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सीजेपी के साथ जोड़ी बनाकर कांग्रेस ने कर दी चूक? गले की हड्डी न बन जाए आंदोलन का विस्तार

Published: Fri, 16 Oct 2026 08:38 PM (IST)

कांग्रेस ने सीजेपी और उससे जुड़े संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन का विस्तार करने में चूक कर दी है, जिससे ...और पढ़ें

कांग्रेस का सीजेपी से जुड़ना बना बड़ी राजनीतिक चूक।

कांग्रेस का सीजेपी से जुड़ना बना बड़ी राजनीतिक चूक।

HighLights

  1. कांग्रेस ने सीजेपी से जुड़कर आंदोलन की जिम्मेदारी ओढ़ी।

  2. नेहा बोरा, प्रशांत भूषण के बयानों से उठे सवाल।

  3. अलोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन की बात से कांग्रेस पर दबाव।

आशुतोष झा, नई दिल्ली। अब तक सीजेपी व उससे जुड़े दलों से दूरी बनाकर चल रही कांग्रेस ने आंदोलन के विस्तार के लिए सीजेपी को साथ जोड़कर थोड़ी चूक कर दी। वस्तुत: कांग्रेस ने उनके आचरण और जुलाई में हुई हिंसक घटनाओं की जिम्मेदारी भी खुद पर ओढ़ ली जिसका बचाव करना उनके लिए गले की हड्डी बन सकती है।

एक दिन पहले ही आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा के बंग्लादेश से प्रेरित होने के बयान और एक्टिविस्ट वकील प्रशांत भूषण के सत्ता परिवर्तन की मंशा ने अब तक के एसआइआर विरोध पर सवाल खड़ा कर दिया है। एक दिन पहले ही कर्नाटक के गृहमंत्री व पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पुत्र प्रियांग खरगे ने घोषणा की थी कि सीजेपी और कांग्रेस एक ही है।

राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट मार्च में आइसा प्रमुख नेहा बोरा राहुल और प्रियंका गांधी के साथ साथ चल रही थीं। राहुल गांधी ने हालांकि इस मार्च को शिव बारात का नाम दिया था और कहा था कि कोई भी इसमें शामिल हो सकता है लेकिन जितनी प्रमुखता बोरा को मिली थी उससे यह चर्चा भी शुरू हो गई थी कि क्या वाम छात्र नेता कन्हैया कुमार की तरह ही बोरा भी कांग्रेस में आ सकती हैं।

बोरा कांग्रेस में आएंगी या नहीं यह तो दूर की बात है लेकिन यह सच्चाई है कि शुरूआत में जरूर कांग्रेस सीजेपी के आंदोलन से अलग ही रहकर अपनी बढ़त बनाने की कोशिश करती रही हो, धीरे धीरे संभवत: इसका अहसास होने लगा था कि विपक्षी घटकलों के प्रदर्शन में सिर्फ कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं।

इसे प्रभावी बनाना है तो दूसरे संगठनों को जोड़ना होगा। पर पार्टी के अनुशासन से दूर चलने वाले संगठनों के युवा खून को जोड़ना खतरनाक भी हो सकता है इस पर पूरा सोचविचार शायद नहीं किया। कथित शिव बारात ने रंग तो बनाया लेकिन उसका भार झेलना मुश्किल है।

नेहा बोरा ने खुलेआम बंग्लादेश के हिंसक आंदोलन की बात कर दी। प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन की बात कही। ये बयान आम जनता को आगाह करते हैं क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में सत्ता में आना और जाना दोनों चुनाव के ही जरिए होता है।

यहां तक कि जेपी आंदोलन जैसे बड़े राजनीतिक संग्राम के बाद भी चुनाव के जरिए ही जनता पार्टी सरकार बनी थी। जबकि उस आंदोलन को बहुत बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त था।आपातकाल ने लोगों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया था फिर भी आखिरी निर्णय चुनाव के जरिए हुआ जो आज की दशा में 2029 में है। फिर आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन की बात अलोकतांत्रिक ही नहीं अराजक भी है। अगर शिव बारात जुटाई है तो जिम्मेदारी सीधे तौर पर कांग्रेस से सिर आएगी।

दूसरा पहलू कानून व्यवस्था का है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कई दिन प्रदर्शन हुए। लेकिन पुलिस ने उसे मना नहीं किया। क्योंकि उनके प्रदर्शनों में हिंसा नहीं हुई। शिव बारात जुटी तो उन्हें संभलना मुश्किल होगा। तीसरा मुद्दा आम आदमी पार्टी का है। यह सार्वजनिक है कि सीजेपी के सभी बड़े पदाधिकारी आम आदमा पार्टी के लिए ही काम कर चुके हैं।

जंतर मंतर के दौरान भी आप खुलकर उनके साथ आई थी। कांग्रेस ने तो सीजेपी को अपनाने का एलान कर दिया है लेकिन दूसरी तरफ से चुप्पी है। अपने अलग अलग बयानों में भी सीजेपी प्रवक्ताओं की ओर से स्टालिन, केजरीवाल जैसे नेताओं की तो प्रशंसा की जाती रही है लेकिन कांग्रेस के किसी नेता का नाम लिया गया है।

वैसे भी कांग्रेस के एक राजनीतिक पार्टी है और इसलिए त्यौहारी माहौल में फिलहाल प्रदर्शन को स्थगित कर दिया है। लेकिन सीजेपी इसके लिए भी राजी नहीं है। व्यापारी वर्ग परेशान हैं। हर कृत्य का ठीकरा कांग्रेस के सिर फूटे तो आश्चर्य नहीं।

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