पर्यावरण बचाने की मुहिम 'सरकारी' होगी तो बंद हो जाएगी, जनभागीदारी जरूरी: साहू
आईएएस सुप्रिया साहू ने पर्यावरण संरक्षण में जनभागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। तमिलनाडु में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग की ...और पढ़ें

पर्यावरण बचाने की मुहिम सरकारी होगी तो बंद हो जाएगी जनभागीदारी जरूरी- साहू

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
रुमनी घोष, नई दिल्ली। नए साल में देश को जिन बड़ी चुनौतियों से जूझना पड़ेगा, उनमें जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और घटती हरियाली अहम हैं। उत्तर में अरावली से लेकर सुदूर दक्षिण के जंगलों तक 'तबाही' के निशान फैले हैं। इन निशानों को मिटाकर नए सिरे से पर्यावरण सुधार की परिभाषा गढ़ने में जुटे चुनिंदा चेहरों में एक हैं आइएएस सुप्रिया साहू।
वर्तमान में वह तमिलनाडु सरकार में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं। कुछ समय पहले उन्हें संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान 'चैंपियंस आफ द अर्थ' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर पारिस्थितिकी तंत्र बहाली, सतत शीतलन और समुदाय-केंद्रित जलवायु परिवर्तन प्रबंधन में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए 'प्रेरणा और कार्रवाई' श्रेणी में उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है।
नीलगिरि के जंगलों में भालू को प्लास्टिक खाते देख उन्होंने 'आपरेशन ब्लू माउंटेन' मुहिम छेड़ी और प्लास्टिक चेक पोस्ट बनवाया। उस छोटे से प्रयोग के बड़े असर पर अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा हो रही है। 35 साल के करियर में 23 साल से किसी न किसी पर्यावरणीय मुहिम की अगुआई करती आ रहीं सुप्रिया कहती हैं कि यदि मुहिम सरकारी होगी, तो बंद हो जाएगी।
इसे जनभागीदारी में बदलना जरूरी है। लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा रहीं सुप्रिया तमिलनाडु कैडर 1991 बैच की अधिकारी हैं। वह भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर भी रहीं हैं। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाई गई मुहिम, उस दौरान हुई गलतियां और उससे सबक लेने के बाद सामने आए परिणामों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंशः
पर्यावरण मुहिम की यात्रा कब से शुरू हुई?
23 साल पहले...। उस समय बतौर कलेक्टर मेरी पोस्टिंग तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में हुई थी। यह यूनेस्को साइट वेस्टर्न घाट (पश्चिमी घाट) क्षेत्र का एक जिला है बायो डायवर्सिटी (जैव विविधता) के लिहाज से देश के सबसे अहम इलाकों में से एक है। जिला भ्रमण के दौरान मैंने जंगली हाथियों और भालुओं को पालिथिन खाते हुए देखा था। यह मेरे लिए सिर्फ आश्चर्य का विषय नहीं था, बल्कि बहुत धक्का लगा था। उस समय अहसास हुआ कि हम लोग अपनी लापरवाहियों, अपने जीने के ढंग से किस तरह की दुनिया बना रहे हैं। मैं लौटकर आई और नीलगिरि के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ बैठकें कीं और प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया। आप कह सकते हैं कि यहीं से 'ब्लू माउंटेन अभियान' की शुरुआत हुई।
क्या बचपन की किसी घटना से इसका जुड़ाव है, जिससे आप इतनी उद्वेलित हो गईं कि इसे मुहिम में बदल दिया?
शायद मेरे भीतर पहले ही यह चेतना रही होगी, लेकिन इतने समय तक यह प्रकाश में नहीं आ पाई थी। नीलगिरि के जंगलों में उस दिन के उन दृश्यों ने मुझे जागरूक किया। फिर मुझे अहसास हुआ कि मेरे पास जो 'पावर' है... मेरी जो भी क्षमता है, उसका उपयोग कर मैं अपने हिस्से का योगदान दे सकती हूं। मैं यह नहीं मानती कि इस अभियान से पूरी तस्वीर बदल जाएगी, लेकिन मैंने, मेरी पूरी टीम और नीलगिरि के रहवासियों ने मिलकर अपने हिस्से का योगदान दिया।
प्लास्टिक पर प्रतिबंध तो अभी लगभग सभी राज्यों में है, लेकिन परिणाम नजर नहीं आता है। आपकी मुहिम में क्या अलग था?
