चेन्नई, प्रेट्र। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि यौन उत्पीड़न की पीडि़त किसी नाबालिग के शरीर पर चोट के निशान नहीं होने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि कोई अपराध नहीं हुआ है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के एक आदेश को बरकरार रखते हुए यह बात कही है। एक व्यक्ति को आइपीसी के तहत 10 साल सश्रम कारावास और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो कानून, 2012) के तहत सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।

शारीरिक चोट जरूरी नहीं 

जस्टिस एस. वैद्यनाथन ने आरोपित के वकील के इस तर्क को खारिज कर दिया कि किसी भी शारीरिक हिंसा की स्थिति में जो व्यक्ति हिंसा का शिकार हुआ है, उसे शारीरिक चोट लगी होगी, जिसके अभाव में यह नहीं कहा जा सकता है कि पीडि़ता का यौन उत्पीड़न हुआ।

नाबालिग लड़की के विरोध के अभाव में शरीर पर चोट लगने की गुंजाइश नहीं

न्यायाधीश ने कहा, 'यह आरोपितों के वकील द्वारा दिया गया एक बेहद अपमानजनक तर्क है, क्योंकि नाबालिग लड़की को यह भी नहीं पता था कि उसे क्यों खींचा जा रहा है और क्यों छुआ गया।' उन्होंने, 'इसलिए, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नाबालिग लड़की कोई विरोध नहीं कर सकती है और किसी भी तरह के विरोध के अभाव में स्वाभाविक रूप से शरीर पर चोट लगने की कोई गुंजाइश नहीं है।'

निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया था

पीडि़त लड़की की मां ने 27 मई 2016 को शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपित प्रकाश ने 12 साल की लड़की को जबरन अपने घर ले गया और यौन उत्पीड़न किया। निचली अदालत ने प्रकाश को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

 

Posted By: Bhupendra Singh

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