मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में कहा कि सीएफएल बल्ब ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियां बनाती हैं। ये कंपनियां यूरोप व अन्य देशों में तो ई-कचरा प्रबंधन नियम 2016 का पालन करती हैं, लेकिन भारत में कंपनियां ऐसा नहीं करना चाहती।

मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कहा कि भारत में लचीली कानून व्यवस्था को देखते हुए यह कंपनियां नियमों का पालन नहीं करना चाहती। कंपनियों को पर्यावरण सुरक्षित बनाने की दिशा में भारत में नियमों का पालन करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।

अधिवक्ता ने कहा कि सीएफएल निर्माता कंपनियों को ऐसे प्रबंध करने होंगे कि उपभोक्ताओं से अवधि खत्म बल्ब स्वयं एकत्रित करे। यह नए नियम अंतराष्ट्रीय सम्मेलन और इन मर्करी लाइटों के अनुरूप हैं। इन बल्बों को इस प्रकार खुले में फेंकने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

पढ़ें- यूपी के शहरों में ई-वेस्ट डिजिटल इंडिया बनने की दौड़ में रोड़ा

वहीं, कंपनियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.चिदंबरम ने कहा कि नियमों का पालन करना असंभव है। नए नियमों में कंपनियों को ही जिम्मेदारी दी गई है कि वह अवधि खत्म होने पर फ्लोरोसेंट लैंप और अन्य पारा युक्त बल्ब उपभोक्ताओं से एकत्रित कर उसका निपटारा करे। केंद्र सरकार इस असंभव काम करने के लिए हमें मजबूर नहीं कर सकती। यह याचिका हेवेल्स, सूर्या व फीलिप्स समेत अन्य सीएफएल बल्ब निर्माता कंपनियों की एसोसिएशन ने दायर की है। याचिका में गत 23 मार्च को अधिसूचित नई ई-कचरा प्रबंधन नियम 2016 को चुनौती दी गई है।

पढ़ें- नेपाल की गंगा से निकाला 200 टन कचरा

Posted By: Rajesh Kumar

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप