उन्हें कम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। दूसरी लहर पहले से ही अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा चुकी है। इस वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि के अनुमान में कमी बताई जाने लगी है। सर्वाधिक नुकसान मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेड, हास्पिटलिटी और यातायात सेवाओं पर पड़ सकता है।

सुस्त हो रही टीकाकरण की रफ्तार : एक मई से टीकाकरण का एक और चरण शुरू किया जा चुका है। इसमें 18 साल से 44 साल तक के लोगों का टीकाकरण किया जाएगा। यानी अब देश में सभी वयस्कों का टीकाकरण हो रहा है। इस चरण के शुरू होने तक हमारी रफ्तार सुस्त हो चली है। 10 से 20 अप्रैल के बीच देश में कुल 2.85 करोड़ टीके लगाए गए जबकि इसके पहले के दस दिनों में लगाए गए टीकों की संख्या 3.85 करोड़ थी।

आयुवार टीकाकरण : भारत में टीकाकरण का नया दौर भले ही शुरू हो चुका है, लेकिन 45 साल ऊपर की ही आबादी का अभी टीकाकरण नहीं संपन्न हुआ है। 60 साल से ऊपर सौ में से सिर्फ 36 लोगों का ही टीकाकरण हो पाया है। कोविड डैशबोर्ड के अनुसार 40-60 के बीच की आयु में पांच में से सिर्फ एक का टीका 23 अप्रैल तक संभव हो सका था। जो आयु इस महामारी के प्रति ज्यादा संवेदनशील है, अभी उसी का टीकाकरण नहीं हो सका है। 45 साल से ऊपर के लोगों की संख्या देश में करीब 30 करोड़ हैं जबकि 18-44 साल की आबादी 60 करोड़ है। इसलिए एक मई को टीकाकरण का शुरू हुआ दौर ज्यादा चुनौती पूर्ण है।

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