मैं 23 साल पहले की बात कर रही हूं। उस समय बहुत कम राज्यों में इसको लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे थे। हालांकि प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाकर मैं और मेरी टीम सोच रही थी कि बस सारी स्थितियां सुधर जाएंगी। कुछ महीने बाद अहसास हुआ कि प्रतिबंध का तो कोई असर ही नहीं हुआ। गलतियों की समीक्षा की, सबक लिया और नए सिरे से अभियान शुरू किया। शहर-गांव के हर वर्ग के लोगों तक पहुंचे। स्वयंसेवी संस्थाओं को जोड़ा। स्कूल, कालेज और व्यापारी वर्ग को समझाया। हमने एक वीडियो बनाकर उन्हें दिखाया कि कैसे बाजार से लाई गई एक पालिथिन हमारे किचन में तो सिर्फ आधा दिन रहती है, लेकिन धरती, पानी, झील व तालाब में यह हजारों साल तक बनी रहती है। उसके बाद जब उसे जलाया जाता है, तो किस तरह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है। स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर डालती है। यूनेस्को साइट पश्चिमी घाट के एक हिस्से में होने की वजह से नीलगिरि में पर्यटकों की आवाजाही रहती है। ऐसे में यदि यह पर्यावरण को नुकसान हुआ, तो आने वाले समय में उनकी जीविका पर असर पड़ेगा। पंचायतों में संकल्प पास किए गए। इसमें दो साल लग गए। कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आए, लेकिन प्लास्टिक का उपयोग बंद नहीं हुआ। उसके बाद हमने पालिथिन चेक पोस्ट का निर्माण किया। इसके बाद धीरे-धीरे बड़ा बदलाव नजर आया।
प्लास्टिक चेकपोस्ट क्या है? क्या यह आज भी सक्रिय है?
नीलगिरि के पहाड़ी हिस्से पर चढ़ने से पहले वरलियार इलाका आता है। यहां आपको एक 'प्लास्टिक चेकपोस्ट' मिलेगा। उस समय प्लास्टिक की तीन चीजों (पालिथिन, प्लास्टिक के मैट्स और डिस्पोजेबल कप व प्लेट्स) पर प्रतिबंध लगाया था। चेकपोस्ट पर हर गाड़ी की चेकिंग होती और लोगों के पास से प्लास्टिक की सभी प्रतिबंधित वस्तुओं को जब्त करते थे। साथ ही उन्हें इसके नुकसान के बारे में भी बताते थे। जब्त प्लास्टिक आइटम्स को री-साइकलर्स को दे दिया जाता है। 23 साल पहले प्लास्टिक चेकपोस्ट एक छोटा-सा अभ्यास था, लेकिन आज यह बड़े पैमाने पर चल रहा है। मैं आज भी यह दावा नहीं करती हूं कि प्लास्टिक पर 100 प्रतिशत प्रतिबंध लग गया है, लेकिन आप आसानी से वहां प्रतिबंधित प्लास्टिक का उपयोग नहीं कर पाएंगे। वर्ष 2018 में तमिलनाडु सरकार ने इसे पूरे राज्य में लागू किया और 14 प्लास्टिक उत्पादों को प्रतिबंधित किया।
सरकारी मुहिम के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि अधिकारी बदलते ही यह दम तोड़ देती है। एक अधिकारी दूसरे के अभियानों में रुचि नहीं लेते हैं। आपका कई बार तबादला हुआ, फिर भी अभियान जारी है, कैसे?
यदि मुहिम 'सरकारी' होगी, तो यह बंद हो जाएगी। जनभागीदारी बहुत जरूरी है। मैंने आपको वरलियार प्लास्टिक चेकपोस्ट के बारे में बताया। इसे इको डेवलपमेंट कमेटी और स्वयं सहायता समूह के सदस्य मिलकर चलाते हैं। जो प्लास्टिक सामग्री जब्त की जाती है, वह री-साइकलर्स को दी जाती है। पिछले साल दो टन प्लास्टिक सामग्री जब्त की गई, जिससे 11 किमी लंबी सड़क बनाई गई। इसके अलावा खास तरह की ईंटें बनाई जाती हैं। स्वयं सहायता समूह द्वारा तैयार कपड़े के बैग यहां वितरित किए जाते हैं, जो लोग खरीद सकते हैं। यह भी आय का जरिया है। टाइगर रिजर्व फारेस्ट के भीतर बड़ी मात्रा में प्लास्टिक पहुंचने से भी रुक गया। यह पर्यटन के लिए भी अच्छा है, यानी अब यह लोगों की आजीविका का साधन बन गया। फायदा मिला, तो उन्होंने खुद ही इसे जारी रखा है। एक और उदाहरण है मैंग्रोव प्लांटेशन का। वर्ष 2004 की सुनामी में यहां बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था। अध्ययन में पाया गया कि जिन गांवों के आसपास बड़ी संख्या में मैंग्रोव थे, वहां सुनामी का प्रकोप बहुत कम हुआ। जहां मैंग्रोव नहीं थे, वहां तबाही ज्यादा हुई।
उन नवाचारों के बारे में बताइए, जिसकी वजह से अर्थ चैंपियन अवार्ड के लिए आपको चुना गया?
