मऊ [सेलेश अस्थाना]। यूरोप महाद्वीप में निवास करने वाले रोमा [जिप्सी] समुदाय के लोग मूलत: भारतीयों की ही संतति हैं। उनके पूर्वज चौदह सौ पांच साल पूर्व दक्षिण भारत से पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश आए। उसके बाद वहां से विस्थापित होकर मध्य-पूर्व एशिया होते हुए यूरोप पहुंच गए।

यह पता चला है सेंटर फार सेल्युलर एंड मॉलीक्यूलर बॉयोलाजी हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.नीरज राय के नेतृत्व में हुए एक शोध से। उनकी टीम में दुनिया भर के अनेक विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल थे। डॉ.राय ने बताया कि आज यह गोरी जाति उक्त महाद्वीपीय समाज का एक प्रमुख अंग है।

उनके रहन-सहन, गीत-नृत्य व भाषा आदि पर आज भी भारतीयता का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। पहले इस समुदाय की उत्पत्ति को लेकर पूरी दुनिया में कई विवादास्पद तथ्य प्रचलित थे।

ये प्राचीन काल से दुनिया भर के समाजशास्त्रियों के लिए जिज्ञासा का विषय बने हुए थे। इन पर हुए शोध में डॉ.राय और उनके प्रमुख सहयोगी एस्टोनियन बॉयो सेंटर एंड टार्टू विवि एस्टोनिया के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ.ज्ञानेश्वर चौबे ने दुनिया भर में फैली जातियों के अलावा भारत के 205 प्रमुख समुदायों से लगभग 10 हजार लोगों के वाई क्रोमोसोम एकत्र कर उनकी डीएनए संरचना का अध्ययन किया और रोमा समुदाय के सैकड़ों लोगों के डीएनए से मिलान कराया तो वह सिर्फ भारत में अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति वर्ग में आने वाली कुछ जातियों के डीएनए से मेल खा रहे थे। टीम में शामिल बर्न यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड के भाषा वैज्ञानिक डॉ.जार्ज वैन ड्रीम ने उनकी भाषा और संस्कृति पर अध्ययन कर उसे भारतीय अनुसूचित और जनजातियों से ही विकसित होना बताया। वैज्ञानिकों की इस अंतरराष्ट्रीय टीम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.लालजी सिंह समेत कैंब्रिज विवि यूके, स्टैनफोर्ड विवि यूएसए के जीन वैज्ञानिक भी शामिल थे।

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