रिजवान अंसारी। Child Malnutrition News कुपोषण भारत समेत तमाम विकासशील देशों के लिए बड़ी समस्या है। देश के कुछ राज्यों में बाल कुपोषण की स्थिति गंभीर है। इसके खात्मे के लिए 1995 में मिड-डे मील योजना की शुरुआत की गई थी। अब इसका नाम बदलकर केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम-पोषण) कर दिया है। इसके जरिये अगले पांच साल में कुल 1.3 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। इसमें केंद्र सरकार करीब 54 हजार करोड़ रुपये, जबकि राज्य सरकारें 31 हजार करोड़ रुपये का योगदान देंगी। केंद्र सरकार खाद्यान्न पर लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च भी वहन करेगी।

पहले सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से आठ तक के बच्चे इस योजना का लाभ उठाने के पात्र थे, पर अब इसमें प्री-प्राइमरी (पहली कक्षा से नीचे) या बालवाटिका में पढ़ने वाले बच्चों को भी शामिल किया गया है। सरकारी स्कूलों में बालवाटिका की शुरुआत पिछले साल की गई थी। इसके तहत छह साल से छोटे बच्चों को भी औपचारिक शिक्षा में शामिल किया गया है। हालांकि आंगनबाड़ी के तहत इन बच्चों को राशन दिया जाता है, पर अब सरकार चाहती है कि इनको भी पका हुआ पोषणयुक्त भोजन दिया जाए।

इसके अलावा स्कूलों में पोषाहार उद्यान को भी बढ़ावा देने की योजना है। इन उद्यानों का मकसद छात्रों को अतिरिक्त पोषक तत्व प्रदान करना है। इसमें आकांक्षी जिलों और एनीमिया ग्रस्त बच्चों को पूरक पोषण देने का भी प्रविधान है। अब तक केंद्र सरकार गेहूं, चावल, दाल और सब्जियों के लिए ही राशि आवंटित करती थी। अब अगर राज्य सरकारें चाहें तो मेनू में दूध या अंडे जैसे किसी भी घटक को जोड़ सकती हैं। केंद्र सरकार राज्यों से स्कूलों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिये राशि उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेगी। अब तक मिड-डे मील के लिए राज्यों को केंद्र धन आवंटित करता था जिसमें अपने हिस्से की राशि को जोड़कर राज्य सरकारें जिला और तहसील स्तर पर योजना प्राधिकरण को भेजती थीं। इसमें केंद्र सरकार का दखल नहीं होता था, लेकिन अब केंद्र सरकार का पूरा दखल रहेगा। केंद्र सरकार का सोच सकारात्मक है। इससे इस योजना को बेहतर दिशा मिल सकती है। बच्चों में कुपोषण को दूर करने की दिशा में इसे गेमचेंजर के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि इसके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। इसकी वजह है कि ढाई दशक पुरानी मिड-डे मील योजना को समय के साथ लोकप्रियता तो मिली, पर सही मायने में इसके मकसदों को हासिल करने में हम अभी तक नाकाम रहे हैं।

अब कुपोषण के आंकड़े को ही देख लीजिए। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में हम लगातार पिछड़ रहे हैं, जबकि पिछले 25 वर्षो से सरकारें इस पर पैसे खर्च कर रही हैं। 2020 के सूचकांक में 107 देशों की सूची में हम 94वें पायदान पर थे। रिपोर्ट के मुताबिक भारत भूख की गंभीर स्थिति की श्रेणी में आता है। वैश्विक पोषण रिपोर्ट-2020 के दावों पर यकीन करें तो भारत दुनिया के उन 88 देशों में शामिल है, जो संभवत: 2025 तक वैश्विक पोषण लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकेंगे। यानी बच्चों में कम वजन और उनकी वृद्धि में रुकावट जैसी विसंगतियों से हम लंबे समय तक जूझने वाले हैं। अगर भारत सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-पांच की मानें तो भारत में बाल कुपोषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। आधे से ज्यादा राज्यों के बच्चों में बौनेपन और लंबाई के साथ वजन में कमी जैसी समस्याओं में वृद्धि हुई है। इसका मतलब हुआ कि हमारे कई बच्चे पोषणयुक्त आहार से अभी भी वंचित हैं।

बालवाटिकाओं या प्री-प्राइमरी के बच्चों तक पीएम पोषण योजना को विस्तार देने का जिक्र जरूर है, पर सवाल है कि इन बच्चों को पोषणयुक्त आहार मिल रहा है या नहीं यह कैसे सुनिश्चित होगा? क्योंकि सारा मसला इस कार्यक्रम में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते बच्चों को आहार न मिल पाने का ही है। कई ऐसे मामले उजागर हुए हैं जिनमें अधिकारियों और शिक्षकों की मिलीभगत सामने आई है। यहां तक कि छात्रों की फर्जी हाजिरी बनाकर उनके हिस्से के पैसे डकार लिए जाते हैं।

वर्ष 2018 में शिक्षा मंत्रलय (तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रलय) की प्रोग्राम अप्रुवल बोर्ड की रिपोर्ट से पता चला कि बिहार और उत्तर प्रदेश में लगभग आधे बच्चों को मिड-डे मील नहीं मिल पाता है। बिहार में प्राथमिक स्तर पर 39 फीसद और उच्च प्राथमिक स्कूलों में 44 फीसद, जबकि उत्तर प्रदेश में क्रमश: 41 और 47 फीसद बच्चे मिड-डे मील से वंचित रह जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी लगभग आधे बच्चों को मिड-डे मील नसीब नहीं होने की बात कही गई है। अब जब केंद्र ने स्कूलों को सीधे राशि ट्रांसफर करने की बात कही है तो इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार का खात्मा हो जाएगा।

फर्जी हाजिरी को रोकने के लिए मैनुअल हाजिरी की जगह बायोमीटिक हाजिरी प्रणाली को शीघ्र लागू करना होगा। हालांकि कुछ राज्यों में इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। इससे न केवल गलत तरीके से बनाई गई हाजिरी पर लगाम लग सकेगी, बल्कि मिड-डे मील सहित स्कूलों की दूसरी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी खत्म किया जा सकेगा। इसके अलावा बच्चों को पोषणयुक्त आहार सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक स्कूल में एक पोषण विशेषज्ञ नियुक्त करने का सरकार का आइडिया सराहनीय है। वे बच्चों के स्वास्थ्य पहलुओं पर ध्यान देंगे। तमिलनाडु में इस तरह का प्रयोग पहले से हो रह है। वहां के स्कूलों में मिड-डे मील की देखरेख के लिए अलग से एक मैनेजर की तैनाती होती है, जो बच्चों के लिए बनने वाले खाने की गुणवत्ता का ख्याल रखते हैं। बहरहाल स्कूली बच्चों को मिलने वाले भोजन को पोषणयुक्त बनाने के लिए कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत है।

[शोध अध्येता]

Edited By: Sanjay Pokhriyal