देखिए, अवार्ड अपनी जगह है, लेकिन जो काम हो रहा है, वह पूरी तरह से टीम वर्क है। मैं अकेले किसी कीमत पर यह काम नहीं कर सकती थी। इसमें बहुत से गुमनाम नायकों का योगदान है। इसलिए यह अवार्ड उन सभी का है और उन्हें ही समर्पित है। यहां कुछ नवाचारों का उल्लेख करती हूं, जो इको सिस्टम रेस्टोरेशन (पारिस्थितिकी तंत्र बहाली), सस्टेनेबल कूलिंग (सतत शीतलन) और क्लाइमेट चेंज लीडरशिप (जलवायु परिवर्तन नेतृत्व) से जुड़े हैं।
तमिलनाडु के 38 में से 14 जिले समुद्री तट पर स्थित हैं। इन्हें समुद्री आपदाओं (साइक्लोन, समुद्री तट ऊंचा होना, सुनामी आदि) से बचाने के लिए 2400 हेक्टेयर में नए मैंग्रोव का प्लांटेशन किया गया, जबकि 1200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में मैंग्रोव रिस्टोरेशन किया गया। जमीन तलाशने से लेकर उसकी निगरानी में तकनीक का उपयोग किया गया। चेन्नई के पास लगाए गए मैंग्रोव्स अब गूगल पर भी दिखने लगे हैं।
तमिलनाडु में पांच टाइगर रिजर्व फारेस्ट हैं। इसके 38 प्रतिशत हिस्से में लैंटाना (एक तरह की पौध प्रजाति, जो घास एवं अन्य पौधों को बढ़ने नहीं देती) का कब्जा हो गया था। इकोसिस्टम रेस्टोरेशन के तहत 38 हजार हेक्टेयर इलाके को इससे मुक्त करवाया गया। यह सतत जारी है। उखाड़े गए लैंटाना स्थानीय आदिवासियों को दे दिया जाता है, जिससे वे ब्रिकेट्स (छोटे-छोटे ईंट) बनाकर चाय फैक्टरियों को बेचते हैं। यह सकुर्लर इकोनमी (आमदनी आधारित अभियान) माडल भी है।
मंजपई (कपड़े का पीला बैग) तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है। इसे लोग शुभ मानते हैं। प्लास्टिक पर रोक लगाने के लिए 200 कोल्ड ड्रिंक वेडिंग मशीनों को माडिफाई कर इस तरह तैयार किया गया कि लोग 10-20 रुपये चुकाकर उससे मंजपई ले सकते हैं। यानी यदि आप बैग ले जाना भूल गए हैं तो इन मशीनों से कपड़े का बैग खरीद सकते हैं।
इसी तरह हरित क्रांति मिशन के तहत तमिलनाडु में 23.7 प्रतिशत हरियाली क्षेत्र को 33 प्रतिशत करने का अभियान जारी है। आम, सागौन, नीम आदि के अलावा पौधरोपण के लिए स्थानीय प्रजाति के 21 पौधों को चयनित किया गया है, ताकि यहां आसानी से पनप सकें। इसके लिए 1200 स्थानीय नर्सरी बनाई गई हैं। वर्ष 2022 से अब तक 11 करोड़ से ज्यादा पौधे लगाए जा चुके हैं। निगरानी के लिए जियोटैगिंग की गई है। नर्सरी में पौधों की देखभाल का ज्यादातर काम महिलाओं को सौंपकर ग्रीन जाब्स पैदा किए गए हैं।
क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन के लिए राज्य को तैयार करने के दो कार्यक्रम हैं। 'बीट द हीट' अभियान के तहत 300 सरकारी स्कूलों की छतों पर 'सोलर रिफ्लेक्टिव पेंट' लगाया गया है, जिससे गर्मी के दिनों में तापमान तीन से पांच डिग्री तक कम हो जाता है। सब स्कूलों में एसी लगाना संभव नहीं है। यह इसका बेहतर विकल्प है। इसके अलावा स्कूल परिसर में किचन गार्डन, पौधारोपण भी शामिल है। यह सभी चीजें पर्यावरण संरक्षण व तापमान घटाने में मददगार हैं।
तमिलनाडु के 11 गांवों को चुना गया है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के लिए तैयार किया जा रहा है। यहां नियमित जलस्रोतों की सफाई, प्लास्टिक प्रतिबंध के साथ ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को नापा जा रहा है। हमने ग्रीन हाउस गैस इनवेंटरी (जीएचजीआइ) रिलीज की है, जिससे यह पता चलता है कि उत्सर्जन कैसे कम किया जाए।
वेटलैंड को बचाने के लिए 19 रामसार साइट्स विकसित किए गए हैं। एक समय में तमिलनाडु इस मामले में देशभर में सबसे नीचे पायदान पर था, आज सबसे पहले नंबर पर है। अप्रवासी पक्षियों के लिए सेंचुरी बनाना, आलिव रिडले कछुओं की आवाजाही व प्रजनन काल के दौरान उनकी निगरानी शामिल है।
डेडलाइन और मानिटरिंग का क्या तरीका है?
