अमित तिवारी। कल्पना व्यक्ति को ईश्वर की ओर से मिली सबसे बड़ी पूंजी है। यही कल्पना कई बार जीवन में बहुत से अनुत्तरित लगने वाले प्रश्नों के उत्तर भी सहज रूप से सामने रख देती है। 'अश्वत्थामा' और 'इंद्र' जैसे उपन्यास लिख चुके आशुतोष गर्ग ने इस बार 'कल्कि : दसवें अवतार का उदय' नाम से किताब लिखी है। इसमें उन्होंने धर्म और विज्ञान के तार जोड़े हैं। उनके बेटे अत्रि गर्ग ने भी इसका सह-लेखन किया है।

किताब में एक परिवार की दो अलग-अलग पीढ़ी से भगवान विष्णु के अवतार कल्कि की मुलाकात के माध्यम से कहानी को गढ़ा गया है। किताब के पहले हिस्से में कल्कि की मुलाकात एक किरदार से होती है, जहां प्रथम विश्व युद्ध के बाद फैली महामारी को वह मनुष्य को उसकी गलतियों की सजा देने के लिए ईश्वर का प्रकोप बताते हैं। कुछ दशक बाद कल्कि फिर उस व्यक्ति के पोते से मिलते हैं और 2020 में फैली महामारी 'म्यूविड-20' पर चर्चा करते हैं। यह किताब मनुष्य द्वारा प्रकृति के अत्यधिक दोहन और विकास के नाम पर हो रहे विनाश की गाथा कहती है। यह बताती है कि पृथ्वी पर मनुष्य एकमात्र जीव नहीं है, बल्कि अन्य अनगिनत जीवों का भी इस पर मनुष्य जितना ही अधिकार है। जबकि मनुष्य लगातार सभी के अधिकारों में दखल देता आया है। मनुष्य की गतिविधियों के कारण अब तक न जाने जीवों की कितनी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।

पहली नजर में यह किताब अपना सब किया-धरा भगवान पर थोप देने के विचार से प्रेरित होने का आभास देती है। हालांकि जब मानवजाति द्वारा प्रकृति के बेतहाशा दोहन पर नजर पड़ती है, तो सहसा यह मानने को भी मन करता है कि शायद प्राकृतिक आपदाएं और महामारियां भी कहीं न कहीं धरती पर संतुलन बनाने की प्रकृति की प्रक्रिया का ही अंग हैं। कुल मिलाकर, यह किताब पाठक को रोमांचित करती है और दुनिया में फैली महामारी को देखने की एक अलग दृष्टि भी देती है।

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पुस्तक : कल्कि : दसवें अवतार का उदय

लेखक : आशुतोष गर्ग, अत्रि गर्ग

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

मूल्य : 200 रुपये

Edited By: Shashank Pandey