सदी का सबसे ताकतवर 'सुपर एल नीनो': सूखा, बाढ़ और हीटवेव से जूझेगी दुनिया, भारत के मानसून पर क्या पड़ेगा असर?
प्रशांत महासागर में बन रहा 'सुपर एल नीनो' इस साल दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। वैज्ञानिकों का ...और पढ़ें

भारत के मानसून से लेकर दुनिया के तापमान तक पड़ेगा असर (AI द्वारा जनरेटेड फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रशांत महासागर में बन रहा एल नीनो इस साल दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एल नीनो बेहद ताकतवर हो सकता है, जो मौसम के पैटर्न को बदलकर कई देशों में सूखा, बाढ़ और गर्मी बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय प्रशांत महासागर में तेजी से गर्मी बढ़ रही है, जिससे एल नीनो बनने के संकेत मिल रहे हैं। यूरोपीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के ताजा अनुमान के मुताबिक, इस साल सुपर एल नीनो बनने की संभावना काफी ज्यादा है।
अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ एक सामान्य जलवायु बदलाव नहीं होगा, बल्कि इसका असर कई सालों तक रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका प्रभाव 2027 तक वैश्विक तापमान को बढ़ा सकता है। एल नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। यह बदलाव छोटा लगता है, लेकिन इससे हवा की दिशा, बारिश और मौसम के पूरे सिस्टम में बड़ा बदलाव आ जाता है।
कब बनता है 'सुपर एल नीनो'
जब समुद्र का तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तब इसे 'सुपर एल नीनो' कहा जाता है। ऐसे मजबूत एल नीनो हर 10 से 15 साल में एक बार आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनका असर ज्यादा बड़ा और लंबा होता है।
अभी के मॉडल्स बता रहे हैं कि तापमान 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े एल नीनो के स्तर तक पहुंच सकता है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिछले 100 सालों में सबसे ताकतवर एल नीनो में से एक हो सकता है। हालांकि, हर एल नीनो एक जैसा नहीं होता और इसके असर अलग-अलग जगहों पर अलग तरह से दिखते हैं।
भारत और दुनिया पर असर
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर है। मजबूत एल नीनो के दौरान अक्सर बारिश कमजोर या असमान होती है, खासकर उत्तर और मध्य भारत में। इससे खेती, पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरेबियन के कुछ हिस्सों में सूखा और ज्यादा गर्मी पड़ सकती है। वहीं, दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट जैसे पेरू और इक्वाडोर में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, प्रशांत महासागर में चक्रवात और तूफान बढ़ सकते हैं, जबकि अटलांटिक महासागर में तूफानों की संख्या कम हो सकती है।
तापमान और मौसम का बढ़ता खतरा
एल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ने की संभावना है। यूरोप, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका के कुछ हिस्सों में ज्यादा और तेज हीटवेव देखने को मिल सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि मजबूत एल नीनो वैश्विक तापमान को नए रिकॉर्ड तक पहुंचा सकता है। ऐसे में 2027 का साल बेहद गर्म हो सकता है। साथ ही, गर्म हवा ज्यादा नमी को रोककर रखती है, जिससे जब बारिश होती है तो वह ज्यादा तेज और भारी होती है। इससे कुछ जगहों पर अचानक बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है, जबकि दूसरी जगहों पर सूखा बना रहता है।
अभी भी बनी हुई है अनिश्चितता
हालांकि संकेत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी पूरी तरह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि एल नीनो कितना ताकतवर होगा। आने वाले महीनों में इसके असर का सही अंदाजा लगेगा। अगर समुद्र का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो इसका असर गर्मियों के अंत तक दिखने लगेगा और साल के आखिर तक यह अपने चरम पर पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी से तैयारी करना जरूरी है, क्योंकि आने वाले समय में मौसम ज्यादा अस्थिर और चरम हो सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026 की गर्मियों तक एक बेहद ताकतवर सुपर एल नीनो विकसित हो सकता है, जो 2027 तक असर दिखाएगा। यह घटना न सिर्फ वैश्विक तापमान बढ़ा सकती है, बल्कि सूखा, बाढ़ और असामान्य मौसम जैसी कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर सकती है।
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
वैज्ञानिकों के मुताबिक 2026 में एल नीनो बनने की संभावना तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि जून से अगस्त 2026 के बीच इसके बनने की करीब 62% संभावना है। अगर यह और मजबूत होता है, तो यह सुपर एल नीनो बन सकता है, जो बहुत कम बार देखने को मिलता है।
सुपर एल नीनो का मतलब है प्रशांत महासागर में सामान्य से ज्यादा गर्म पानी का बड़ा क्षेत्र बनना, जो पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है। यह घटना आमतौर पर 10-15 साल में एक बार होती है, लेकिन जब होती है तो इसका असर ज्यादा गहरा और लंबा होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े एल नीनो इवेंट्स की तरह ही या उनसे भी ज्यादा ताकतवर हो सकता है।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का खतरा
इस संभावित सुपर एल नीनो के कारण वैश्विक तापमान में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026 या 2027 दुनिया के अब तक के सबसे गर्म साल बन सकते हैं। यह तापमान बढ़ोतरी पेरिस समझौता के 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को भी एक साल के लिए पार कर सकती है, जो जलवायु परिवर्तन के लिहाज से गंभीर संकेत माना जाता है।
भारत पर क्या होगा असर
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर है। आमतौर पर एल नीनो के सालों में मानसून कमजोर रहता है या बारिश असमान होती है। 2026 में भी बारिश कम होने की आशंका जताई जा रही है, खासकर मध्य और उत्तरी भारत में।
इससे खेती, जल भंडारण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। अगर बारिश कम हुई तो फसल उत्पादन घट सकता है और पानी की कमी जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
दुनिया पर असर
अमेरिका में इस दौरान ज्यादा गर्मी, सूखा और अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है। साथ ही, तेज हवाओं के कारण तूफानों के पैटर्न में भी बदलाव आ सकता है।
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