विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

ट्रंप टैरिफ: अमेरिका के साथ कनाडा की नाकाम ट्रेड बातचीत से भारत क्या सीख सकता है?

Published: Sun, 23 Aug 2026 11:31 PM (IST)

कनाडा ने अमेरिका के साथ अपनी व्यापार वार्ता रद कर दी, क्योंकि वाशिंगटन ने रियायतों के बदले बहुत कम छूट ...और पढ़ें

अमेरिका के साथ कनाडा की नाकाम ट्रेड बातचीत।

अमेरिका के साथ कनाडा की नाकाम ट्रेड बातचीत।

HighLights

  1. कनाडा ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता रद की।

  2. अमेरिका ने रियायतों के बदले बहुत कम पेशकश की।

  3. भारत को अपनी व्यापार रणनीति पर विचार करना चाहिए।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कनाडा ने 21 अगस्त, 2026 को अमेरिका के साथ अपनी ट्रेड बातचीत रद कर दी और अपनी बातचीत टीम को वापस बुला लिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कनाडा को एहसास हुआ कि वाशिंगटन ऐसी रियायतों के बदले टैरिफ में बहुत कम छूट दे रहा था, जिनसे कनाडा की मैन्युफैक्चरिंग को नुकसान हो सकता था और देश की संप्रभुता सीमित हो सकती थी।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के फाउंडर अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिका के साथ ट्रेड बातचीत रद करने के कनाडा के कड़े रुख और डोनल्ड ट्रंप प्रशासन की अनिश्चित नीतियों से भारत के लिए अहम सबक मिल सकते हैं।

ओटावा द्वारा बातचीत रोकने और अपनी टीम को घर लौटने का निर्देश देने के बाद, अमेरिका ने कनाडा के साथ तीन दिन की गहन बातचीत के टूटने को गंवा दिया गया मौका बताया। वहीं, वाशिंगटन ने कनाडाई सामानों पर 50% टैरिफ लगा दिया।

अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने कहा कि कनाडा ने समझौता करने से इनकार कर दिया, जबकि उनके अनुसार, अमेरिका ने कनाडा को अमेरिकी बाजार तक पहुंच रखने वाले किसी भी बड़े निर्यातक के मुकाबले सबसे अच्छा व्यवहार देने की पेशकश की थी।

ग्रीर ने कहा कि कनाडा द्वारा नई मांगें रखने और बातचीत में पहले किए गए वादों में बदलाव करने से बातचीत करने वालों के बीच बना संतुलन बिगड़ गया।

ओटावा ने कहा कि वह 8 सितंबर से "डॉलर-के-बदले-डॉलर" (बराबर मूल्य का) जवाबी टैरिफ लागू करेगा। इस कदम से उन बातचीत का अंत हो गया जो 1 फरवरी, 2025 को नए अमेरिकी टैरिफ के पहले दौर के लागू होने के बाद शुरू हुई थीं।

अमेरिका-कनाडा ट्रेड बातचीत क्यों महत्वपूर्ण थी?

यह बातचीत इसलिए अहम थी क्योंकि कनाडा और अमेरिका के बीच तीन दशकों से अधिक समय से मुक्त व्यापार चल रहा था। यह व्यवस्था नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (NAFTA) के साथ शुरू हुई थी, जो 1994 में लागू हुआ था और बाद में 2020 में इसकी जगह US-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट (USMCA) ने ले ली।

USMCA अभी भी लागू है और उत्तरी अमेरिका से आने वाले ज़्यादातर योग्य सामानों को बिना किसी ड्यूटी के देशों के बीच आने-जाने की अनुमति देता है।

नए समझौते की जरूरत तब पड़ी जब ट्रंप प्रशासन ने USMCA ढांचे के बाहर, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन या 'मोस्ट-फेवर्ड-नेशन' (MFN) ड्यूटी के अलावा अतिरिक्त टैरिफ लागू किए।

इन उपायों में कनाडाई स्टील, एल्युमीनियम, तांबे और संबंधित उत्पादों पर 50% तक का 'सेक्शन 232' नेशनल-सिक्योरिटी टैरिफ और ऑटोमोबाइल व उनके पार्ट्स पर 25% ड्यूटी शामिल थी। वाशिंगटन ने लकड़ी और लकड़ी से बने उत्पादों पर भी अलग-अलग टैरिफ लागू किए।

इसके अलावा, अमेरिका ने कनाडा के कई तरह के सामानों पर 'सेक्शन 301' के तहत 10% टैरिफ लगाया। अमेरिका का तर्क था कि कनाडा ने जबरन मज़दूरी से जुड़े आयात पर लगी रोक को लागू करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए थे।

बाद में, अमेरिका ने 'सेक्शन 338' का इस्तेमाल करते हुए कनाडा से निर्यात होने वाले कुछ सामानों, जैसे वाइन, सीमेंट, हॉकी के सामान और अन्य उपभोक्ता उत्पादों पर 50% ड्यूटी लगाई। इनमें से कुछ टैरिफ उन सामानों पर भी लगाए गए जो USMCA के 'ओरिजिन के नियमों' को पूरा करते थे।

