नई दिल्‍ली (ऑनलाईन डेस्‍क)। बीते वर्ष दिसंबर में चीन से शुरू हुई कोरोना महामारी जनवरी के अंत तक लगभग पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। मार्च तक अंटार्कटिका को छोड़कर दुनिया का कोई महाद्वीप इसकी गिरफ्त में आने से अछूता नहीं रहा था। हालांकि जनवरी से ही विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने इस पर काम करना और लोगों को इसके प्रति बचाव के उपाय सुझाने शुरू कर दिए थे। वहीं चीन में इसकी आधिकारिक पुष्टि होने के बाद वैज्ञानिकों ने धीरे-धीरे पर इस शोध करना भी शुरू कर दिया था। इस महामारी के शुरुआती दो माह के अंदर ही दुनिया के कई देशों ने इस पर शोध के अलावा इसकी वैक्‍सीन पर भी काम करना शुरू कर दिया था। बीते छह माह के दौरान पूरी दुनिया में कई शोध हुए जो विभिन्‍न न्‍यूज ऐजेंसियों के द्वारा अखबारों की सुर्खियां बने। इस दौरान कोरोना वायरस में भी काफी बदलाव आया। साथ ही उसके लक्षणों में भी इजाफा देखने को मिला।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने शुरुआत में इसके लक्षणों में खांसी, जुकाम और तेज बुखार का आना बताया था। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की तरफ से कहा गया था कि ऐसे व्‍यक्ति तुरंत डॉक्‍टरों की सलाह लें और अपनी जांच करवाएं। इसमें लोगों को एक दूसरे से दूरी बनाए रखने को भी कहा गया था। इसके अलावा थोड़े-थोड़े समय में एक मिनट तक साबुन से हाथ धोने की भी सलाह दी गई थी। साबुन न होने पर लोगों को इसके लिए सेनेटाइजर का इस्‍तेमाल करने को कहा गया था। बाद में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की ही तरफ से कहा गया कि इस वायरस का खतरा उम्र दराज लोगों को अधिक है। इसकी वजह इनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होना बताया गया था। इसके बाद ये भी जब गर्मी के साथ इस वायरस के खत्‍म होने की बातें की जा रहीं थीं तब विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की तरफ से साफ कर दिया गया कि गर्मी के बढ़ने से ये वायरस खत्‍म नहीं होने वाला है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की तरफ से इस बात की भी पुष्टि की गई थी कि विभिन्‍न देशों में कोरोना वायरस के संक्रमित मरीजों में वायरस के स्‍ट्रेन में बदलाव देखा गया है। इसके बाद न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की एक रिपोर्ट में वाशिंगटन और न्‍यूयॉर्क में सामने आए कोरोना के मामलों में वायरस के दो अलग-अलग स्‍ट्रेन होने की बात कही गई थी।

इसके मुताबिक न्‍यूयॉर्क में कोरोना वायरस का स्‍ट्रेन वाशिंगटन समेत अन्‍य राज्‍यों में पाए गए कोरोना वायरस के स्‍ट्रेन से अधिक घातक पाया गया था। वहीं जिस स्‍ट्रेन की बात न्‍यूयॉर्क के लिए कही गई थी रिपोर्ट के मुताबिक वो अमेरिका में यूरोप से आया था। यही स्‍ट्रेन कुछ अन्‍य देशों में भी देखा गया था। मार्च अप्रैल में ये भी सामने आया कि बच्‍चों के शरीर में में इसकी वजह से जगह-जगह लाल चत्‍ते से उभर आए थे। कनाडा में इसके कई मामले सामने आए थे। रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक ब्रिटेन में कुछ मामलों में पाया गया कि इस वायरस के शिकार लोग उन बीमारियों के शिकार हो रहे थे जो उन्‍हें पहले नहीं थी। यहां पर भी कनाडा की ही तरह बच्‍चों में इस वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में लाल चत्‍ते उभरने के मामले सामने आए थे। बीते छह माह के दौरान कोरोना वायरस के गतिशील होने की भी बातें सामने आई हैं। शुरुआत में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने कहा था कि ये केवल कुछ की फीट तक जा सकता है। लेकिन हाल के कुछ दिनों में इसके हवा में बने रहने और कुछ अधिक दूरी तक ट्रेवल करने को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है। हालांकि इसको लेकिर विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने अभी कोई पुष्टि नहीं की है। विभिन्‍न देशों में हुए शोध के मुताबिक कुछ देशों ने एंटीबॉडी को अपनी लैब में विकसित करने में सफलता हासिल की। इसके अलावा कुछ देश इसकी दवा का भी क्‍लीनिकल टेस्‍ट कर रहे हैं।

समाचार एजेंसी द्वारा जारी खबर के मुताबिक एक नए शोध में ये भी पता पता लगा है कि नोवल कोरोना वायरस से होने वाली घातक वैश्विक महामारी कोविड-19 का बच्चों पर कम असर कम था लेकिन वयस्कों के लिए यह जानलेवा है। इसके जवाब में कहा गया कि बच्चों के फेफड़े की बनावट ऐसी है कि उनमें कोरोना वायरस का प्रवेश नहीं हो पाता है। अमेरिकन जनरल ऑफ फिजियोलॉजी में प्रकाशित शोध के अनुसार अमेरिका में कोविड-19 के पहले 1,49,082 मरीजों में सिर्फ 1.7 फीसद मरीज ही बच्चे या 18 साल से कम के थे। खबर में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के शोधकर्ता मैथ्यू हार्टिग के हवाले से कहा गया था कि फेफड़े में कोरोना वायरस का आगमन एंजियोटेनसिन कनवर्टिग एनजाइम (एसीई2) के कारण होता है जो कम उम्र में शरीर में होता ही नहीं है। यह एनजाइम उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर में बढ़ता जाता है। इसके कारण वयस्कों में आसानी से कोरोना वायरस का संक्रमण हो जाता है। लेकिन यह एनजाइम बच्चों में स्वाभाविक रूप से बहुत कम होता है।

शोधकर्ता के मुताबिक बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों की प्रतिरोधक क्षमता के मुकाबले अलग तरीके से काम करती है। इसीलिए बच्चों में ऐसे गंभीर रोगों की गुंजाइश बहुत कम होती है। इसके अलावा बच्चों में टी सेल होती हैं जो किसी भी किस्म की सूजन और जलन से निपटने में बेहद सक्षम होती हैं। टी कोशिकाओं में संक्रमण से लड़ने की ताकत के साथ ही उससे बचाव करने की भी अतिरिक्त क्षमता होती है। शोध में बताया गया है कि कोविड-19 के मरीजों में देखा गया है कि उनमें टी-सेल की तादाद काफी कम हो जाती है। इससे वायरस से लड़ने की क्षमता भी घट जाती है। बच्चों में स्वाभाविक रूप से टी-सेलों में इंटरल्यूकिन 10 का उच्च स्तर होता है। इन्हें ह्यूमन साइटोकिन सिनथेसिस भी कहते हैं। पिछले माह शोध में दावा किया गया था कि यह वायरस फेफड़े, लीवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है। 

Posted By: Kamal Verma

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