अब न डेडलाइन की जरूरत है, न मानिटरिंग के लिए लंबी-चौड़ी रिपोर्ट बनाने की। अब तकनीक की मदद से 'रीयल टाइम और लाइव मानिटरिंग' हो रही है। कोयंबतूर जिले का एक उदाहरण देती हूं। वहां आए दिन रेलवे ट्रैक को पार करते वक्त हाथियों के मरने की खबर आती थी। अब हमने रेलवे ट्रैक पर एआइ संचालित कैमरे लगा दिए हैं। हम लाइव देख सकते हैं कि कब हाथियों का झुंड उस ट्रैक के ऊपर से गुजर रहा है। इसके आधार पर अलर्ट जारी होता रहता है। इससे हाथियों के मरने की घटनाएं काफी कम हो गई हैं। बीते चार साल में लगाए गए 11 करोड़ पौधों की बढ़त, समुद्री तटों पर आने वाले आलिव रिडले कछुए की निगरानी, जंगलों में 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्र से हटाए गए लैंटाना, मैंग्रोव की वृद्धि, सभी को हम रोज मानिटर करते हैं। इससे मानव श्रम भी बच रहा है और सटीकता भी पहले से ज्यादा है।
दिल्ली का प्रदूषण और अरावली पहाड़ पर अवैध खनन इन दिनों चर्चा और चिंता दोनों का विषय है। देश के अधिकांश राज्यों में भी यह समस्याएं धीरे-धीरे विकराल होती जा रही हैं। इससे निपटने का कोई सुझाव?
देखिए, हमारे देश में प्राकृतिक संसाधन कम हैं। जो हैं, उन पर बहुत दबाव है, इसलिए नियंत्रित करने की जरूरत है। हर राज्य की अपनी जरूरतें और चुनौतियां होती हैं, इसलिए तुलना करना सही नहीं होगा। मैं कुछ प्रयोगों का उल्लेख कर सकती हूं, जो हम यहां कर रहे हैं। समुद्री इलाके में स्थित होने की वजह से तमिलनाडु में वायु प्रदूषण का स्तर तुलनात्मक रूप से कम है, लेकिन यह सोचकर किसी भी राज्य को हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ जाना चाहिए, उसकी लगातार निगरानी होनी चाहिए। तमिलनाडु में हमने चार जिलों चेन्नई, मदुराई, टोटीकोरी और त्रिची को चुना है। यह वे जिले हैं, जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है। यहां धूल से फैलने वाले प्रदूषण और उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। तमिलनाडु के सभी जिलों में फिलहाल वायु गुणवत्ता सामान्य है, लेकिन यह दावा नहीं कर सकती कि आदर्श स्थिति है। इसकी गुणवत्ता बेहतर करने की कोशिश हर शहर में सालभर जारी रहनी चाहिए। अब बात करते हैं अरावली की... तो खनन की समस्या और पर्यावरण पर इसका दुष्प्रभाव हर राज्य में है। इस समस्या से लड़ने के लिए हमने तमिलनाडु में प्रोटेक्टेड एरिया यानी संरक्षित क्षेत्र को बढ़ाते जा रहे हैं। बीते साढ़े चार साल में हमने राज्य में 100 नए वन क्षेत्र विकसित कर लिए हैं। जल्द ही हम इस विकास यात्रा को एक पुस्तक के रूप में देश के सामने लेकर आएंगे।