WTO के नियमों का उल्लंघन करने वाले इन टैरिफ ने उस व्यापारिक निश्चितता को कम कर दिया जो USMCA के ज़रिए मिलनी चाहिए थी। इसलिए, कनाडा ने USMCA की 2026 में होने वाली संयुक्त समीक्षा से पहले छूट, टैरिफ में सार्थक कटौती और अतिरिक्त एकतरफा कदमों से सुरक्षा पाने के लिए द्विपक्षीय बातचीत शुरू की।

अमेरिका ने बहुत कम रियायतें दीं

GTRI ने उन सीमित और शर्तों के साथ दी जाने वाली राहतों की लिस्ट बनाई है जो अमेरिका देने को तैयार था, जबकि साथ ही वह नई मांगें भी रख रहा था।

अमेरिका ने स्टील और एल्युमीनियम पर 50% टैरिफ को घटाकर 25% करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन इस कटौती को कड़े कोटा (सीमाओं) से जोड़ दिया।

अमेरिका ने कनाडा में बने वाहनों पर टैरिफ को 25% से घटाकर 15% करने की पेशकश की, लेकिन मीडियम और हेवी-ड्यूटी ट्रकों के लिए ऐसा करने से इनकार कर दिया। इससे कनाडा में बने फोर्ड F-350, F-450 और F-550 ट्रकों के साथ-साथ जनरल मोटर्स के सिल्वेराडो ट्रक नुकसान की स्थिति में आ जाते।

अमेरिका ने व्यापक सेक्शन 338 टैरिफ से अस्थायी सुरक्षा का प्रस्ताव दिया और लगभग 20 अरब डॉलर के कनाडाई कंज्यूमर और एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट पर 50% ड्यूटी को टालने का सुझाव दिया। हालांकि, खबरों के अनुसार, यह राहत कड़े इम्पोर्ट कोटा, डेयरी और अन्य एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स के लिए कनाडा के सप्लाई-मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ी रियायतों और अमेरिकी शराब की बिक्री पर प्रांतीय प्रतिबंधों को हटाने जैसी शर्तों से जुड़ी थी।

सबसे विवादित मुद्दा वे मांगें थीं जो पारंपरिक ट्रेड पॉलिसी से कहीं आगे थीं। अमेरिका चाहता था कि कनाडा स्वतंत्र रूप से ट्रेड एग्रीमेंट करने की अपनी क्षमता पर सीमाएं स्वीकार करे, और साथ ही कनाडाई महत्वपूर्ण खनिजों तक प्राथमिकता वाली पहुंच भी चाहता था।

कनाडा ने ट्रेड बातचीत क्यों रद की

कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वाशिंगटन द्वारा आखिरी समय में रखी गई शर्तों को आर्थिक रूप से नुकसानदेह और अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने बहुत कुछ मांगा, जबकि बदले में बहुत कम पेशकश की।

ओटावा ने तय किया कि प्रस्तावित व्यवस्था से अमेरिका के भारी टैरिफ तो बने रहेंगे, लेकिन साथ ही कनाडा के ट्रेड संबंधों, रणनीतिक संसाधनों, एग्रीकल्चरल सिस्टम और सांस्कृतिक नीतियों को मैनेज करने की उसकी आजादी भी सीमित हो जाएगी।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

GTRI के अजय श्रीवास्तव के अनुसार, भारत के लिए जो अमेरिका के साथ अपना ट्रेड एग्रीमेंट करने के लिए बातचीत कर रहा है, कनाडा का अनुभव एक चेतावनी है। वे कहते हैं कि नई दिल्ली को खेती, डिजिटल रेगुलेशन, जरूरी मिनरल्स या सरकारी खरीद पर कोई भी वादा करने से पहले साफ, पक्के और लंबे समय तक चलने वाले टैरिफ में छूट की मांग करनी चाहिए।"

वे कहते हैं कि ऐसा समझौता जिसमें सिर्फ कुछ अमेरिकी टैरिफ कम किए जाएं, लेकिन वाशिंगटन को सेक्शन 232, 301 या दूसरे घरेलू कानूनों के तहत नए टैक्स लगाने की आजादी हो, उससे कोई खास भरोसा नहीं मिलेगा।

इसलिए, भारत को अपनी रेगुलेटरी और रणनीतिक आजादी की रक्षा करनी चाहिए और बातचीत की प्रक्रिया से बाहर जाकर एकतरफा छूट देने से बचना चाहिए। उनका कहना है कि कोई भी छूट तभी दी जानी चाहिए जब फायदे संतुलित हों, लागू करने लायक हों और भविष्य में एकतरफा टैरिफ उपायों से सुरक्षित हों।

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है। ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ को फरवरी में घटाकर 18% कर दिया था। हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रंप के बदले में लगाए गए टैरिफ गैर-कानूनी हैं। तब से ट्रंप प्रशासन दुनिया भर के देशों पर टैरिफ लगाने के तरीके ढूंढ रहा है।