पांढुर्णा (जेएनएन)। पांढुर्ना और सावरगांव के बीच जाम नदी पर पारंपरिक गोटमार मेला शुरू हुआ। जाम नदी के बीच पलास के झंडे की पूजा-अर्चना के साथ ही ये गोटमार मेला शुरू हुआ और साथ ही दोनों दलों के बीच पत्थरबाजी की भी शुरुआत हुई। मेले में दोनों ओर से पत्थरों की बारिश शुरू हुई। अभी तक की जानकारी में 500 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

आपको बता दें कि पोला पर्व के दूसरे दिन पांढुर्णा में पारंपरिक गोटमार मेला होता है। ये त्योहार महाराष्ट्रीयन परिवारों में मनाया जाता है। चूंकि पांढुर्णा गांव महाराष्ट्र से लगा हुआ है, लिहाजा यहां की परंपराओं में महाराष्ट्र का खासा प्रभाव रहता है। इस मेले में दोनों गांव के लोग एक दूसरे पर गोफन से पत्थरों की बरसात करते हैं। प्रशासन की रोक के बावजूद ग्रामीणों ने इस पारंपरिक मेले का आयोजन किया है। मेला स्थल पर पुलिस और प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं और पूरी व्यवस्था के लिए करीब 1000 पुलिस पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।

परंपरा के मुताबिक मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर बसे पांढुर्णा में इस अनोखे पारंपरिक मेले का आयोजन होता है। पांढुर्णा और सांवरगांव के बीच स्थित जाम नदी के मध्य में पलास का झंडा गाड़ा जाता है। इस झंडे की पूजा के बाद दोनों गांव के लोग एक दूसरे बर पत्थर बरसाते हैं। जब तक इस झंडे को पांढुर्णा के लोग नहीं तोड़ते तब तक दोनों ओर से पत्थर बरसाने का क्रम जारी रहता है। हालांकि जो गांव इसे पहले तोड़ता है वो विजयी माना जाता है। नदी के बीच से झंडा उखाड़ने के बाद इसे गांव के ही चंडी माता को अर्पित किया जाता है।

300 सालों से जारी परंपरा

बताया जाता है कि गोटमार मेले की ये परंपरा 300 से भी ज्यादा सालों से निभाई जा रही है। हालांकि लोग एक दूसरे पर पत्थर क्यों बरसाते हैं। इसका वास्तविक इतिहास किसी को नहीं पता लेकिन इसे लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। बताया जाता है कि सालों पहले पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की युवती के बीच प्रेम था। विवाह के लिए युवक ने युवती को पांढुर्णा गांव ले आया था। इसे लेकर दोनों गांवों के बीच इसी स्थान पर जाम नदी पर पत्थरबाजी हुई थी।

इसके अलावा ये भी किवंदंती है कि गोंड सेना और अंग्रेजों के बीच हुई लड़ाई में हथियार खत्म होने के बाद गोंड सेना ने इसी स्थान पर पत्थरों के सहारे अंग्रेजों से कई दिनों तक गोटमार युद्ध किया था। इसके बाद पोला त्योहार के दूसरे दिन गोटमार मेले की परंपरा शुरू हुई और आज ये मेला लोगों की धार्मिक आस्था और परंपरा का प्रतीक बन गया है।

Posted By: Arti Yadav