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BMC चुनावों में ठाकरे ब्रदर्स फेल... क्या राज का साथ आना उद्धव के लिए बन गया गले की फांस?

Published: Fri, 16 Jan 2026 05:34 PM (IST)

बीएमसी चुनाव में भाजपा बंपर जीत की ओर बढ़ रही है, जबकि उद्धव और राज ठाकरे की रणनीति विफल होती ...और पढ़ें

BMC चुनावों में ठाकरे ब्रदर्स फेल

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र के BMC चुनाव में बीजेपी बंपर जीत की तरफ बढ़ रही है। रुझानों में 29 सीटों में से 23 पर भाजपा+ आगे है। ठाकरे ब्रदर्स की रणनीति फेल होती दिखाई दे रही है। 

BMC चुनाव की चर्चा के दौरान महाराष्ट्र की राजनीति में तब एक नया मोड़ आया था, जब 20 साल बाद अलग हो चुके चचेरे भाई उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आ गए।

इस बहुचर्चित मिलन का मकसद मराठी वोटों को मजबूत करना और अपनी विरासत को उनके सहयोगी एकनाथ शिंदे से वापस लेना था, जो अब शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह दोनों पर कंट्रोल रखते हैं।

भाजपा बीएमसी चुनाव में बंपर जीत की ओर अग्रसर

उद्धव ठाकरे, जिन्होंने लंबे समय के सहयोगी BJP से संबंध तोड़कर, कांग्रेस और शरद पवार की NCP के साथ गठबंधन करके एक बार जुआ खेला था, उनके लिए यह नया कदम 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उस गठबंधन की शर्मनाक हार के बाद एक हताशा भरा कदम माना गया।

BMC चुनाव भी बहुत महत्वपूर्ण थे क्योंकि यह कॉर्पोरेशन एशिया के सबसे अमीर कॉर्पोरेशनों में से एक है। शिवसेना वहां 25 सालों से सत्ता में थी। इसलिए, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के लिए यह चुनाव अपने आखिरी गढ़ को बचाने जैसा था।

हालांकि, शुक्रवार के नतीजों से यह साफ हो गया है कि ठाकरे भाइयों का एक साथ आना काम नहीं आया। इसका बड़ा कारण शायद एक चचेरा भाई था।

उद्धव-राज ठाकरे की गठबंधन रणनीति विफल साबित हुई

2017 में अविभाजित शिवसेना ने BMC के 227 वार्डों में से 84 पर जीत हासिल की थी, जहां बहुमत का आंकड़ा 114 है।

उस दौरान शिवसेना (UBT) शाम 4 बजे तक 74 सीटों पर आगे चल रही है, जो BJP के 88 सीटों के बाद दूसरे नंबर पर थी। दूसरी ओर, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना सिर्फ 8 सीटों पर आगे चल रही थी।

मनसे का खराब प्रदर्शन

शिवसेना (UBT) ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसका मतलब है कि उसका स्ट्राइक रेट 46% से ज्यादा रहने वाला है, जबकि MNS ने 53 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिससे उसकी जीत का प्रतिशत सिर्फ 15 रहा।

इससे भी बुरी बात यह है कि राज ठाकरे का गैर-महाराष्ट्रियों के प्रति कड़ा रुख और मराठी गौरव का हिंसक समर्थन भी शिवसेना (UBT) को सीटें गंवाने का कारण माना जा रहा है, खासकर उन वार्डों में जहां गैर-मराठी आबादी ज्यादा है।

इसलिए, यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि MNS से उनकी पार्टी को वोट ट्रांसफर होने के बावजूद, उद्धव ठाकरे का अकेले या कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ना बेहतर होता, जिसने 11 वार्ड जीते हैं लेकिन गैर-महाराष्ट्रियों के बीच उसे ज्यादा समर्थन प्राप्त है।

शरद पवार की NCP, जो शिवसेना (UBT) और MNS के साथ गठबंधन में थी, अपना खाता खोलने में नाकाम रही। हालांकि, अगर महा विकास अघाड़ी-कांग्रेस-शिवसेना (UBT)-NCP(SP) गठबंधन, जो 2019 से अस्तित्व में है और 2024 के लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी गठबंधन से ज्यादा सीटें जीती थीं, एक साथ चुनाव लड़ता तो स्थिति अलग हो सकती थी।